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Petrol Diesel Price Hike: पेट्रोल किराने का सामान नहीं, जितना खरीद लो
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सार
पेट्रोलियम पदार्थों को सामान्यतः लोग केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित समझते हैं, जबकि कच्चे तेल को रिफाइनरी में प्रसंस्करण के बाद अनेक महत्वपूर्ण उत्पादों में बदला जाता है।
तेल भरवाते समय इन बातों का रखें ध्यान
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
पेट्रोलियम पदार्थों की बचत और मितव्ययता का प्रश्न केवल मौजूदा पश्चिम एशियाई संकट से पैदा हुई अस्थायी चुनौती नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय की सबसे बड़ी वैश्विक आर्थिक और पर्यावरणीय चिंताओं में से एक है। हाइड्रोकार्बन आधारित ईंधन धरती पर सीमित मात्रा में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन हैं और एक दिन इनके भंडार समाप्त होना तय है।
यही कारण है कि दुनिया भर की सरकारें समय-समय पर ऊर्जा संरक्षण और ईंधन की बचत की अपील करती रही हैं। भारत में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हालिया वैश्विक संकट के बीच ईंधन बचाने की अपील करते हुए कई सरकारी कदमों की घोषणा की है।
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इसके साथ ही चार वर्षों में पहली बार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि की गई है। किंतु केवल सरकारी घोषणाएं इस संकट का स्थायी समाधान नहीं बन सकतीं, जब तक समाज स्वयं यह नहीं समझेगा कि पेट्रोल और डीजल कोई ऐसा किराने का सामान नहीं है जिसे धनबल के आधार पर जितना चाहे उतना खरीदकर फूंक दिया जाए।
पेट्रोल और पेट्रोलियम पदार्थ
पेट्रोलियम पदार्थों को सामान्यतः लोग केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित समझते हैं, जबकि कच्चे तेल को रिफाइनरी में प्रसंस्करण के बाद अनेक महत्वपूर्ण उत्पादों में बदला जाता है। इनमें पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, केरोसिन, विमान ईंधन, इंजन ऑयल, बिटुमेन, पैराफिन वैक्स, प्लास्टिक, उर्वरक, सिंथेटिक रबर और अनेक पेट्रोकेमिकल उत्पाद शामिल हैं।
आधुनिक अर्थव्यवस्था का लगभग पूरा ढांचा इन्हीं उत्पादों पर आधारित है। परिवहन व्यवस्था, उद्योग, सड़क निर्माण, दवा उद्योग, कृषि उत्पादन और घरेलू जीवन तक इनके बिना ठप पड़ सकते हैं।
यही कारण है कि फरवरी 2026 से पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के कारण जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं तो उसका सीधा प्रभाव भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर पड़ा। इसी दबाव में 15 मई 2026 को देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में औसतन तीन रुपये प्रति लीटर की वृद्धि करनी पड़ी।
असल समस्या मानसिकता की
असल समस्या केवल कीमत बढ़ने की नहीं है, बल्कि उस मानसिकता की है जिसमें ईंधन को असीमित उपभोग की वस्तु मान लिया गया है। समाज का एक प्रभावशाली और संपन्न वर्ग तेल की सबसे अधिक फिजूलखर्ची करता है, जबकि उसका आर्थिक बोझ पूरे समाज को महंगाई के रूप में भुगतना पड़ता है।
यह समझना आवश्यक है कि पेट्रोलियम संसाधन सीमित हैं और इनके आयात पर देश को भारी विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है।
इसके लिए हर वर्ष अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बाहर जाती है। यह धन किसी व्यक्ति विशेष की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि देश की सामूहिक आर्थिक पूंजी है, जिसे निर्यातकों, श्रमिकों और विदेशों में काम कर रहे भारतीयों की मेहनत से अर्जित किया जाता है।
इसके बावजूद समाज में यह धारणा तेजी से मजबूत हुई है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी जेब से कीमत चुका रहा है तो उसे जितना चाहे उतना पेट्रोल या डीजल खर्च करने का अधिकार है।
यही सोच सबसे अधिक खतरनाक है। एक वर्ग अपनी आर्थिक हैसियत दिखाने के लिए बड़ी-बड़ी लक्जरी गाड़ियों का प्रदर्शन करता है, जिनमें कई वाहन एक लीटर ईंधन में चार या पांच किलोमीटर ही चलते हैं।
छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी भारी वाहन सड़कों पर दौड़ाए जाते हैं। कई परिवारों में एक ही घर के सदस्य अलग-अलग वाहनों से कुछ सौ मीटर की दूरी तय करते हैं। यह केवल निजी फिजूलखर्ची नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी है।
सरकारी तंत्र में ईंधन की बर्बादी
सरकारी तंत्र में भी यह प्रवृत्ति कम नहीं है। सरकारी पद और सुविधाओं की आड़ में ईंधन की बर्बादी लंबे समय से एक गंभीर समस्या बनी हुई है।
सरकारी वाहनों का निजी उपयोग, अधिकारियों और नेताओं के परिजनों द्वारा वाहनों का दुरुपयोग तथा अनावश्यक काफिलों की संस्कृति देश की ऊर्जा नीति पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। यदि आम नागरिक से ईंधन बचाने की अपेक्षा की जाती है तो सबसे पहले सत्ता और प्रशासनिक तंत्र को उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
सरकारी राजस्व पर भारी दबाव
वैश्विक संकट के समय सरकारों को जनता को राहत देने के लिए पेट्रोलियम उत्पादों पर करों में कटौती करनी पड़ती है। केंद्र और राज्य सरकारें उत्पाद शुल्क और वैट कम करके कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश करती हैं। इससे सरकारी राजस्व पर भारी दबाव पड़ता है। इसके अलावा तेल विपणन कंपनियों को भी लंबे समय तक घाटा उठाना पड़ता है।
इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सार्वजनिक कंपनियां जब महंगा कच्चा तेल खरीदकर घरेलू बाजार में नियंत्रित कीमतों पर बेचती हैं तो उन्हें भारी अंडर-रिकवरी झेलनी पड़ती है। अंततः इन कंपनियों को बचाने के लिए सरकार को बजट से हजारों करोड़ रुपये देने पड़ते हैं।
यह पैसा किसी एक वर्ग से नहीं आता, बल्कि देश के हर करदाता के योगदान से जुटाया जाता है। विडंबना यह है कि जिन लोगों के पास निजी वाहन तक नहीं हैं, वे भी अप्रत्यक्ष रूप से अमीर वर्ग की ईंधन फिजूलखर्ची का बोझ उठाते हैं।
ईंधन की बर्बादी पर्यावरणीय अन्याय भी
ईंधन की बर्बादी केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि पर्यावरणीय अन्याय भी है। बड़ी गाड़ियों से निकलने वाला धुआं और कार्बन उत्सर्जन समाज के कमजोर वर्गों के स्वास्थ्य पर सबसे अधिक प्रभाव डालता है।
वातानुकूलित वाहनों में बैठा संपन्न वर्ग प्रदूषण से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहता है, जबकि सड़क किनारे काम करने वाले मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले, पैदल यात्री और गरीब परिवार जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर होते हैं। यह स्थिति सामाजिक असमानता को और गहरा करती है।
उत्तराखंड और हिमाचल जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्यों में पर्यटन और यात्राओं के दौरान अनावश्यक वाहनों की भीड़ पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव डाल रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ता कार्बन उत्सर्जन ग्लेशियरों के पिघलने और जलवायु परिवर्तन की गति को भी तेज कर रहा है।
व्यक्तिगत अधिकार मानने की प्रवृत्ति पर रोक
मौजूदा वैश्विक संकट स्पष्ट संकेत दे रहा है कि ऊर्जा सुरक्षा आने वाले समय की सबसे बड़ी राष्ट्रीय चुनौती बनने जा रही है। यदि आज भी समाज ने ईंधन के विवेकपूर्ण उपयोग की आदत नहीं डाली तो भविष्य में संकट और गंभीर हो सकता है।
इसलिए आवश्यकता केवल कीमत बढ़ाने या सरकारी अपीलों की नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना विकसित करने की है। कार पूलिंग, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, अनावश्यक यात्राओं में कमी और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ना अब विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी बन चुका है।
जब तक देश का प्रत्येक नागरिक पेट्रोल और डीजल को एक अमूल्य राष्ट्रीय धरोहर के रूप में नहीं देखेगा, तब तक इस संकट से स्थायी मुक्ति संभव नहीं है। संसाधनों की अंधाधुंध खपत को व्यक्तिगत अधिकार मानने की प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी।
पेट्रोल और डीजल कोई साधारण किराने का सामान नहीं हैं कि जिसे धनबल के आधार पर जितना चाहे उतना खरीद लिया जाए। यह राष्ट्र की सामूहिक संपत्ति है और इसकी एक-एक बूंद पर देश के हर नागरिक का समान अधिकार और समान दायित्व है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।