{"_id":"5bcf3fecbdec2269774f0226","slug":"how-are-the-circumstances-of-the-person-standing-at-the-last-position","type":"story","status":"publish","title_hn":"कैसे हालात हैं अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के","category":{"title":"Blog","title_hn":"ब्लॉग","slug":"blog"}}
कैसे हालात हैं अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के
Updated Tue, 23 Oct 2018 09:06 PM IST
विज्ञापन
सीवर के अंदर उतरकर हाथों से सफाई करता मजदूर (फाइल फोटो)
- फोटो : sabrangindia.in
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आजादी से लेकर आज तक सभी राजनेता और सरकारें, भारत के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के आंसू पोंछकर उसके चेहेरे पर मुस्कान लाने, आत्मनिर्भर बनाने और मुख्य धारा में लाने की बात करते रहे हैं। सभी सरकारें इसी व्यक्ति के विकास को केंद्र में रखकर सारी योजनाएं बनाने का दावा भी करती रही हैं। आखिर ये अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति है कौन? कभी इसकी पड़ताल की गई? या बस यह एक नाम भर है। हमें इसकी पड़ताल करनी ही होगी। अन्यथा यह अंतिम पायदान का व्यक्ति अंतिम पायदान पर ही रह जाएगा। और इसके नाम पर न जाने कितने लोग देश की संपदा को निगलते रहेंगे।
हम चांद पर बिछौना बिछाने जा रहे हैं, घोषित बुलेट ट्रेन चौखट पर आ खड़ी हुई है, एक्सप्रेस-वे पर लड़ाकू विमान लैंड कर रहे हैं, स्मार्टफोन की फेहरिस्त में भारत दुनिया मे नंबर एक पर जा पहुंचा है, स्मार्ट शहरों की घोषित सूची लंबी होती जा रही हैं। भारत के सामरिक व आर्थिक महाशक्ति बनने की बात भी हो रही है। टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर विकास की गाथा गाई जा रही है और इंटरनेट पर विकास की चैट हो रही है। वाई-फाई का जमाना है। लेकिन इस बदलाव मे अंतिम पायदान का व्यक्ति कहां है।
भारतीय समाज में अंतिम व्यक्ति ही एक समुदाय है जो आज भी अवर्ण व सवर्ण सबके लिए अछूत बना हुआ है। मुगल और अंग्रेज भी चले गए लेकिन सफाई पेशा समुदाय के जीवन में कोई खास परिवर्तन नही आया। प्रश्न यह उठता है कि जब हम चांद तक पहुंचने के उपकरण बना रहे हैं तो सीवर-सफाई के उपकरण क्यों नहीं बना सकते? आज दुनिया के उन देशों में भी सीवर-सफाई मशीनी उपकरणों द्वारा की जाती है जो चांद और मंगल तक नही पहुंचे हैं और न ही आर्थिक और सामरिक महाशक्ति हैं। तो फिर सरकारें अपने नागरिकों की गटर में जान लेने पर क्यों उतारू हैं। हमारे वैज्ञानिक और राजनेता इन खबरों से बेखर नही हैं, वे जानबूझ कर बेखबर बने हुए हैं वे नही चाहते कि सफाई-पेशा जातियां इस घृणित और अमानवीय पेशे से मुक्त हो। धर्म परिवर्तन से इनके जीवन में, विकास की एक धुंधली सी किरण अवश्य देखी गई किंतु अछूतपन और पूर्व में जाति की पहचान वहां भी इनका पीछा नही छोड़ती।
विज्ञापन
हिंदू होने के बावजूद हिंदूवादी संगठनों ने कभी इनके विकास और अधिकारों की बात नही की और न ही डॉ. अंबेडकर के नाम पर दलितों की राजनीति करने वाले तथाकथित अंबेडकरवादियों ने इनके हक और अधिकारों के लिए संसद या सड़क पर आवाज नही उठाई। सामाजिक न्याय की संकल्पना का सच्चा पैमाना ये सफाई पेशा जातियां ही हैं। मैला ढोना और गटर में उतरना, मानवता की सारी हदें पार कर जाता है। संसद में सामाजिक न्याय के पैरोकार और संविधान की दुहाई देने वालों के दर पर भी इसने वैसा ही सलूक किया जाता है जैसा तथाकथित उच्च जातियों के दर पर किया जाता है।
सफाई कर्मियों के हितों की रक्षा हेतु राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग तथा इनके पुनर्वास हेतु सफाई कर्मचारी वित्त निगम का गठन किया गया बावजूद इसके इनके हालात बद से बदतर है। देश में कोई गांव, कस्बा और शहर नही है जहां सफाई कर्मियों की मौजूदगी न हो। लेकिन राज्यवार इन्हें भिन्न-भिन्न नाम से जाना जाता है। सफाई पेशा समुदाय को एक समूह में देखा जाये तो इनकी जनसंख्या अनुसूचित जातियों में सबसे अधिक है और सबसे शोषित भी। डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि कि लोकतंत्र हमेशा शोषित के पक्ष में जाता है।
