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बांग्लादेश चुनाव: देश में अब बीएनपी की सत्ता, 'रुको और देखो' की रणनीति पर चलेगा भारत

Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Fri, 13 Feb 2026 11:46 AM IST
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सार

भारत और बीएनपी के रिश्तों का इतिहास सहज नहीं रहा है। वर्ष 2001-06 के बीच खालिदा जिया के नेतृत्व वाली बीएनपी सरकार के दौरान दोनों देशों के संबंधों में गहरी कड़वाहट देखी गई थी। बीएनपी लंबे समय से 'बांग्लादेश फर्स्ट' की राजनीति करती रही है। इस नारे को अक्सर भारत-विरोधी रुख के रूप में देखा गया।

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बांग्लादेश में आम चुनाव। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

शुक्रवार सुबह जब यह स्पष्ट हो गया कि बांग्लादेश में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेतृत्व में नई सरकार बनने जा रही है तो क्षेत्रीय कूटनीति की दिशा तुरंत चर्चा का विषय बन गई।

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया 'एक्स' पर बीएनपी अध्यक्ष तारिक रहमान को टैग करते हुए उन्हें संसदीय चुनावों में निर्णायक जीत की बधाई दी और यह स्पष्ट किया कि भारत लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश के साथ अपने बहुआयामी संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
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प्रधानमंत्री के इस संदेश का राजनीतिक महत्व जितना है, उससे कहीं अधिक उसका कूटनीतिक संकेत है। अगस्त 2024 के बाद दोनों देशों के संबंध जिस निचले स्तर तक पहुंच गए थे, उसे देखते हुए यह बधाई संदेश दरअसल संवाद के द्वार फिर से खोलने का एक परिपक्व संकेत माना जा रहा है। यह साफ दिखाता है कि भारत टकराव के बजाय व्यवहारिक और संतुलित कूटनीति के रास्ते पर चलना चाहता है।

हालांकि, भारत और बीएनपी के रिश्तों का इतिहास सहज नहीं रहा है। वर्ष 2001-06 के बीच खालिदा जिया के नेतृत्व वाली बीएनपी सरकार के दौरान दोनों देशों के संबंधों में गहरी कड़वाहट देखी गई थी। उस समय भारत ने बार-बार यह आरोप लगाया था कि बांग्लादेश की धरती का इस्तेमाल पूर्वोत्तर भारत के उग्रवादी संगठनों, विशेषकर उल्फा, द्वारा किया जा रहा है।

बीएनपी का जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी दलों के साथ गठबंधन भारत की चिंता का बड़ा कारण रहा है। इससे सीमावर्ती क्षेत्रों में कट्टरता, अस्थिरता और सुरक्षा जोखिम बढ़ने की आशंका बनी रहती थी।

'बांग्लादेश फर्स्ट' की राजनीति

बीएनपी लंबे समय से 'बांग्लादेश फर्स्ट' की राजनीति करती रही है। इस नारे को अक्सर भारत-विरोधी रुख के रूप में देखा गया। सीमा विवाद, नदी जल बंटवारा और व्यापार घाटे जैसे मुद्दों पर खालिदा जिया के कार्यकाल में भारत के प्रति कठोर रवैया अपनाया गया था। इसलिए भारत के नीति-निर्माताओं के लिए यह सत्ता परिवर्तन अवसर जितना है, उतनी ही सतर्कता का कारण भी है।

वर्ष 2024 के राजनीतिक संकट और उसके बाद के घटनाक्रमों ने बांग्लादेश की राजनीति को बदल दिया है।

अब बीएनपी नेतृत्व को यह अहसास हुआ है कि भारत जैसे बड़े पड़ोसी के साथ स्थायी टकराव आर्थिक स्थिरता के लिए नुकसानदेह हो सकता है। यही कारण है कि इस बार के चुनाव में तारिक रहमान के नेतृत्व में पार्टी ने अपेक्षाकृत संतुलित और व्यावहारिक रुख अपनाने की कोशिश की है।

नए चुनावी घोषणा-पत्र में भारत के साथ संबंधों को समानता, आपसी सम्मान और गैर-हस्तक्षेप के आधार पर आगे बढ़ाने की बात कही गई है। पार्टी ने यह भी संकेत दिया है कि वह अतीत के सुरक्षा विवादों को पीछे छोड़कर आर्थिक सहयोग और तीस्ता नदी जल बंटवारे जैसे मुद्दों पर तार्किक आधार पर बातचीत करना चाहती है। फिर भी, भारत में शरण लिए बैठीं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग आने वाले समय में एक बड़ी राजनयिक चुनौती बन सकती है।

