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जानना जरूरी है: अद्रोहक कैसे बने दिव्य-द्रष्टा, जिनके जैसा जितेंद्रिय पुरुष कोई नहीं
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सार
देवताओं ने राजकुमार से कहा, ‘इस संसार में अद्रोहक जैसा जितेंद्रिय पुरुष कोई नहीं है। इन्होंने काम, लोभ व क्रोध पर विजय पा ली है। इनके हृदय में श्रीवासुदेव बसते हैं। इनके दर्शन व स्पर्श से मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त करता है।’
अद्रोहक का किस्सा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पूर्वकाल में एक राजकुमार थे, जिनकी पत्नी रूप, गुण व शील में कामदेव की पत्नी रति व इंद्र की पत्नी शची के समान मन को मोहित करने वाली थी। उनका नाम भी सुंदरी था। राजकुमार अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे। एक दिन अचानक राजकुमार को किसी कार्य से दूर जाना पड़ा। उनके मन में चिंता थी। वह सोचने लगे, ‘मैं अपनी पत्नी को कहां छोडूं, जहां इसका सतीत्व और सम्मान सुरक्षित रह सके?’ बहुत विचार करने के बाद उन्हें एक व्यक्ति उपयुक्त लगा। वह थे, धर्मात्मा, जितेंद्रिय अद्रोहक।
राजकुमार, अद्रोहक के पास पहुंचे और उनसे अपनी पत्नी की रक्षा का निवेदन किया। अद्रोहक को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह बोले, ‘तात! मैं न आपका पिता हूं, न भाई, न कोई संबंधी। न ही मैं आपकी पत्नी के कुल का हूं। फिर आप मुझ पर इतना भरोसा क्यों कर रहे हैं?’ राजकुमार बोले, ‘महात्मन ! इस संसार में आपके समान धर्मपरायण और संयमी पुरुष दूसरा कोई नहीं है। मुझे आप पर पूर्ण विश्वास है।’ अद्रोहक ने विनम्रता से कहा, ‘ऐसी सुंदरी की रक्षा करना सरल नहीं है। नगर में अनेक कामी पुरुष हैं। यहां किसी स्त्री के सतीत्व की रक्षा करना बेहद कठिन है।’
राजकुमार ने कहा, ‘मैं सब सोच-विचार कर ही आपके पास आया हूं। जैसे भी हो, आप ही इसकी रक्षा करें।’ फिर अद्रोहक ने कहा, ‘यदि ये मेरे घर पर रहेंगी, तो इन्हें मेरी पत्नी के साथ मेरी शय्या पर ही सोना पड़ेगा, ताकि कोई संदेह न करे। परंतु मैं इनके साथ अनुचित व्यवहार करूंगा, तभी इनकी रक्षा कर पाना संभव है।’ राजकुमार ने सोच-विचार करके कहा, ‘मुझे स्वीकार है। आपको जो उचित लगे, वही कीजिए।’ फिर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, ‘सुंदरी, ये जो कुछ कहें, वही करना। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं होगा।’ यह कहकर राजकुमार चले गए।
अद्रोहक, प्रतिदिन अपनी पत्नी और सुंदरी के बीच में सोते थे। परंतु उनका मन विचलित नहीं हुआ। सुंदरी को वह माता के समान मानते थे। सुंदरी भी अद्रोहक को पिता के समान मानती थी। इस प्रकार दोनों संयमपूर्वक रहते थे। छह मास के बाद जब राजकुमार लौटे, तो उन्होंने लोगों से अपनी पत्नी और अद्रोहक के आचरण के विषय में पूछा। कुछ लोगों ने उनके निर्णय की प्रशंसा की, किंतु कुछ ने संदेहपूर्ण बातें भी कहीं। अद्रोहक ने लोगों की बातें सुनीं। उन्हें यह सोचकर दुख हुआ कि धर्मपूर्वक आचरण करने पर भी लोग उनके चरित्र को कलंकित कर रहे हैं। लोकनिंदा से मुक्त होने का संकल्प करके उन्होंने अपने लिए एक चिता बनाई और अग्नि प्रज्वलित की। उसी क्षण राजकुमार वहां पहुंच गए।
अद्रोहक ने उनसे कहा, ‘मैंने आपके लिए कठोर धर्म निभाया, किंतु वह सब व्यर्थ हो गया। अब मैं आत्मदाह करूंगा।’ इतना कहकर वह अग्नि में कूद पड़े। परंतु अग्नि उनके शरीर, वस्त्र और केशों को जला न सकी। उसी क्षण आकाश से देवता प्रकट हुए। उन्होंने पुष्प-वर्षा की और अद्रोहक की महिमा का गुणगान किया। जिन लोगों ने अद्रोहक की निंदा की थी, उनके मुख पर कोढ़ हो गया। ऋषि-मुनि और बाकी लोग उनके तेज से विस्मित हो गए। सबने मिलकर अद्रोहक को नया नाम दिया ‘सज्जनाद्रोहक’!
