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खूबसूरत आजादी का आगाज: वृद्धावस्था जीवन की ढलान नहीं, यह सबसे ऊंचे शिखर पर खड़े होने जैसा
मार्क ट्वेन
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Fri, 13 Feb 2026 07:30 AM IST
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सार
वृद्धावस्था वह खूबसूरत आजादी है, जहां आपको दुनिया की परवाह नहीं होती। यह वह दौर है, जब आप अपनी आंखों में एक शरारत भरी चमक लेकर बेबाकी से सच बोल सकते हैं।
वृद्धावस्था एक खूबसूरत आजादी
- फोटो : AI
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विस्तार
अक्सर लोग समझते हैं कि वृद्धावस्था जीवन की ढलान है, पर सच तो यह है कि यह जीवन के सबसे ऊंचे शिखर पर खड़े होने जैसा है। इसे उम्र का ढलना नहीं, बल्कि अनुभवों का निखरना कहना चाहिए। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, इन्सान एक पुरानी कीमती मदिरा की तरह और भी गहरा और लाजवाब होता जाता है-एक ऐसी गहराई, जो जवानी के जोश में कभी मिल ही नहीं सकती। चेहरे की झुर्रियां वक्त की मार नहीं होतीं, बल्कि ये तो उस मुस्कुराहट की निशानियां हैं, जो आपने वर्षों तक बांटी हैं। ये निशान ही आपकी जीत और जिंदादिली के सबूत हैं।
बढ़ती उम्र का दुख यह नहीं होता है कि शरीर धीमा हो जाता है, बल्कि असली दुख तब होता है, जब हम अपने भीतर के ‘मासूम बालक’ को खो देते हैं। जब तक हमारे भीतर जिज्ञासा, हंसी और सीखने की चाह जिंदा है, तब तक हम सचमुच बुजुर्ग नहीं होते। असली ताकत शरीर के जोड़ों में नहीं, बल्कि आपकी उस रूह में होती है, जो आखिरी दम तक मुस्कुराना जानती है। वृद्धावस्था तो वह खूबसूरत आजादी है, जहां आपको दुनिया की परवाह नहीं होती। यह वह दौर है, जब आप अपनी आंखों में एक शरारत भरी चमक लेकर बेबाकी से सच बोल सकते हैं।
जरा सोचिए, अगर हम अस्सी साल की उम्र में पैदा होते और धीरे-धीरे जवानी की तरफ बढ़ते, तो दुनिया कितनी हसीन होती! यह इस विश्वास को और पुख्ता करता है कि वृद्धावस्था में हासिल किया गया अनुभव और दृष्टिकोण, जवानी की कच्ची ऊर्जा से कहीं अधिक मूल्यवान होता है। एक बुजुर्ग व्यक्ति वह योद्धा होता है, जिसने जिंदगी के हर उतार-चढ़ाव को पार कर अपनी मर्जी से जीने का हक कमाया है।
वृद्धावस्था कोई मजबूरी नहीं, बल्कि खुद को नए सिरे से गढ़ने की कला है। हमारा शरीर भले ही कुदरत के नियमों से बंधा हो, पर हमारा हुनर, हमारी हंसी और सोच हमेशा आजाद रहती है। बीते हुए वर्षों को अफसोस के साथ नहीं, बल्कि गर्व के साथ याद करें। शरीर भले ही थक जाए, पर यह आप पर निर्भर करता है कि आपकी जीने की इच्छा कभी कम न होने पाए।
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बढ़ती उम्र का दुख यह नहीं होता है कि शरीर धीमा हो जाता है, बल्कि असली दुख तब होता है, जब हम अपने भीतर के ‘मासूम बालक’ को खो देते हैं। जब तक हमारे भीतर जिज्ञासा, हंसी और सीखने की चाह जिंदा है, तब तक हम सचमुच बुजुर्ग नहीं होते। असली ताकत शरीर के जोड़ों में नहीं, बल्कि आपकी उस रूह में होती है, जो आखिरी दम तक मुस्कुराना जानती है। वृद्धावस्था तो वह खूबसूरत आजादी है, जहां आपको दुनिया की परवाह नहीं होती। यह वह दौर है, जब आप अपनी आंखों में एक शरारत भरी चमक लेकर बेबाकी से सच बोल सकते हैं।
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जरा सोचिए, अगर हम अस्सी साल की उम्र में पैदा होते और धीरे-धीरे जवानी की तरफ बढ़ते, तो दुनिया कितनी हसीन होती! यह इस विश्वास को और पुख्ता करता है कि वृद्धावस्था में हासिल किया गया अनुभव और दृष्टिकोण, जवानी की कच्ची ऊर्जा से कहीं अधिक मूल्यवान होता है। एक बुजुर्ग व्यक्ति वह योद्धा होता है, जिसने जिंदगी के हर उतार-चढ़ाव को पार कर अपनी मर्जी से जीने का हक कमाया है।
वृद्धावस्था कोई मजबूरी नहीं, बल्कि खुद को नए सिरे से गढ़ने की कला है। हमारा शरीर भले ही कुदरत के नियमों से बंधा हो, पर हमारा हुनर, हमारी हंसी और सोच हमेशा आजाद रहती है। बीते हुए वर्षों को अफसोस के साथ नहीं, बल्कि गर्व के साथ याद करें। शरीर भले ही थक जाए, पर यह आप पर निर्भर करता है कि आपकी जीने की इच्छा कभी कम न होने पाए।