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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: अरुणा राजे- पहली भारतीय फिल्म तकनीशियन
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सार
1969 में मात्र 23 वर्ष की अरुणा राजे भारत की प्रथम स्त्री तकनीशियन के रूप में भारतीय सिने-इतिहास में सदा केलिए दर्ज हो गईं। आसान नहीं था यह सफ़र। उन दिनों लोग सोचते थे, तकनीशियन केलिए जो बुद्धि और कौशल चाहिए, वह स्त्रियों में भला कैसे हो सकता है।
विश्व सिनेमा की दुनिया
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
एक समय था, जब किसी स्त्री का फिल्मी-दुनिया में तकनीशियन के रूप में कल्पना करना मुश्किल था। समय बदला, समय के साथ समाज और उसकी सोच बदली और धीरे-धीरे स्त्रियां सिनेमा के हर क्षेत्र में उतरने लगीं। प्रथम का अपना महत्व होता है। अरुणा राजे एक ऐसी ही स्त्री हैं।
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1969 में मात्र 23 वर्ष की अरुणा राजे भारत की प्रथम स्त्री तकनीशियन के रूप में भारतीय सिने-इतिहास में सदा के लिए दर्ज हो गईं। आसान नहीं था यह सफर। उन दिनों लोग सोचते थे, तकनीशियन केलिए जो बुद्धि और कौशल चाहिए, वह स्त्रियों में भला कैसे हो सकता है।
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एक ओर अरुणा राजे को अपना कौशल सिद्ध करना होता, दूसरी ओर पुरुष दृष्टि से खुद को बचाना भी था। बहुत सारे पुरुष अभी भी स्त्री के साथ बराबरी के भाव से काम करने की मानसिकता विकसित नहीं कर पाए हैं और यह तो पिछली शताब्दी का सत्तर का दशक था।
मेडिकल की पढ़ाई से फिल्मों का सफर
आज से 80 साल पहले पुणे में 9 फिल्मों की लेखक अरुणा राजे पाटिल का 1946 में जन्म हुआ। पहले मेडिकल की पढ़ाई की, लेकिन मन बदल गया और दिल की मान कर पुणे के फिल्म संस्थान जा पहुंचीं, वहां से एडिटिंग एवं निर्देशन का डिप्लोमा लेकर फिल्म एडिटिंग शुरू की। फिल्म संस्थान में उन्हें खूब प्यार-दुलार मिला, क्योंकि उस समय उस संस्थान में एक्टिंग के अलावा किसी भी अन्य विभाग में वे ही एकमात्र स्त्री थीं।
फिल्म संस्थान में ही उन्होंने साथी विकास देसाई के साथ अपनी ‘थीसिस फिल्म’ बनाई। विकास देसाई से शादी के बाद अरुणा ने छ: फिल्मों की एडिटिंग की, जिसमें पति विकास के साथ मिल कर फिल्म ‘शक’, ‘गहराई’, ‘सितम’ एडिटिंग की। ‘भैरवी’, ‘रिहाई’ तथा ‘तुम: ए डेंजरस ओब्सेशन’ की एडिटिंग उन्होंने अकेले की।
पढ़ाई में अच्छी होने से मेरिट के आधार पर मेडिकल में दाखिला मिला था, मगर लाश काट कर उससे सीखना उनके लिए मुश्किल था। पास तो हो जा रही थीं, परन्तु 18 महीने में जब यह काम बहुत कठिन हो गया तो उनकी मां ने बेटी की भावनाओं को समझा और अरुणा को मां मिसेज पाटिल ने पुणे फिल्म संस्थान में दाखिला दिला दिया।
लोगों ने कहा, ‘मिसेज पाटिल आप अपनी बेटी का शानदार कैरियर नष्ट कर रही हैं, वह बढ़िया डॉक्टर बनती।’ पर मां अपनी बेटी अरुणा राजे को खुश देखना चाहती थी। ऐसी मां की बेटी ने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। फिल्म संस्थान से गोल्ड मेडल लेकर फिल्मी कैरियर में शानदार पारी खेली।
उन दिनों स्त्री केंद्रित फिल्म बनाने का बहुत चलन नहीं था, न ही स्त्री से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण माने जाते थे। ऐसे समय में उन्होंने विकास देसाई के साथ मिल कर ‘शक’, ‘गहराई’ और ‘सितम’ का निर्देशन भी किया।
‘भैरवी’, ‘रिहाई’, ‘तुम: ए डेंजरस ओब्सेशन’, ‘रेड अलर्ट: द वार विदइन’, ‘फायर ब्रान्ड’ तथा टीवी सीरियल ‘शादी या, पतित पावन’ आदि फिल्मों का निर्देशन अकेले अपने बल पर किया। इसके साथ उन्होंने 9 फिल्मों का लेखन भी किया। उनकी सारी फिल्में स्त्री से जुड़ी हुई हैं। ‘शक’ (1976) का स्क्रिप्ट लेखन विकास विकास के साथ किया, जबकि इस फिल्म के संवाद हाफिज ने लिखे।
इसी तरह ‘गहराई’ (1980) के संवाद हाफिज ने लिखे, जबकि अरुणा ने स्क्रिप्ट विजय तेंदुलकर एवं विकास देसाई के साथ मिल कर तैयार की। हालांकि कहानी का विचार अरुणा एवं विकास का था। लेकिन 1982 की फिल्म ‘सितम’ का लेखन एवं संवाद पति-पत्नी दोनों ने मिल कर रचे।
पति विकास देसाई से तलाक के बाद भी अरुणा ने कभी मुड़कर पीछे नहीं देखा।
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