देवताओं ने राजकुमार से कहा, ‘इस संसार में अद्रोहक जैसा जितेंद्रिय पुरुष कोई नहीं है। इन्होंने काम, लोभ और क्रोध पर विजय पा ली है। इनके हृदय में भगवान श्रीवासुदेव निवास करते हैं। इनके दर्शन व स्पर्श से मनुष्य पापमुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त करता है।’ यह कहकर देवता स्वर्ग को लौट गए तथा राजकुमार अपनी पत्नी के साथ राजमहल। इस पुण्य-प्रभाव से अद्रोहक को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई। वह तीनों लोकों की बातें सहज ही जानने लगे। अद्रोहक के जीवन से यही शिक्षा मिलती है कि संयम, शुद्ध आचरण और धर्मपालन से मनुष्य देवतुल्य बन सकता है।
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राजकुमार, अद्रोहक के पास पहुंचे और उनसे अपनी पत्नी की रक्षा का निवेदन किया। अद्रोहक को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह बोले, ‘तात! मैं न आपका पिता हूं, न भाई, न कोई संबंधी। न ही मैं आपकी पत्नी के कुल का हूं। फिर आप मुझ पर इतना भरोसा क्यों कर रहे हैं?’ राजकुमार बोले, ‘महात्मन ! इस संसार में आपके समान धर्मपरायण और संयमी पुरुष दूसरा कोई नहीं है। मुझे आप पर पूर्ण विश्वास है।’ अद्रोहक ने विनम्रता से कहा, ‘ऐसी सुंदरी की रक्षा करना सरल नहीं है। नगर में अनेक कामी पुरुष हैं। यहां किसी स्त्री के सतीत्व की रक्षा करना बेहद कठिन है।’
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राजकुमार ने कहा, ‘मैं सब सोच-विचार कर ही आपके पास आया हूं। जैसे भी हो, आप ही इसकी रक्षा करें।’ फिर अद्रोहक ने कहा, ‘यदि ये मेरे घर पर रहेंगी, तो इन्हें मेरी पत्नी के साथ मेरी शय्या पर ही सोना पड़ेगा, ताकि कोई संदेह न करे। परंतु मैं इनके साथ अनुचित व्यवहार करूंगा, तभी इनकी रक्षा कर पाना संभव है।’ राजकुमार ने सोच-विचार करके कहा, ‘मुझे स्वीकार है। आपको जो उचित लगे, वही कीजिए।’ फिर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, ‘सुंदरी, ये जो कुछ कहें, वही करना। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं होगा।’ यह कहकर राजकुमार चले गए।
अद्रोहक, प्रतिदिन अपनी पत्नी और सुंदरी के बीच में सोते थे। परंतु उनका मन विचलित नहीं हुआ। सुंदरी को वह माता के समान मानते थे। सुंदरी भी अद्रोहक को पिता के समान मानती थी। इस प्रकार दोनों संयमपूर्वक रहते थे। छह मास के बाद जब राजकुमार लौटे, तो उन्होंने लोगों से अपनी पत्नी और अद्रोहक के आचरण के विषय में पूछा। कुछ लोगों ने उनके निर्णय की प्रशंसा की, किंतु कुछ ने संदेहपूर्ण बातें भी कहीं। अद्रोहक ने लोगों की बातें सुनीं। उन्हें यह सोचकर दुख हुआ कि धर्मपूर्वक आचरण करने पर भी लोग उनके चरित्र को कलंकित कर रहे हैं। लोकनिंदा से मुक्त होने का संकल्प करके उन्होंने अपने लिए एक चिता बनाई और अग्नि प्रज्वलित की। उसी क्षण राजकुमार वहां पहुंच गए।
अद्रोहक ने उनसे कहा, ‘मैंने आपके लिए कठोर धर्म निभाया, किंतु वह सब व्यर्थ हो गया। अब मैं आत्मदाह करूंगा।’ इतना कहकर वह अग्नि में कूद पड़े। परंतु अग्नि उनके शरीर, वस्त्र और केशों को जला न सकी। उसी क्षण आकाश से देवता प्रकट हुए। उन्होंने पुष्प-वर्षा की और अद्रोहक की महिमा का गुणगान किया। जिन लोगों ने अद्रोहक की निंदा की थी, उनके मुख पर कोढ़ हो गया। ऋषि-मुनि और बाकी लोग उनके तेज से विस्मित हो गए। सबने मिलकर अद्रोहक को नया नाम दिया ‘सज्जनाद्रोहक’!
देवताओं ने राजकुमार से कहा, ‘इस संसार में अद्रोहक जैसा जितेंद्रिय पुरुष कोई नहीं है। इन्होंने काम, लोभ और क्रोध पर विजय पा ली है। इनके हृदय में भगवान श्रीवासुदेव निवास करते हैं। इनके दर्शन व स्पर्श से मनुष्य पापमुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त करता है।’ यह कहकर देवता स्वर्ग को लौट गए तथा राजकुमार अपनी पत्नी के साथ राजमहल। इस पुण्य-प्रभाव से अद्रोहक को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई। वह तीनों लोकों की बातें सहज ही जानने लगे। अद्रोहक के जीवन से यही शिक्षा मिलती है कि संयम, शुद्ध आचरण और धर्मपालन से मनुष्य देवतुल्य बन सकता है।
