सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Marine mammals on the Konkan coast of Maharashtra precious treasures of biological resources

समुद्री जैव विविधता: कोंकण तट पर संरक्षित समुद्री जीव, जैवसंपदा के अनमोल खजाने

Prachi Hatkar प्राची हटकर
Updated Fri, 13 Feb 2026 03:07 PM IST
विज्ञापन
सार

समुद्री जैवविविधता के अध्ययन के लिए सबसे पहले समुद्री जीवों की उपस्थिति का सर्वेक्षण किया जाता है। इसमें तट के समीप और उथले समुद्र में नियमित निरीक्षण कर डॉल्फिन, व्हेल, समुद्री कछुए और बड़े मछलियों की गतिविधियों को दर्ज किया जाता है।

Marine mammals on the Konkan coast of Maharashtra precious treasures of biological resources
समुद्र की लहरों पर छलांग लगाती स्पिनर डॉल्फ़िन - फोटो : माही मणकेश्वर
विज्ञापन

विस्तार

कोंकण का सुंदर समुद्री तट केवल प्रकृति प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र नहीं है, बल्कि जैव विविधता की दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है। गहरे नीले समुद्र में छलांग लगाती डॉल्फिन, सतह के नीचे शांतिपूर्वक विचरती व्हेलें और दुर्लभ दैत्याकार जीव- ये सभी हमारी समुद्री पारिस्थितिकी के महत्वपूर्ण घटक हैं। परंतु आज ये सभी जीव मानव हस्तक्षेप, जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित मछली पकड़ने के कारण संकट में हैं।

Trending Videos


भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार कई समुद्री जीव संरक्षित श्रेणी में आते हैं। कोंकण तट पर पाई जाने वाली प्रमुख संरक्षित प्रजातियों में देवमासा हंपबैक व्हेल (Megaptera novaeangliae), ब्राइड्स व्हेल, इंडो-पैसिफिक हंपबैक डॉल्फिन, फिनलेस पोरपोइज़ तथा अन्य डॉल्फिन प्रजातियां शामिल हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


समुद्री जैवविविधता के अध्ययन के लिए सबसे पहले समुद्री जीवों की उपस्थिति का सर्वेक्षण किया जाता है। इसमें तट के समीप और उथले समुद्र में नियमित निरीक्षण कर डॉल्फिन, व्हेल, समुद्री कछुए और बड़े मछलियों की गतिविधियों को दर्ज किया जाता है। इस कार्य में स्थानीय मछुआरों का पारंपरिक ज्ञान बेहद उपयोगी होता है। वे बताते हैं कि किस ऋतु में कौन-से जीव अधिक दिखाई देते हैं और उनके आवागमन के मार्ग क्या होते हैं?

समुद्री जीवों की मृत्यु और संरक्षण रणनीतियां

तट पर मृत अवस्था में मिले समुद्री जीवों का पोस्टमार्टम कर उनकी मृत्यु के कारणों का पता लगाया जाता है। प्लास्टिक निगलने से लेकर मछली पकड़ने के जाल में फंसना, ध्वनि प्रदूषण और मानवजनित बाधाओं के कारण होने वाली मृत्यु के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसे नमूनों के वैज्ञानिक विश्लेषण से प्रभावी संरक्षण रणनीतियां तैयार की जाती हैं।

इन जीवों की उपस्थिति समुद्र के स्वास्थ्य का सूचक मानी जाती है। इसलिए इनका संरक्षण केवल वन्यजीव सुरक्षा नहीं, बल्कि पूरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन के लिए आवश्यक है।

कोंकण तट पर प्रमुख संरक्षित प्रजातियां

इंडियन ओशन हंपबैक डॉल्फिन (Sousa plumbea) यह डॉल्फिन प्रजाति उथले पानी में पाई जाती है, विशेषकर रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग के आसपास। इसका सामाजिक और खेलप्रेमी स्वभाव इसे आसानी से दिखाई देने योग्य बनाता है। हाल के वर्षों में इसके संरक्षण हेतु अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं, शोधकर्ता और स्थानीय समुदाय मिलकर काम कर रहे हैं।

इंडो-पैसिफिक बॉटलनोज डॉल्फिन (Tursiops aduncus) यह अपेक्षाकृत गहरे पानी में पाई जाती है और कोंकण में कभी–कभी ही देखी जाती है।

