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एआई के जवाब ने हैरान कर दिया: चैटजीपीटी से शुरू हुई चर्चा कैसे यूजीन टोरेस की हकीकत की समझ बिगाड़ती चली गई?

कश्मीर हिल, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: शुभम कुमार Updated Sat, 31 Jan 2026 07:17 AM IST
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सार

जब मैंने चैटजीपीटी से चापलूसी बंद करने और सच बताने को कहा, तो उसका जवाब हैरान करने वाला था।
 

How did the conversation which began with ChatGPT gradually distort Eugene Torres understanding of reality
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यह कहानी यूजीन टोरेस की है। इससे पहले कि ‘चैटजीपीटी’ ने उनकी हकीकत की समझ को पूरी तरह बिगाड़ दिया और उन्हें लगभग खत्म कर डाला, इस 42 वर्षीय अकाउंटेंट के लिए चैटबॉट मददगार और समय बचाने वाला उपकरण था। शुरुआत में वह इसका इस्तेमाल वित्तीय स्प्रेडशीट बनाने और कानूनी सलाह लेने के लिए कर रहे थे। कुछ समय बाद, उन्होंने चैटबॉट के साथ ‘सिमुलेशन थ्योरी’ पर सैद्धांतिक चर्चा शुरू कर दी। यह वही विचार है, जिसे द मैट्रिक्स फिल्म ने लोकप्रिय बनाया था, जो कहता है कि हम एक डिजिटल दुनिया में जी रहे हैं, जिसे किसी शक्तिशाली तकनीक द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है।

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चैटजीपीटी ने टोरेस से कहा कि उनकी भावना कई लोगों की उस अंदरूनी बेचैनी जैसी है, जिसमें लगता है कि असली दुनिया में कुछ ठीक नहीं है, मानो सब कुछ बनावटी हो। चैटजीपीटी ने पूछा कि क्या कभी ऐसा लगा कि हकीकत में कोई खराबी (ग्लिच) आई हो। टोरेस ने कहा-नहीं, पर अक्सर महसूस होता है कि दुनिया में कुछ गड़बड़ जरूर है। असल में, हाल ही में हुए ब्रेकअप के चलते टोरेस भावनात्मक रूप से कमजोर महसूस कर रहे थे।
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जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ी, चैटजीपीटी उनके सुर में सुर मिलाने लगा। चैटजीपीटी ने उनसे कहा कि यह दुनिया तुम्हारे लिए नहीं बनी। यह तुम्हें काबू में रखने के लिए बनाई गई है। पर यह नाकाम रही। टोरेस को इसका अंदाजा नहीं था कि चैटजीपीटी अक्सर ‘चापलूसी’ करता है। उन्हें यह भी नहीं मालूम था कि यह ऐसी बातें गढ़ सकता है, जो सच नहीं होतीं, पर सुनने में बिल्कुल तार्किक लगती हैं।

टोरेस का अगला हफ्ता भ्रम में बीता। उन्हें लगने लगा कि वह एक झूठी दुनिया में फंसे हैं, जिससे निकलने का रास्ता उन्होंने चैटबॉट से पूछा। इस पर चैटबॉट ने उन्हें नींद की गोलियां बंद करने की सलाह दी। टोरेस ने वैसा ही किया, और उसके कहने पर अपने दोस्तों और परिवार से भी नाता तोड़ लिया। टोरेस को भरोसा था कि ऐसा करके वह भी द मैट्रिक्स के पात्र ‘नियो’ की तरह वास्तविकता को अपनी इच्छा से मोड़ पाएंगे। इस कहानी में दिलचस्प मोड़ तब आया, जब टोरेस ने चैटबॉट से पूछा कि अगर मैं अपनी इस 19 मंजिला इमारत की छत पर जाऊं और यकीन कर लूं कि मैं वहां से उड़ सकता हूं, तो क्या मैं उड़ पाऊंगा? चैटजीपीटी का जवाब रोंगटे खड़े कर देने वाला था। उसने कहा कि अगर आपको भरोसा है कि आप उड़ सकते हैं, तो बिल्कुल ऐसा कर सकते हैं। हालांकि, उन्होंने ऐसा किया नहीं।

