विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: नहीं रहे प्रतिभा सम्पन्न श्रीनिवासन, अभिनेता-निर्देशक और लेखक हर रोल में फिट
पैंसठ कहानियों के लेखक, लम्बी पारी खेलने वाले मलयालम सिनेमा के अभिनेता, निर्देशक, प्रड्यूसर हैं श्रीनिवासन। लाइम लाइट में रहने की चिन्ता नहीं करने वाले श्रीनिवासन का हाल में देहांत हो गया।
विस्तार
मेरे ख्याल से कोई हिन्दी सिने-प्रेमी नहीं होगा, जिसने ‘बिल्लू बार्बर’ (2009, जिसे बाद में केवल ‘बिल्लू’ नाम दिया गया) न देखी हो। कहानी वही कृष्ण-सुदामा वाली है, लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में रची गई है। इरफान (बिल्लू), लारा दत्ता (बिन्दिया) एवं शाहरुख खान (साहिर खान) अभिनीत इस फिल्म के निर्देशक प्रिदर्शन हिन्दी दर्शकों काफी लोकप्रिय हैं। उन्होंने जिस लेखक की कहानी के आधार पर फिल्म बनाई उसी कहानी पर तमिल में एक साल पहले पी. वासु ने फिल्म बनाई।
वासु की ‘कुचेलन’ (Kuselan, 2008) में बालकृष्णन की भूमिका में पशुपति हैं और मीना ने श्रीदेवी और रजनीकांत ने अशोक कुमार का अभिनय किया है। मूल कहानी मलयालम में है और स्वयं लेखक ने ई. पी. बालन का अभिनय किया है। मलयालम में यह फिल्म 2007 में ‘कथा परयुम्बोल’ नाम से है, निर्देशक हैं, एम. मोहना। यहां भी मीना श्रीदेवी बनी हैं, लेकिन फिल्म स्टार दोस्त अशोकराज बने हैं, मलयालम के प्रसिद्ध अभिनेता मम्मूट्टी। ‘कुचेलन’ फिल्म ‘कथा परयुम्बोल’ का ऑफिसियल रिमेक है।
अभिनेता, निर्देशक और प्रड्यूसर श्रीनिवासन
अवश्य अब आप लेखक का नाम जानने को उत्सुक होंगे। पैंसठ कहानियों के लेखक, लम्बी पारी खेलने वाले मलयालम सिनेमा के अभिनेता, निर्देशक, प्रड्यूसर हैं श्रीनिवासन। लाइम लाइट में रहने की चिंता न करने वाले श्रीनिवासन का हाल में देहांत हो गया। पूरा केरल फिल्म उद्योग एवं सिने-दर्शक शोक में डूब गए। जीते-जी उन्हें उतना सम्मान न मिला, जितना जाने के बाद मिला। उन्होंने 2 फिल्में निर्देशित कीं, पैंसठ लिखीं पर अभिनय की संख्या देखें तो आश्चर्य होता है, उन्होंने 234 फिल्मों में काम किया। हास्य, कॉमेडी उनका फोर्ट था। गम्भीर विषय को हल्के-फुल्के तरीके से व्यक्त करना कोई श्रीनिवासन से सीखे। फिल्म में अक्सर वे आम आदमी की भूमिका निभाते थे।
1984 में उन्होंने अपना पहला स्क्रीनप्ले प्रियदर्शन के लिए लिखा, जिन्होंने खुद एक स्क्रीनप्ले राइटर के रूप में अपना फिल्मी सफर प्रारंभ किया था। उनकी भी ‘ओडरुतम्माव आलरियाम’ (‘डोन्ट रन, अंकल, वी नो यू’) पहली फिल्म थी। उस साल प्रियदर्शन ने दो फिल्में (‘दूसरी फिल्म थी) बनाई, दोनों माइलस्टोन साबित हुईं। यहीं से इस जोड़ी ने प्रारंभ कर 12 फिल्में साथ-साथ बनाईं। मात्र ‘ओरु मुत्तस्सि कथा’ (ए ग्रैंडमदरस टेल) उतनी सफल न हुई।
‘पूच्चक्कोरु मूक्कुत्ति’ (ए नोज पिन फॉर द कैट), ‘ज्ञानप्रकाशन’, ‘संडे होलीडे’, ‘गुपी’, ‘माई गॉड’ और न जाने कितनी फिल्मों में आप उन्हें पाएंगे। प्रियदर्शन कमाल के निर्देशक हैं, मोहनलाल कमाल के एक्टर हैं, मोहनलाल के साथ श्रीनिवासन ने कई फिल्मों में कॉमेडी के अलावा भी काम किया है। इसी तरह की एक फिल्म है, प्रियदर्शन निर्देशित ‘किलिचुन्दन मामपाषम’ (2003, )। यहां वे एक धनी व्यक्ति मोइदुकुट्टी हाजी बने हैं, जो औलाद पाने केलिए शादी-पर-शादी करता जाता है।
नवीनतम कम उम्र पत्नी वास्तव में अब्दुल कादर (मोहनलाल) की प्रेमिका है। हाजी चाह कर भी अमीना से संबंध नहीं बना पाता है, फिल्म का अंत देख कर हिन्दी फिल्म का डॉयलॉग याद आता है, ‘जा सिमरन जा, अपनी जिंदगी जी ले...’। इस फिल्म का कमाल है, श्रीनिवासन ने अभिनय में मोहनलाल से अधिक कमाल किया है।