डॉ. अंबेडकर के विचार को आत्मसात करते हुए आज सफाई पेशा समुदाय मे भी पढे-लिखे, उच्च शिक्षित कुछ लोग मौजूद हैं जो सामाजिक और राजनैतिक समझ रखते हैं लेकिन उन्हें न तो तरक्की का अवसर मिला और न ही किसी राजनैतिक दल का संरक्षण। यहां तक कि तथाकथित अंबेडकरवादियों द्वारा दलितों के नाम पर बने राजनैतिक दलों में भी इन्हें कोई भागीदारी नही मिली। “चोट जिसको लगती है आह उसी की निकलती है”। (जाके पैर न फटे बिवाई – वा का जाने पीड़ पराई) अंतिम पायदान पर खड़े इस सफाई पेशा समुदाय के अधिकारों के लिए संसद से सड़क तक सब मौन है।
यह लेखक के निजी विचार हैं।
विज्ञापन
हम चांद पर बिछौना बिछाने जा रहे हैं, घोषित बुलेट ट्रेन चौखट पर आ खड़ी हुई है, एक्सप्रेस-वे पर लड़ाकू विमान लैंड कर रहे हैं, स्मार्टफोन की फेहरिस्त में भारत दुनिया मे नंबर एक पर जा पहुंचा है, स्मार्ट शहरों की घोषित सूची लंबी होती जा रही हैं। भारत के सामरिक व आर्थिक महाशक्ति बनने की बात भी हो रही है। टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर विकास की गाथा गाई जा रही है और इंटरनेट पर विकास की चैट हो रही है। वाई-फाई का जमाना है। लेकिन इस बदलाव मे अंतिम पायदान का व्यक्ति कहां है।
विज्ञापन
भारतीय समाज में अंतिम व्यक्ति ही एक समुदाय है जो आज भी अवर्ण व सवर्ण सबके लिए अछूत बना हुआ है। मुगल और अंग्रेज भी चले गए लेकिन सफाई पेशा समुदाय के जीवन में कोई खास परिवर्तन नही आया। प्रश्न यह उठता है कि जब हम चांद तक पहुंचने के उपकरण बना रहे हैं तो सीवर-सफाई के उपकरण क्यों नहीं बना सकते? आज दुनिया के उन देशों में भी सीवर-सफाई मशीनी उपकरणों द्वारा की जाती है जो चांद और मंगल तक नही पहुंचे हैं और न ही आर्थिक और सामरिक महाशक्ति हैं। तो फिर सरकारें अपने नागरिकों की गटर में जान लेने पर क्यों उतारू हैं। हमारे वैज्ञानिक और राजनेता इन खबरों से बेखर नही हैं, वे जानबूझ कर बेखबर बने हुए हैं वे नही चाहते कि सफाई-पेशा जातियां इस घृणित और अमानवीय पेशे से मुक्त हो। धर्म परिवर्तन से इनके जीवन में, विकास की एक धुंधली सी किरण अवश्य देखी गई किंतु अछूतपन और पूर्व में जाति की पहचान वहां भी इनका पीछा नही छोड़ती।
विज्ञापन
हिंदू होने के बावजूद हिंदूवादी संगठनों ने कभी इनके विकास और अधिकारों की बात नही की और न ही डॉ. अंबेडकर के नाम पर दलितों की राजनीति करने वाले तथाकथित अंबेडकरवादियों ने इनके हक और अधिकारों के लिए संसद या सड़क पर आवाज नही उठाई। सामाजिक न्याय की संकल्पना का सच्चा पैमाना ये सफाई पेशा जातियां ही हैं। मैला ढोना और गटर में उतरना, मानवता की सारी हदें पार कर जाता है। संसद में सामाजिक न्याय के पैरोकार और संविधान की दुहाई देने वालों के दर पर भी इसने वैसा ही सलूक किया जाता है जैसा तथाकथित उच्च जातियों के दर पर किया जाता है।
सफाई कर्मियों के हितों की रक्षा हेतु राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग तथा इनके पुनर्वास हेतु सफाई कर्मचारी वित्त निगम का गठन किया गया बावजूद इसके इनके हालात बद से बदतर है। देश में कोई गांव, कस्बा और शहर नही है जहां सफाई कर्मियों की मौजूदगी न हो। लेकिन राज्यवार इन्हें भिन्न-भिन्न नाम से जाना जाता है। सफाई पेशा समुदाय को एक समूह में देखा जाये तो इनकी जनसंख्या अनुसूचित जातियों में सबसे अधिक है और सबसे शोषित भी। डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि कि लोकतंत्र हमेशा शोषित के पक्ष में जाता है।
डॉ. अंबेडकर के विचार को आत्मसात करते हुए आज सफाई पेशा समुदाय मे भी पढे-लिखे, उच्च शिक्षित कुछ लोग मौजूद हैं जो सामाजिक और राजनैतिक समझ रखते हैं लेकिन उन्हें न तो तरक्की का अवसर मिला और न ही किसी राजनैतिक दल का संरक्षण। यहां तक कि तथाकथित अंबेडकरवादियों द्वारा दलितों के नाम पर बने राजनैतिक दलों में भी इन्हें कोई भागीदारी नही मिली। “चोट जिसको लगती है आह उसी की निकलती है”। (जाके पैर न फटे बिवाई – वा का जाने पीड़ पराई) अंतिम पायदान पर खड़े इस सफाई पेशा समुदाय के अधिकारों के लिए संसद से सड़क तक सब मौन है।
यह लेखक के निजी विचार हैं।