म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के...
पढ़ाई हो या खेल, प्रोग्राम की कोडिंग हो या जहाज उड़ाना, आज आपको हर क्षेत्र में नारी शक्ति की उपस्तिथि दिख ही जाएगी। अब वो दिन लद गए जब महिलाओं की पहचान चूल्हे से शुरू हो कर घर की दहलीज़ तक ही खत्म हो जाती थी। आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बना रही हैं, चाहे बुद्धिमत्ता हो या शारीरिक शक्ति, हर जगह वह सफलताओ के परचम लहरा रही हैं।
हर साल के सीबीएसई के दसवीं और बारहवीं के परिणाम अब भी उसी परिपाटी मे आते हैं कि इस साल भी लडकियों ने लड़कों से बाज़ी मारी। हर साल लड़कियों के पास होने का प्रतिशत लड़कों से ज्यादा ही रहता है। जबकि ज्यादातर लड़कियों को अब भी उतने मौके और संसाधन उपलब्ध नहीं होते जितने की लड़को को होते हैं, उन्हें पढाई के साथ साथ घर की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है, तब भी हर ज़िम्मेदारी को निभाते हुए उपलब्ध अवसरों में भी लड़को को पीछे छोड़ रखा है।
सोचिये कितनी बड़ी बात है न की जब पूरे देश में साक्षरता दर लड़कों की ज्यादा है लेकिन अपनी लगन और मेहनत से परिणाम प्रतिशत में लड़कियां हमेशा आगे रहती हैं। गाहे बगाहे लोग कहते रहते हैं आज की महिलाएं पुरुषों के साथ कंधें से कंधा मिलाकर चल रही हैं, लेकिन सच्चाई यह है की महिलाएं आज पुरुषों से काफी आगे हैं। जहां एक तरफ वो घर पर आदर्शवादी मां, बहु बेटी, बहन और पत्नी की जिम्मेदारी निभा रही हैं, वही घर से बाहर निकल कर बोर्ड मीटिंग भी उतने ही आत्मविश्वास और सफलता से करती है।
अगर एक तरफ रतन टाटा और आनंद महिंद्रा उद्योग जगत में चमकते भारतीय नाम हैं तो वहीं धमक इन्द्रा नूरी, किरन मजूमदार जैसे नामों को भी है। जिस महिला को घर के खर्चे में से पैसे बचा कर बचत करने के लिये जाना जाता था, आज पूरे देश की अर्थव्यवस्था की डोर संभाल रही हैं।
बचपन से ही हम सब ने देखा होगा की जहां एक तरफ पुरुष का मुख्य योगदान घर गृहस्थी के बाहर की जिम्मेदारियों को संभालना होता है तो महिलाओं मुख्यत गृहस्थी संभालती थी। लेकिन आज महिलाएं न सिर्फ बाहर निकल कर देश बदल रही है बल्कि साथ ही साथ घर की जिम्मेदारियों को भी उसी निपुणता से निभा रही हैं।
घर का खाना, बच्चों की जिम्मेदारी अब भी देखा जाता है कि मुख्यत: उन्हीं की जिम्मेदारी होती है और महिलाएं सफलता से आज इस दोहरी जिम्मेदारी को भी निभा रही हैं। हर क्षेत्र में आज उनकी एक मुकम्मल पहचान है, अब वह दिन लद गए जब महिला अपनी देशभक्ति के लिए गहने दान करती थी, आज महिलाएं सेना में भर्ती हो कर दुश्मनों के दांत खट्टे कर के देशभक्ति दिखा रही हैं।
जहां एक तरफ 23 साल की आरोही पंडित एटलांटिक महासागर के ऊपर उड़ान भर कर विश्व की पहली महिला पायलट बन कर देश का नाम रोशन कर रही हैं तो वही दूसरी तरफ योगिता रघुवंशी भोपाल से ट्रक चला कर केरल तक जा कर नारी क्षमता का एक अलग आयाम स्थापित कर रही है।
अगर क्रिकेट प्रेमियों को छक्के मारते हुए रोहित शर्मा पसंद है तो हरमनप्रीत कौर भी अपनी पावर हिटिंग के लिए कई दर्शकों की पसंद है। अगर क्रिकेट से हट कर सोचें तो बचपन में अगर मिल्खा सिंह को स्कूल पाठ्यक्रम की किताबों में पढ़ा तो वहीं से पीटी उषा को भी जाना है। आज महिलाएं सब बंधन, रूढ़ियों को तोड़ कर आगे बढ़ रही है और नए- नए आयाम छू रही है जो खुद में एक इतिहास है।
अब सफर करते हुए आपको लैपटॉप बेग सिर्फ पुरुषों के कन्धों पर ही नही बल्कि महिलाओं के कंधों पर भी दिखता है। हर बदलते दिन के साथ महिलाओं की उपलब्धियों की गिनती बढ़ती ही जा रही है और अब हर पिता गर्व से कह सकता है की “म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के...”
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।