उन्होंने नायक का रोल बहुत कम फिल्मों में किया, हां, सह-नायक के रूप में परदे पर खूब दिखाई देने वाले श्रीनिवासन 2 मई 1950 को केरल के कन्नूर नामक स्थान में पैदा हुए उनकी पत्नी का नाम विमला और बेटों का नाम ध्यान श्रीनिवासन एवं विनीत श्रीनिवासन है। दोनों बेटे फिल्म लाइन में हैं। दोनों का स्वभाव एक-दूसरे से बहुत भिन्न है। उनका अपने पिता से रिश्ता भी बहुत अलग था।
सह-अभिनेता के रूप में वे अस्सी के दशक और नब्बे की शुरुआत में अधिकतर मोहनलाल के साथ परदे पर हैं, इनमें से अधिकांश फिल्म सफल रही हैं। इन फिल्मों में से बहुत सारी का लेखन श्रीनिवासन ने किया। तीन फिल्मों में नायक रामदास (मोहनलाल) के साथ विजयन की भूमिका में सह-नायक के रूप में हैं। त्रयी है: 1987 की ‘नाडोडि कात्तु’ (द वान्डरिंग विन्ड), 1988 की ‘पट्टण प्रवेशम’ (एन्टरिंग द टाउन) तथा 1909 की ‘अकरे अकरे अकरे’ (फार फार अवे)।
फिल्में श्रीनिवासन लिखित हैं, पहली दो के निर्देशक सत्यन अन्टिकाड हैं, तीसरी फिल्म के निर्देशक प्रियदर्शन हैं। त्रयी कॉमेडी ने केरल में दोस्ती का बेंचमार्क कायम कर दिया। श्रीनिवासन लिखित इन फिल्मों ने मोहनलाल को अपनी अभिनय कुशलता का हास्य-व्यंग्य पक्ष दिखाने का भरपूर अवसर दिया।
वे यहीं नहीं रुके उन्होंने मलयालम के एक सर्वोच्च अभिनेता मोहनलाल के अलावा एक और सर्वोच्च अभिनेता मम्मूट्टी के साथ भी सह-अभिनेता की तरह काम किया। यहां भी नायक का नाम रामेशन नायर है, श्रीनिवासन काकाकुउट्टिल दासन बने हैं। साथ में शोभना लेखा की भूमिका में हैं।
1993 की इस फिल्म ‘गोलान्तर वार्ता’ (ग्लोबल न्यूज), का लेखन भी श्रीनिवासन और निर्देशन सत्यन अन्टिकाड का ही है। इन फिल्मों के कारण इस काल को केरल फिल्म इतिहास में श्रीनिवासन का लेखन कहा जाता है। ये फिल्में दर्शक के मन को छूती हैं, वह इनसे कनेक्ट कर पाता है।
सामाजिक-राजनैतिक मुद्दों को छूती फिल्मों के लेखक
श्रीनिवासन की लिखी फिल्में सामाजिक-राजनैतिक मुद्दों को छूती हैं, मगर दर्शक के नजदीक रहती हैं, पात्र दर्शक केलिए अजनबी नहीं होते हैं। उनकी लिखी कहानी पर बनी सवा दो घंटे की फिल्म ‘संदेशम’ (1991) हेतु उन्हें सर्वोत्तम कहानी का केरल राज्य फिल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ। द्वितीय सर्वोत्तम अभिनेत्री का ईनाम के.पी.ए.सी. ललिता के नाम रहा। सत्यन एन्टिकाड की यह फिल्म तत्कालीन केरल राजनीति पर हास्य-व्यंग्य से भरपूर है। जिसमें दो भाई स्थानीय दो विरोधी पार्टी के लीडर हैं। एक समय उनके माता-पिता उन्हें लेकर गर्वित हुआ करते थे, अब बुढ़ापे में दोनों भाई पीड़ा, मुसीबत का कारण बने हुए हैं। राजनीति युवाओं को किस दिशा में ले जाती है, इसका एक आयाम यह फिल्म है।
श्रीनिवासन ने 1989 में ‘वडक्कुनोक्कियंत्रम’ (‘कम्पास’, दिशा सूचक यंत्र) तथा नौ साल बाद 1998 में ‘चिंत्ताविषटयाय श्यामला’ (श्यामला, लॉस्ट इन हर थॉट्स) Chinthavishtayaya Shyamala) निर्देशित की। दूसरी निर्देशित फिल्म ‘चिंत्ताविषटयाय श्यामला’ में एक कमतरी मनोभाव से ग्रसित आदमी (विजयन) की शादी एक सुंदर लड़की श्यामला (संगीता) से होती है, वह पहले तो उसे प्रेम करता है, लेकिन जल्द ही उस पर संदेह करने लगता है।
इसी तर्ज पर रघुवीर यादव एवं ऋतुपर्ण सेनगुप्ता की अभिनीत हिन्दी फिल्म ‘मैं, मेरी पत्नी और वह! (2005) है। पहली फिल्म ‘वडक्कुनोक्कियंत्रम’ में तलत्तिल दिनेशन (Thalathil Dineshan के साथ पार्वती (शोभा) और इनोसेंट हैं। यहां श्रीनिवासन बहुत आलसी, अपरिपक्व और गैरजिम्मेदाराना व्यक्ति के रूप में हैं।
ऐसे कमाल के स्क्रीनप्ले राइटर एवं अभिनेता श्रीनिवासन 20 दिसम्बर 2025 को नहीं रहे। उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए किसी ने उन्हें, ‘मलयाली सेन्सिबिलिटी को निखारने वाली आवाज’ कहा, तो किसी ने ‘द वान्डरिंग विन्ड’ कह कर याद किया।
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