प्रधानमंत्री की अपील और साइकिल की सवारी: देश को प्रतीकों से आगे बढ़कर बुनियादी बदलाव की जरूरत
Ludhiana Bicycle Manufacturing Hub: वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा साइकिल उत्पादक होने के बावजूद भारत में सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर और कार-केंद्रित शहरी नीतियों की कमी के कारण साइकिल चलाना बेहद जोखिम भरा है। टिकाऊ भविष्य के लिए ठोस नीतिगत बदलाव और सामाजिक दृष्टिकोण बदलना जरूरी है।
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India Cycling Industry Paradox: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की बचत की अपील के बाद देश के कई हिस्सों में जो दृश्य सामने आए, वे निस्संदेह प्रेरणादायक थे। न्यायाधीश, वरिष्ठ आईएएस-आईपीएस, जनप्रतिनिधि और पुलिसकर्मी, ये सभी अपने सुरक्षा काफिलों और सरकारी वाहनों को छोड़कर साइकिल से दफ्तर जाते नजर आ रहे हैं। व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे इस वर्ग का यह कदम एक सकारात्मक संकेत था कि ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण जैसे मुद्दे अब केवल भाषणों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि व्यवहार में भी उतरने लगे हैं, लेकिन इन उत्साहजनक तस्वीरों के पीछे एक गहरी और असहज सच्चाई छिपी है। यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या यह बदलाव स्थायी है या केवल कुछ दिनों का प्रतीकात्मक प्रदर्शन?
शहरी ढांचे की कमी और साइकिल चालकों का जोखिम
क्या साइकिल चलाने का यह चलन हमारे शहरी जीवन का हिस्सा बन पाएगा या फिर यह भी अन्य अभियानों की तरह समय के साथ फीका पड़ जाएगा?समस्या इरादों की कमी नहीं है, बल्कि हमारे शहरों के उस ढांचे की है, जो साइकिल जैसे सरल और पर्यावरण-अनुकूल साधन के लिए भी जगह नहीं बना पाया है। भारत जैसे देश में, जो साइकिल उत्पादन के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है, वहां साइकिल चलाना आज भी जोखिम भरा अनुभव बन चुका है।
साइकिल उत्पादन में भारत का दबदबा
भारत में साइकिल को लेकर दिखने वाला विरोधाभास किसी बहुत बड़ी विडंबना से कम नहीं है। औद्योगिक धरातल पर भारत वैश्विक पटल पर साइकिल निर्माण का एक बहुत बड़ा और अजेय पावरहाउस है। चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा साइकिल उत्पादक देश है। देश के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों, विशेषकर पंजाब के लुधियाना से हर साल लगभग 1.5 करोड़ से 1.8 करोड़ साइकिलों का रिकॉर्ड उत्पादन होता है। हमारा साइकिल उद्योग लगातार आधुनिक हो रहा है। आज साधारण साइकिलों से लेकर गियर वाली प्रीमियम स्पोर्ट्स साइकिलों और पर्यावरण-अनुकूल ई-साइकिल तक का निर्माण घरेलू स्तर पर बड़े पैमाने पर हो रहा है।
भारतीय साइकिलों की वैश्विक धमक और निर्यात
भारतीय साइकिलों की धमक केवल देश के भीतर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में है। भारत हर साल दुनिया के लगभग 100 से अधिक देशों को प्रतिवर्ष 10 लाख से अधिक साइकिलों और उनके कल-पुर्जों का निर्यात करता है। भारत से साइकिल आयात करने वाले प्रमुख देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड, इटली जैसे विकसित यूरोपीय देश शामिल हैं, जहां भारतीय साइकिलों और पर्यावरण-अनुकूल ई-बाइक्स की भारी मांग है। अफ्रीकी महाद्वीप के देश जैसे नाइजीरिया, केन्या, घाना और पड़ोसी देश बांग्लादेश व श्रीलंका भी भारतीय साइकिलों के बड़े खरीदार हैं।
अजीब विडंबना - दुनिया में मशहूर, अपनों के बीच मजबूर
हम निर्माण और गुणवत्ता के क्षेत्र में किसी से पीछे नहीं हैं, लेकिन विडंबना यह है कि जिस देश की साइकिलें दुनिया भर में दौड़ रही हैं, उसी देश के अपने शहरों में साइकिल चलाने के लिए सुरक्षित स्थान उपलब्ध नहीं है। भारत का आम नागरिक, जो साइकिल को स्वास्थ्य, पर्यावरण या आर्थिक कारणों से अपनाना चाहता है, वह सड़कों पर खुद को असुरक्षित और उपेक्षित महसूस करता है। हमारे यहां साइकिल को आज भी ‘गरीबों का वाहन’ मानने की मानसिकता ने इसे शहरी नियोजन से लगभग बाहर कर दिया है।
कार-केंद्रित सड़कें और साइकिल चालकों की असुरक्षा
