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मशीन में महानता के गुण नहीं आ सकते: असली अवसर रोबोट चैंपियन बनाने में नहीं, अगर सामने वाला खिलाड़ी रोबोट हो...
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सार
रोबोट भले आपको हरा दे, पर वह उन गुणों को हासिल नहीं कर सकता, जो किसी खिलाड़ी को महान बनाते हैं।
कम समय में आकर्षक व प्रभावशाली वीडियो बनाए जा सकते हैं
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी
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विस्तार
हाल ही में, एक चौंकाने वाली खबर सामने आई कि एक रोबोट ने मैराथन दौड़कर इन्सानों के वर्ल्ड रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। लगभग इसी समय, एआई से लैस एक रोबोट ने टेबल टेनिस में एक बेहतरीन इन्सानी खिलाड़ी को मात दे दी। भले ही रोबोट के पास इन्सानों जैसा अनुभव नहीं था, पर उसने अपनी कमी की भरपाई बेहद तेज और लगातार सटीक प्रतिक्रिया देकर पूरी की। ये घटनाएं किसी बड़े बदलाव का संकेत देती हैं। पहली बार ऐसा महसूस हो रहा है कि मशीनें इन्सानों के सबसे खास क्षेत्रों में से एक (खेल) में भी कदम रख चुकी हैं।
वास्तव में, स्पोर्ट्स रोबोटिक्स का मकसद मुकाबला करना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि मशीनें कैसे ऐसे माहौल में काम करना सीखें, जो लगातार बदलता रहता है और जो अनुमानित नहीं होता। यह भी जानना जरूरी है कि इसका इन्सानी प्रदर्शन पर क्या असर पड़ सकता है। आखिर रोबोट को खेल खेलना सिखाया कैसे जाता है? रोबोट को प्रशिक्षित करने का तरीका इन्सानों से बिल्कुल अलग होता है। इन्सान अभ्यास, कोचिंग और अनुभव से सीखते हैं। वे बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालते रहते हैं। जबकि रोबोट को सिमुलेशन, डाटा और कंट्रोल एल्गोरिदम के जरिये सिखाया जाता है।
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रोबोट यह सीखता है कि किसी वस्तु को कैसे पहचानना है, उसकी गति का अंदाजा कैसे लगाना है और अपने शरीर के अलग-अलग हिस्सों के बीच तालमेल कैसे बनाना है। इन्सानी खिलाड़ियों की गतिविधियों को रिकॉर्ड करके रोबोट को भी वैसी ही हरकतें सिखाई जाती हैं। इन रोबोट्स का इस्तेमाल मानव खिलाड़ियों को बेहतर तरीके से प्रशिक्षित करने के लिए भी किया जा सकता है। खेल की दुनिया में एक बड़ी चुनौती होती है-ऐसी अभ्यास योजना बनाना, जो प्रभावी हो और संतुलित भी। खिलाड़ियों को अपने कौशल को निखारने के लिए बार-बार अभ्यास की जरूरत होती है, साथ ही उन्हें ऐसी परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ता है, जो असली मुकाबले जैसी हों। अगर अभ्यास बहुत ज्यादा दोहराव वाला हो जाए, तो वह अनुमानित बन जाता है; और अगर बहुत ज्यादा विविधता हो, तो वह बिखरा हुआ और अव्यवस्थित लगने लगता है। ऐसे में, संतुलन बनाना जरूरी है। रोबोटिक्स संतुलन बनाने का एक मजबूत और व्यावहारिक रास्ता पेश करता है।
एक रोबोटिक ट्रेनिंग पार्टनर किसी एक ही क्रिया को बार-बार, बेहद तेज और सटीक तरीके से दोहरा सकता है, और उसमें नियंत्रित बदलाव भी जोड़ सकता है। मसलन, एक रोबोटिक टेनिस सर्वर विश्व-स्तरीय खिलाड़ी की गति और ताकत की हूबहू नकल कर सकता है, साथ ही वह गेंद की गति, उसकी दिशा और गिरने की जगह को योजनाबद्ध तरीके से बदल भी सकता है। इससे खिलाड़ी को हर बार एक नया, पर नियंत्रित चुनौतीपूर्ण अनुभव मिलता है। खेल विज्ञान में इसे ‘सीखने का प्रतिनिधि माहौल’ कहा जाता है, जहां अभ्यास वास्तविक मैच जैसी परिस्थितियों (देखना, समझना और तुरंत निर्णय लेना) को दोहराता है। पारंपरिक कोचों के लिए ऐसा माहौल बनाना कठिन होता है, लेकिन रोबोटिक्स इसे आसान और प्रभावी बना देता है। ऐसे में, सवाल उठता है कि क्या रोबोट कभी ‘महान खिलाड़ी’ बन पाएंगे?
दरअसल, यह तय माना जा रहा है कि आने वाले दस वर्षों में रोबोट और भी ज्यादा फुर्तीले, ताकतवर व कठिन परिस्थितियों में काम करने में सक्षम हो जाएंगे। आज जो काम उनके लिए चुनौती हैं (जैसे ऊबड़-खाबड़ जमीन पर संतुलन बनाकर दौड़ना या सटीक तरीके से गेंद पकड़ना और फेंकना) वे धीरे-धीरे आसान हो जाएंगे। हालांकि, रोबोट्स की कुछ बुनियादी सीमाएं बनी रहेंगी। खेल में महारत हासिल करना सिर्फ तकनीकी सटीकता का नाम नहीं है। यह रचनात्मकता, दबाव में सही फैसला लेने की क्षमता और बदलते हालात के अनुसार खुद को ढालने की कला का मेल है। असली खिलाड़ी वही होता है, जो अनुभव, भावनाओं और परिस्थितियों से तालमेल बिठाकर प्रदर्शन करता है। रोबोट को किसी खास काम (खेल) में माहिर बनाया जा सकता है, पर वे उस तालमेल को महसूस नहीं कर सकते, जैसा इन्सान करता है। यही वजह है कि बेशक रोबोट कुछ खास मामलों में इन्सानों से आगे निकल सकते हैं, लेकिन वे ‘महान’ नहीं बन पाएंगे। ऐसे में, रोबोट्स खिलाड़ियों की जगह लेने के बजाय, खेल के माहौल का अहम हिस्सा बन सकते हैं। दरअसल, असली अवसर रोबोट चैंपियन बनाने में नहीं, बल्कि इन्सानी प्रदर्शन को और बेहतर समझने और खिलाड़ियों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में छिपा है।
पिका एआई
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-साथ में मार्क पोर्टस