विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: मंजीरा दत्ता- पुरस्कृत डॉक्यूमेंट्री निर्देशक
मंजीरा दत्ता ने सदैव सामाजिक समीक्षा की, सामाजिक न्याय, निम्न समुदायों, वर्ग, जाति, लिंग एवं आध्यात्मिकता पर फिल्म बनाई। बाबुलाल भुइया की कुर्बानी’ उनकी मास्टरपीस कहलाती है।
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हाईकोर्ट जज के घर में मंजीरा दत्ता का जन्म 1949 को हुआ। बचपन कलकत्ता में बीता मगर बाद में वे दिल्ली में बस गईं। परिवार एवं मित्रों के बेच वे तृप्ति के नाम से पुकारी जाती थीं। पांच भाई-बहनों के बीच उनका नंबर चौथा था। पहले उन्होंने कॉमर्स की पढ़ाई की फिर स्कॉटलैंड से चार्टड एकाउंटेंसी की पढ़ाई की।
करीब साढ़े सात साल इंग्लैंड में रहीं, फिर संयोग ऐसा बना कि उनके एक अंकल ने उन्हें एक कैमरा उपहार में दिया। कैमरे का ऐसा नशा लगा कि वहीं ईलिंग आर्ट कॉलेज में दाखिला ले लिया और एक नई दिशा में चल पड़ीं।
भारत लौट कर मंजीरा दत्ता ब्रिटिश कौंसिल से जुड़ गईं और उन्होंने वहां वीडियो डिविजन की स्थापना की। उन्होंने अपनी पहली डॉक्यूमेंट्री 1986 में बनाई। डॉक्यूमेंट्री का शीर्षक है, ‘रास्ते बंद हैं सब’ (Raaste Bandh Hain Subh, All Roads Closed)।
सामाजिक विद्रूपता की यह फिल्म मात्र 55 मिनट में जाति-लिंग, क्रूरता की बात करती है और उत्तराखंड के एक समुदाय के विडम्बनापूर्ण जीवन को दिखाती है। इसकी फंडिंग एवं वितरण भारत की एक स्वयंसेवी संस्था की मंजिरा डिंगवाने ने की थी। हिमालय के गड़वाल इलाके में इसकी शूटिंग हुई।
मंजिरा दत्ता एवं ज्योति गुप्ता ने इसके लिए शोध किया, एडिटिंग रीना मोहन ने की। कैमरा बीपी सिंह, दुलाल सैल्किया एवं सेल्वम ने संभाला है। बंधुआ मजदूरों पर बनी यह डॉक्यूमेंट्री जर्मनी में प्रदर्शित हुई। अपनी पहली डक्यूमेंट्री के लिए मंजर दत्ता को सर्वोत्तम एंत्रोप्पोलोजिकल/एथनोग्राफिक फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
15 डॉक्यूमेंट्री की निर्देशक
मंजीरा दत्ता ने सदैव सामाजिक समीक्षा की, सामाजिक न्याय, निम्न समुदायों, वर्ग, जाति, लिंग एवं आध्यात्मिकता पर फिल्म बनाई। करीब 15 डॉक्यूमेंट्री की निर्देशक मंजीरा की ‘बाबुलाल भुइया की कुर्बानी’ (1987, The Sacrifice of Babulal Bhuyia) उनकी मास्टरपीस कहलाती है। यह उन्होंने जर्मनी एवं यूके के चैनल 4 केलिए बनाई। 16एमएम पर बनी 63 मिनट की यह डॉक्यूमेंट्री हत्या के बारे में है जिसके कई संस्करण मिलते हैं।
कोयला उद्योग से जुड़ी इस घटना में बाबूलाल भुइया की इंडस्ट्री सिक्योरिटी गार्ड द्वारा हत्या की जाती है, जो कोल माफिया द्वारा कराई गई थी। यह घटना फरवरी 1981 में हुई थी। हत्या के विरोध में कामगरों ने विरोध किया तथा गार्ड के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई। यह फिल्म कोयलांचल के मजदूरों के जीवन की बुरी स्थिति को दिखाती है।
सिनेमाटोग्राफी रंजन पालित की है, एडिटिंग रीना मोहन एवं ओमेश मट्ट और सुरेश राजामणि ने ध्वनि का क्षेत्र संभाला है। ‘पोर्ट्रेट ऑफ ए ड्रीम’ उनकी एक अन्य महत्वपूर्ण कृति है। यह 52 मिनट की फिल्म भारतीय सर्कस कलाकारों पर केंद्रित है।
1991 की फिल्म ‘पोर्ट्रेट ऑफ ए ड्रीम’ को मंजीरा दत्ता एवं निक हार्ट-विलियम्स ने प्रड्यूस किया है, इसकी सिनेमाटोग्राफी रंजन पालित एवं जुगल के. देबता ने की है, समीरा जैन ने संपादन किया है, तथा अश्विन बल्सावर और जगदीश ने इसका संगीत दिया है।
फिल्म ‘रिंगमास्टर्स’ और इसकी कहानी
मंजीरा दत्ता की ‘रिंगमास्टर्स’ प्रतिबंधित कर दी गई। इसको भी उन्होंने स्वयं राहुल रणदिवे के साथ मिल कर प्रड्यूस किया, मगर इस बार उन्होंने अकेले निर्देशन नहीं किया। उन्होंने राकेश शर्मा के साथ मिल कर ‘रिंगमास्टर्स’ का निर्देशन किया। फिल्म के लिए शोध का जिम्मा प्रन्नजोय गुहा ठाकुर्ता, राकेश शर्मा तथा पंकज राकेश रहा। राहुल रणदिवे और शशि ने कैमरा संभाला, राजेश प्रभु ने संपादन किया।
फिल्म चुनावों में होने वाली धांधली का पर्दाफाश करती है, पैसे एवं सत्ता-शक्ति की भूमिका दिखाती है। इसमें कॉन्ग्रेस नेता नटवर सिंह, राजेश पायलेट, शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे, अंडरवर्ल्ड डॉन हाजी मस्तान एवं कई अन्य लोगों के साक्षात्कार हैं, टिकट पाने के विभिन्न पार्टी के इक्क्षुकों से बातचीत है, बिहार की भूमिगत असला फैक्टरी के फुटेज हैं। फिल्म के बीच-बीच में पिरोए गए सांभाजी भगत के नुक्कड नाटक इसे रोचक बनाते हैं। अफसोस चुनावों में आज भी भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर चालू है।
मंजीरा दत्ता ने इनके अलावा ‘डेमोक्रेसी इन क्राइसिस’, ‘एक और नगमा’, ‘बीकेएस अयंगार: स्कल्पटिंग ह्युमनकाइंड’, ‘बीकेएस अयंगार: लाइट ऑफ अयंगार योग’, ‘बीकेएस अयंगार: एन इंटव्यू विद गुरुजी’ आदि डॉक्यूमेंट्री बनाई। 2019 में मंजरी दत्ता की मृत्यु हो गई, मगर उनका काम अब भी बोलता है।
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