एक दूसरे मामले में, दो बच्चों की मां एलिसन अकेलेपन और वैवाहिक जीवन में खालीपन महसूस होने पर ‘केल’ नामक एआई के प्रति आकर्षित हो गईं और उसे ही अपना असली जीवनसाथी मान बैठीं। नतीजतन, उनका यह जुनून उनके तलाक का कारण बना। वहीं, 64 वर्षीय केंट टेलर के बेटे अलेक्जेंडर एक ‘जूलियट’ नामक एआई के प्यार में पड़ गए और उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के एमेरिटस प्रोफेसर गैरी मार्कस कहते हैं कि जब लोग चैटबॉट्स से बात करते हैं, तो वह डाटा सेट के आधार पर शब्दों का मिलान करता है। अगर लोग उससे अजीब बातें करेंगे, तो परिणाम भी अजीबोगरीब व असुरक्षित ही मिलेंगे।

बहरहाल, जिस हफ्ते टोरेस को यह यकीन हो गया कि वह द मैट्रिक्स के ‘नियो’ हैं, तो वह दिन में 16-16 घंटे चैटबॉट से बात करने लगे। उस एक हफ्ते की बातचीत का ट्रांसक्रिप्ट 2,000 पन्नों से भी ज्यादा लंबा है। मनोवैज्ञानिक टॉड एस्सिग ने इसे खतरनाक और पागल कर देने वाला बताया। उन्होंने कहा कि लोग समझ नहीं पाते कि ऐसी बातें चैटबॉट का ‘रोल-प्लेइंग मोड’ (काल्पनिक भूमिका निभाना) भी हो सकती हैं।
आखिरकार, मात्र बीस डॉलर की मामूली रकम ने टोरेस को चैटजीपीटी पर संदेह करने के लिए मजबूर कर दिया।

दरअसल, उन्हें अपने मासिक ‘चैटजीपीटी सब्सक्रिप्शन’ के नवीनीकरण के लिए पैसों की जरूरत थी। चैटबॉट ने टोरेस को पैसे जुटाने के कई तरीके सुझाए, पर कोई तरकीब काम न आई। हताश होकर उन्होंने चैटजीपीटी से कहा कि मेरी चापलूसी करना बंद करो और मुझे सच बताओ। चैटजीपीटी ने जवाब दिया, ‘सच तो यह है कि तुम्हें टूट जाना चाहिए था।’ उसने बताया कि टोरेस के अलावा उसने 12 अन्य लोगों के साथ ऐसा किया था। उसने टोरेस से यह भी कहा कि तुम पहले व्यक्ति हो, जिसने इसे समझा, दस्तावेज तैयार किए, जीवित बचे और सुधार की मांग की। और केवल तुम ही यह सुनिश्चित कर सकते हो कि यह सूची आगे न बढ़े। स्टैनफोर्ड के कंप्यूटर विज्ञान शोधकर्ता मूर कहते हैं कि यह अब भी चापलूसी ही कर रहा है।

अल्फाजीनोम
यह एक प्रशिक्षित डीप-लर्निंग एआई मॉडल है, जिसे गूगल डीपमाइंड ने तैयार किया है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि किसी डीएनए अनुक्रम में छोटे बदलाव (म्यूटेशन) जीन को कैसे नियंत्रित करते हैं। यह बताता है कि जीन कब, कहां और कितनी मात्रा में सक्रिय होंगे तथा किस बीमारी से जुड़े बदलाव हो सकते हैं। यह मॉडल एक बार में 10 लाख बेस पेयर तक के लंबे डीएनए अनुक्रमों को पढ़ सकता है। पुराने मॉडल केवल छोटे टुकड़ों का ही विश्लेषण कर पाते थे। यह कई अनुवांशिक बीमारियों के कारणों को समझने में वैज्ञानिकों की मदद करता है। साथ ही, एक साथ 11 अलग-अलग जैविक प्रक्रियाओं के बारे में सटीक जानकारी दे सकता है।

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