ब्राइड्स व्हेल (Balaenoptera brydei) हर्णै-दापोली क्षेत्र के गहरे समुद्र में यह प्रजाति वर्षभर देखी जाती है।

हंपबैक व्हेल (Megaptera novaeangliae) यह व्हेल प्रवास के दौरान कुछ समय के लिए कोंकण तट के पास दिखाई देती है। 2021 में हर्णै के पास स्थानीय मछुआरों और शोधकर्ताओं ने इसके दर्शन दर्ज किए, जिससे संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र इनके विश्राम या आवागमन का महत्वपूर्ण मार्ग हो सकता है।

स्ट्रायप्ड डॉल्फिन (Stenella coeruleoalba) यह सुंदर धारियों वाली डॉल्फिन 2020 में कोंकण तट पर दर्ज की गई।

स्पिनर डॉल्फिन (Stenella longirostris) यह अपनी तेज घूमने वाली छलांगों के लिए प्रसिद्ध है। 2020 में रत्नागिरी में एक जीवित स्पिनर डॉल्फिन को तट पर पाया गया था, जिसे बाद में समुद्र में छोड़ दिया गया।

Marine mammals on the Konkan coast of Maharashtra precious treasures of biological resources
कोंकण तट के पास सतह पर आती हुई ब्राइड्स व्हेल - फोटो : मिहिर सुळे

किलर व्हेल (Orcinus orca) 2020 में पुरंगड–गावखाड़ी क्षेत्र के निकट 200 मीटर दूरी पर मछुआरों ने किलर व्हेल के समूह को देखा था।

समुद्री कछुए- हरा कछुआ, ऑलिव रिडले, हॉक्सबिल ये सभी संरक्षित प्रजातियां हैं और कोंकण तट पर अंडे देने के लिए आती हैं।

पिग्मी स्पर्म व्हेल (Kogia breviceps) यह छोटी और दुर्लभ व्हेल प्रजाति कभी–कभी कोंकण के तटों पर दिखाई देती है।

हर्णै के पास पिछले कुछ वर्षों में व्हेल के दिखने की घटनाएं बढ़ी हैं, जो पर्यावरणीय दृष्टि से सकारात्मक है, परंतु स्थानीय मछली व्यवसाय पर इसका प्रभाव भी देखा गया है। जालों में डॉल्फिन के फँसने की घटनाएँ भी सामने आई हैं।

संस्थाएं और संरक्षण के प्रयास

BNHS, CETRM, WII, IIT बॉम्बे और कई स्थानीय NGOs समुद्री जैवविविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इनके प्रयासों में शामिल हैं-
 

  •  उपस्थिति सर्वेक्षण
  • स्थानीय समुदायों में जनजागृति
  •  मृत जीवों के पोस्टमार्टम
  •  GIS आधारित प्रवास मार्गों का मानचित्रण


GIS तकनीक से तैयार किए गए ये मानचित्र नीति–निर्माताओं को महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों की पहचान करने में मदद करते हैं। इससे सुरक्षित समुद्री मार्ग निर्धारित कर बड़े जहाजों की आवाजाही और औद्योगिक गतिविधियों को पर्यावरण-अनुकूल दिशा दे सकते हैं।

स्थानीय समुदायों की भूमिका

कोंकण के मछुआरों का अनुभव संरक्षण का महत्वपूर्ण आधार है। बहुत-सी संस्थाएं उन्हें सुरक्षित मछली पकड़ने की तकनीक, जालों में सुधार और बायकैच कम करने के उपाय सिखाती हैं। महिलाओं और छात्रों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कार्यशालाएँ, प्रतियोगिताएँ और जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं।

सरकारी उपक्रम

भारत सरकार और महाराष्ट्र शासन द्वारा CRZ, समुद्री संरक्षित क्षेत्र (MPA), और जैवविविधता समितियों के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर 'National Marine Mammal Action Plan' के अंतर्गत भी कई महत्वपूर्ण नीतियों पर काम किया जा रहा है।

कोंकण तट न केवल मनुष्यों के जीवन से जुड़ा है, बल्कि अनेक संरक्षित समुद्री जीवों के अस्तित्व का आधार भी है। डॉल्फिन और व्हेल की बढ़ती उपस्थिति नए शोध और संरक्षण रणनीतियों के लिए महत्वपूर्ण संकेत देती है।


---------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

Election
एप में पढ़ें

Followed