तारिक रहमान बन सकते हैं नए प्रधानमंत्री

जहां तक बांग्लादेश के भावी प्रधानमंत्री तारिक रहमान की बात है तो उनकी राजनीतिक छवि भी विरोधाभासों से भरी हुई है। उन्हें एक तरफ अपनी मां की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता है तो दूसरी ओर डिजिटल युग के नेता के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है।

लंदन में लगभग 17 वर्षों के निर्वासन के दौरान उन्होंने तकनीक, सोशल मीडिया और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पार्टी संगठन को सक्रिय बनाए रखा। इसी कारण उन्हें मिस्टर रिमोट कंट्रोल भी कहा जाता है। कई विश्लेषकों का मानना है कि उनकी मूल विचारधारा

अब भी खालिदा जिया की राजनीतिक सोच से बहुत अलग नहीं है, जिसमें संप्रभुता और मुस्लिम पहचान पर अधिक जोर रहता है। पार्टी के भीतर उनका नियंत्रण भी अत्यंत केंद्रीकृत माना जाता है।

बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा

बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा भारत के लिए हमेशा संवेदनशील मुद्दा रही है। वर्ष 2001 के चुनावों के बाद हुई हिंसा और अगस्त 2024 के राजनीतिक संकट के दौरान अल्पसंख्यकों पर हमलों की खबरों ने इस चिंता को और गहरा किया था। हाल के चुनावों में बीएनपी नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से अपने कार्यकर्ताओं को अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए और खुद को अधिक समावेशी दिखाने की कोशिश की।

इसके बावजूद, जमीन पर अब भी कई हिंदू संगठनों का आरोप है कि स्थानीय स्तर पर डराने-धमकाने और जमीन कब्जाने की घटनाएं जारी रहती हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि नई सरकार के आने से स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी।

भारत के सामने सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती बांग्लादेश का चीन की ओर संभावित झुकाव है। बीएनपी परंपरागत रूप से चीन के साथ आर्थिक सहयोग को प्राथमिकता देती रही है। बांग्लादेश की ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और आवश्यक वस्तुओं के लिए भारत पर निर्भरता बनी हुई है, लेकिन नई सरकार 'बांग्लादेश फर्स्ट' नीति के तहत चीन से अधिक निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर सकती है।

भारत के लिए यह सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण होगा कि बांग्लादेश की नई सरकार उसकी सुरक्षा चिंताओं, विशेषकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के प्रति संवेदनशील बनी रहे।

भारत-बांग्लादेश के संबंध

स्पष्ट है कि बीएनपी की जीत के साथ भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक नए और चुनौतीपूर्ण अध्याय की शुरुआत हो रही है। पिछले डेढ़ दशक के सहयोगपूर्ण दौर के बाद अब दोनों देशों को अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। गंगा जल समझौते का नवीनीकरण, तीस्ता जल बंटवारा, व्यापारिक साझेदारी और व्यापक आर्थिक समझौते जैसे मुद्दे आने वाले वर्षों में संबंधों की दिशा तय करेंगे।

भारत के लिए फिलहाल सबसे उपयुक्त रणनीति 'रुको और देखो' की है। संवाद बनाए रखते हुए अपने सुरक्षा और रणनीतिक हितों की रक्षा करना।

बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन न तो पूरी तरह संकट है और न ही केवल अवसर। यह एक ऐसा मोड़ है, जहां भावनात्मक समीकरणों की जगह व्यावहारिक कूटनीति निर्णायक भूमिका निभाएगी। यदि नई सरकार संतुलित विदेश नीति अपनाती है और भारत अपने 'नेबरहुड फर्स्ट' दृष्टिकोण के साथ लचीलेपन और सतर्कता का संयोजन बनाए रखता है तो यह बदलाव दोनों देशों के संबंधों को नए संतुलन और स्थिरता की दिशा में ले जा सकता है।

अब आने वाला समय ही बताएगा कि यह परिवर्तन दक्षिण एशिया की राजनीति में तनाव बढ़ाएगा या सहयोग का नया अध्याय लिखेगा।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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