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नशे के खिलाफ लड़ाई को जनआंदोलन बनाएं: सरकार की कोशिश के साथ परिवार, स्कूल भी जुड़ें, संयुक्त प्रयास ही समाधान

Sun, 09 Aug 2026 08:47 AM IST
ज्योति भास्कर डॉ. पीके बाजपेयी
डॉ. पीके बाजपेयी Published by: ज्योति भास्कर Updated Sun, 09 Aug 2026 08:47 AM IST
सार

नशे के खिलाफ लड़ाई तभी निर्णायक बनेगी, जब सरकार के प्रयासों के साथ परिवार, स्कूल, समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था भी मिलकर इसे जनआंदोलन का रूप दें।

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fight against drug abuse mass movement must Families must join govt efforts collective approach only solution
जंतर मंतर पर अनशन-प्रदर्शन के दौरान अभिजीत दीपके ने सोनम वांगचुक (फाइल) - फोटो : आईएएनएस / एएनआई वीडियो ग्रैब

विस्तार

भारत में नशे की बढ़ती समस्या अब केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक, स्वास्थ्य और राष्ट्रीय विकास का गंभीर प्रश्न बन चुकी है। इसी चुनौती को देखते हुए प्रधानमंत्री ने 2 अगस्त, 2026 को ‘नशा मुक्त युवा- विकसित भारत संकल्प अभियान’का शुभारंभ किया था। इस अवसर पर एक करोड़ युवाओं ने नशा मुक्ति की शपथ ली थी। प्रधानमंत्री ने कहा कि नशा केवल शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि पूरे परिवार की खुशियां और भविष्य छीन लेता है। विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए युवाओं का नशे से दूर रहना अनिवार्य है।

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इस अभियान की गूंज राज्यों में भी दिखाई दे रही है। हरियाणा के यमुनानगर में आयोजित ‘नशे से जंग, यमुनानगर के संग’ मैराथन में हजारों लोगों की भागीदारी ने सामाजिक जागरूकता का संदेश दिया। हालांकि जन-जागरूकता तभी प्रभावी होगी, जब उसे रोकथाम, उपचार और पुनर्वास की व्यापक रणनीति से जोड़ा जाएगा।
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स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में ‘एनडीपीएस अधिनियम’ से जुड़े कई लाख मामले लंबित हैं। इनके शीघ्र निस्तारण के लिए 65 विशेष अदालतें कार्यरत हैं। पंजाब में 60 हजार, केरल में 50 हजार, ओडिशा में 17 हजार के अलावा तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश में सबसे अधिक मामले लंबित हैं। नशे का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव परिवारों पर पड़ रहा है। हाल ही में एक 16 वर्षीय किशोर को उसकी मां नशे और मोबाइल गेमिंग की लत के कारण काउंसलिंग के लिए लाई। पिता पहले ही नशे की वजह से परिवार से अलग हो चुके थे और अब बेटा भी उसी राह पर चल पड़ा। यह अकेली घटना नहीं, बल्कि हजारों भारतीय परिवारों की हकीकत है।
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हरियाणा में पिछले कुछ वर्षों में हजारों युवाओं का नशा मुक्ति केंद्रों में इलाज हुआ है। वर्ष 2024-25 में ही लगभग 52 हजार से अधिक युवा उपचार के लिए पहुंचे। सिरसा जिले में पिछले एक दशक में नशा रोगियों की संख्या में कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं, पंजाब में ढेर सारे लोग किसी न किसी प्रकार के नशे की चपेट में हैं, जिनमें बड़ी संख्या किशोरों की भी है। राज्य सरकार उपचार, पुनर्वास और व्यापक सर्वेक्षण के माध्यम से समस्या की वास्तविक तस्वीर समझने का प्रयास कर रही है।


इस संकट से निपटने के लिए पांच प्राथमिकताओं पर आधारित रणनीति आवश्यक है-सीमा सुरक्षा और तस्करी पर नियंत्रण, विद्यालयों व समुदायों में वैज्ञानिक जागरूकता, मानसिक स्वास्थ्य एवं नशा मुक्ति सेवाओं का एकीकरण, प्रभावी पुनर्वास तथा परिवार और समाज की सक्रिय भागीदारी। यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनना है, तो नशे के खिलाफ लड़ाई पुलिस और कानून तक सीमित नहीं रह सकती। परिवार, विद्यालय, स्वास्थ्य व्यवस्था, समुदाय और न्याय प्रणाली के संयुक्त प्रयास ही इस सामाजिक चुनौती का स्थायी समाधान बन सकते हैं।

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