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भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता: बायोगैस और सीबीजी से कम होगा आयात, ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी होगी मजबूत

वीरेंद्र कुमार विजय Published by: Shivam Garg Updated Sat, 21 Mar 2026 06:57 AM IST
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सार

पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। ऐसे में, बायोगैस देश के लिए मजबूत ऊर्जा विकल्प बन सकती है।

India Energy Security Boosted by Biogas and CBG Amid Global Crisis
गैस पाइपलाइन कनेक्शन - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार

वैश्विक ऊर्जा संकट, आयातित ईंधनों पर बढ़ती निर्भरता, भू-राजनीतिक अस्थिरता और तेजी से बिगड़ती पर्यावरणीय परिस्थितियों के बीच भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, विशेष रूप से पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। भारत की ऊर्जा आपूर्ति, विशेषकर एलपीजी और एलएनजी, वैश्विक घटनाओं पर अत्यधिक निर्भर है। इसने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि आयातित ऊर्जा पर अत्यधिक निर्भरता भारत के लिए दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित नहीं है। यही वह समय है, जब भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति को स्थानीय संसाधनों की ओर मोड़ना होगा।

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ऐसे समय में बायोगैस और कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) एक प्रभावी, व्यावहारिक और स्वदेशी समाधान होगा, जो न केवल ऊर्जा संकट को कम कर सकता है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हुए पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि भारत अपने विशाल जैविक संसाधनों का वैज्ञानिक व संगठित ढंग से उपयोग करे, तो ‘ऊर्जा स्वराज’ का सपना साकार किया जा सकता है और देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाया जा सकता है।
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देश के 6.5 लाख से अधिक गांवों में हर वर्ष भारी मात्रा में कृषि अवशेष, गोबर, पशु अपशिष्ट, खाद्य अपशिष्ट और अन्य जैविक पदार्थ उत्पन्न होते हैं। शहरी क्षेत्रों में भी ठोस कचरा, होटल और रेस्टोरेंट का जैविक कचरा, खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों का अपशिष्ट, चीनी मिलों से निकलने वाला प्रेसमड और अन्य औद्योगिक जैविक अपशिष्ट बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं। यदि इन्हें एकत्रित कर बायोगैस उत्पादन में परिवर्तित किया जाए, तो यह न केवल स्वच्छ ऊर्जा का एक बड़ा स्रोत बन सकता है, बल्कि अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या का भी स्थायी समाधान हो सकता है।

विभिन्न अध्ययनों के आधार पर भारत में हर वर्ष लगभग 23-24 करोड़ टन फसल अवशेष उपलब्ध होता है। इससे लगभग 60 से 80 अरब घन मीटर बायोगैस उत्पन्न की जा सकती है। इसके अलावा, भारत में प्रतिवर्ष लगभग 110-120 करोड़ टन गोबर, छह-आठ करोड़ टन शहरी ठोस अपशिष्ट तथा 7.5-8 करोड़ टन खाद्य अपशिष्ट उपलब्ध होता है। इनसे अरबों घन मीटर/वर्ष बायोगैस उत्पन्न की जा सकती है। इस बायोगैस को शुद्ध कर लाखों टन प्रति वर्ष कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) प्राप्त की जा सकती है। यह मात्रा भारत के परिवहन ईंधन की कुल मांग का लगभग 20 से 25 प्रतिशत तक प्रतिस्थापित करने की क्षमता रखती है।

इस दृष्टि से बायोगैस और सीबीजी न केवल वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत हैं, बल्कि देश के ऊर्जा आयात बिल को कम करने और विदेशी मुद्रा की बचत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में करीब 1.2 करोड़ घरेलू बायोगैस संयंत्र स्थापित करने की क्षमता है, जिनमें से करीब 51 लाख संयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं। यह दर्शाता है कि बायोगैस तकनीक भारत में सफलतापूर्वक कार्य कर सकती है और स्वच्छ ईंधन की आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम है। बायोगैस संयंत्रों से निकलने वाला डाइजेस्ट उच्च गुणवत्ता वाला जैविक उर्वरक होता है, जो मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाकर रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता को कम करता है।

यह स्पष्ट है कि वर्तमान वैश्विक ऊर्जा संकट भारत के लिए एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी। भारत के गांवों में मौजूद जैविक संपदा को ऊर्जा में परिवर्तित करना केवल एक तकनीकी विकल्प नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आवश्यकता है। आज भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपने स्थानीय संसाधनों का अधिकतम उपयोग करे और एक आत्मनिर्भर, स्वच्छ व सतत ऊर्जा भविष्य की ओर अग्रसर हो। - लेखक आईआईटी, दिल्ली में प्रोफेसर हैं।

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