आज भारत के अधिकांश शहरों की सड़कें केवल मोटर वाहनों को ध्यान में रखकर डिजाइन की जाती हैं। कारों और मोटरसाइकिलों की बढ़ती संख्या ने सड़कों को इतना भीड़भाड़ वाला बना दिया है कि वहां साइकिल के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बचती। भारी और तेज रफ्तार वाहनों के बीच साइकिल चालक पूरी तरह असुरक्षित हो जाता है। कई बार तो उसे सड़क पर एक बाधा के रूप में देखा जाता है, जिससे उसका आत्मविश्वास और भी कमजोर हो जाता है। जहां कहीं साइकिल ट्रैक बनाए भी गए हैं, उनकी स्थिति संतोषजनक नहीं है। कई स्थानों पर ये ट्रैक अतिक्रमण का शिकार हो चुके हैं।
अधूरे साइकिल ट्रैक और अतिक्रमण की मार
कहीं इन्हें पार्किंग स्थल बना दिया गया है, तो कहीं वे अधूरे और असंगत तरीके से बनाए गए हैं। कुछ ट्रैक अचानक खत्म हो जाते हैं, जिससे साइकिल सवार सीधे तेज रफ्तार ट्रैफिक के बीच पहुंच जाता है। इस तरह की अव्यवस्थित योजना साइकिल चालकों के लिए सुरक्षा के बजाय खतरे को बढ़ाती है। सड़क दुर्घटनाओं का बढ़ता खतरा इस समस्या को और गंभीर बना देता है। देश में हर साल बड़ी संख्या में पैदल यात्री और साइकिल चालक सड़क हादसों का शिकार होते हैं। यही कारण है कि मध्यम वर्ग और कामकाजी युवा चाहकर भी साइकिल को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा नहीं बना पाते। माता-पिता अपने बच्चों को साइकिल से स्कूल भेजने से डरते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि सड़कों पर सुरक्षा का कोई भरोसा नहीं है।
त्रुटिपूर्ण शहरी नीति और यूरोप का सफल मॉडल
भारत की शहरी नीति लंबे समय से कार-केंद्रित रही है। यातायात की समस्या का समाधान सड़कों को चौड़ा करने, फ्लाईओवर बनाने और एक्सप्रेस-वे तैयार करने में खोजा गया है। लेकिन यह सोच मूल रूप से त्रुटिपूर्ण है। जितनी अधिक सड़कें बनाई जाती हैं, उतनी ही अधिक गाड़ियां सड़कों पर उतरती हैं, और अंततः समस्या जस की तस बनी रहती है। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि भारत की जलवायु और जनसंख्या के कारण साइकिल आधारित मॉडल यहां लागू नहीं हो सकता। लेकिन यह तर्क पूरी तरह तथ्यात्मक नहीं है। यूरोप के कई देश भी एक समय इसी समस्या से जूझ रहे थे। उन्होंने नीतिगत बदलाव किए, कारों पर नियंत्रण लगाया और साइकिल के लिए सुरक्षित ढांचा तैयार किया। आज वहां साइकिल न केवल परिवहन का साधन है, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी है।
सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर और पब्लिक ट्रांसपोर्ट से जुड़ाव
भारत के लिए भी समाधान असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए दीर्घकालिक दृष्टि और ठोस नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है। सबसे पहले, साइकिल ट्रैक केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि वास्तव में सुरक्षित और उपयोगी होने चाहिए। उन्हें मुख्य सड़क से भौतिक रूप से अलग किया जाना चाहिए, ताकि साइकिल सवार बिना भय के यात्रा कर सके। दूसरा, साइकिल को सार्वजनिक परिवहन से जोड़ना आवश्यक है। मेट्रो स्टेशनों, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों के साथ साइकिल सुविधाएं विकसित की जानी चाहिए, ताकि लोग आसानी से अपने सफर के पहले और अंतिम हिस्से को साइकिल से पूरा कर सकें। तीसरा, शहरी नियोजन की प्राथमिकताओं को बदलना होगा। सड़कों पर पहला अधिकार नागरिकों का होना चाहिए, न कि केवल वाहनों का। जब तक यह सोच नहीं बदलेगी, तब तक साइकिल जैसे साधन को उचित स्थान नहीं मिल पाएगा।
सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव और भविष्य की चुनौतियां
इसके साथ ही, सामाजिक दृष्टिकोण में भी बदलाव जरूरी है। साइकिल को ‘गरीबी का प्रतीक’ मानने के बजाय ‘स्मार्ट और जिम्मेदार विकल्प’ के रूप में स्वीकार करना होगा। कॉर्पोरेट और निजी संस्थानों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए। साइकिल से आने वाले कर्मचारियों को प्रोत्साहन और सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए। साइकिल को केवल एक प्रतीक या अस्थायी अभियान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह हमारे शहरों को अधिक स्वस्थ, स्वच्छ और टिकाऊ बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन है। प्रधानमंत्री की अपील ने एक सकारात्मक शुरुआत की है, लेकिन यह शुरुआत तभी सार्थक होगी जब इसे ठोस नीतियों, सुरक्षित बुनियादी ढांचे और सामाजिक बदलाव के साथ जोड़ा जाए। अन्यथा, यह पहल भी कुछ दिनों की तस्वीरों और सुर्खियों तक सीमित रह जाएगी। तब सबसे बड़ा सवाल यही होगा, क्या हम सच में बदलाव चाहते हैं या केवल बदलाव का दिखावा करने में संतुष्ट हैं?
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