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डिजिटल दौर में रेडियो की जंग: कैसे बचेगा सबसे पुराना संचार माध्यम?
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सार
विस्तृत नेटवर्क के बावजूद पारंपरिक रेडियो की लोकप्रियता घटी है। भारत में प्रासंगिक बने रहने के लिए उसे अमेरिकी और ब्रिटिश प्रसारण मॉडलों से सीख लेनी होगी।
रेडियो
- फोटो : AI
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विस्तार
डिजिटल व इंटरनेट के दौर में भी रेडियो न सिर्फ जिंदा है, बल्कि संचार, संवाद और मनोरंजन के माध्यम के तौर पर प्रासंगिक बना हुआ है। हालांकि, इंटरनेट की प्रभावी उपस्थिति से पहले इसका एक स्वर्ण युग भी रहा है। तब पारंपरिक ट्रांजिस्टर सेटों के जरिये वह खेतों-खलिहानों से लेकर नदी में हिलकोरें मारती नावों व पहाड़ों तक इसकी मौजूदगी थी। यह और है कि रील्स के प्रति बढ़ते आकर्षण ने रेडियो के सामने अस्तित्व की चुनौती पेश कर दी है। ऐसे में, सवाल उठता है कि क्या रेडियो अतीत की तरह प्रभावी, प्रासंगिक और उपयोगी बना रह सकता है। विश्व रेडियो दिवस के मौके पर कम से कम भारतीय परिदृश्य में इस पर विचार होना चाहिए।
समय के साथ रेडियो ने खुद को भी बदला है। अब यह सिर्फ पुराने ट्रांजिस्टर सेटों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आधुनिक स्मार्ट स्पीकर, मोबाइल एप और इंटरनेट स्ट्रीमिंग के जरिये भी दुनिया के हर कोने में अपनी मौजूदगी बनाए हुए है। कारों में भी वह ‘कार रेडियो’ के तौर पर जिंदा है। ड्राइविंग करते समय भारत में रेडियो अब भी सबसे लोकप्रिय माध्यम है। रेडियो की मौजूदगी के लिए स्थानीय विषय वस्तु भी बड़ा माध्यम बनी है। स्थानीय खबरें, मौसम की जानकारी और स्थानीय भाषा में जितने कार्यक्रम सार्वजनिक रेडियो, यानी आकाशवाणी पर है, उतना न तो इंटरनेट पर है और न टीवी में। रेडियो के आधुनिक अस्तित्व को बनाने में सस्ता इंटरनेट पैक सहज भूमिका निभा सकता है। इसके जरिये यह दुनिया के किसी भी कोने में आसानी से काम कर सकता है। प्राकृतिक आपदा या संकट के समय, जब इंटरनेट या मोबाइल नेटवर्क ठप हो जाते हैं, तब रेडियो ही संचार का अकेला विश्वसनीय साधन बचा रहता है। रेडियो की महत्ता उसकी पोर्टेबिलिटी भी बढ़ा देती है। स्थानीय समुदायों से जुड़ाव और आधुनिक तकनीक के संग तालमेल इसकी प्रासंगिकता बढ़ाते हैं।
भारत में लगभग डेढ़ हजार रेडियो स्टेशन हैं, जिनमें आकाशवाणी के साथ ही निजी और सामुदायिक रेडियो शामिल हैं। जुलाई 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, देश में आकाशवाणी से 585 एफएम स्टेशन और 591 सामान्य स्टेशन काम कर रहे हैं। अकेले आकाशवाणी के ही देश भर में करीब 755 ट्रांसमीटर काम कर रहे हैं। 231 स्टेशनों पर प्रोग्राम बनाए जा रहे हैं। आकाशवाणी का नेटवर्क देश के करीब 99.2 प्रतिशत जनसंख्या तक पहुंच रखता है। इसके साथ ही, देश के 112 शहरों में 388 निजी एफएम रेडियो स्टेशन सक्रिय हैं। देश में 500 सामुदायिक रेडियो स्टेशनों के जरिये किसानों, जनजातीय क्षेत्रों और स्थानीय समुदायों के लिए प्रसारण हो रहे हैं। इतना विशाल नेटवर्क होने के बावजूद पारंपरिक रेडियो प्रसारण और उसे सुनने को लेकर दिलचस्पी घटी है, हालांकि एफएम प्रसारणों मे कुछ दिलचस्पी बनी हुई है। अगर रेडियो को भारत में और ज्यादा प्रासंगिक होना है, तो उसे अमेरिकी और ब्रिटिश रेडियो प्रसारण मॉडल से प्रेरणा लेनी होगी। अमेरिका, ब्रिटेन आदि पश्चिमी देशों में रेडियो ट्रैफिक में सुना जाता है, क्योंकि यह अकेला संचार माध्यम है, जिसे ड्राइविंग करते हुए भी सुना जा सकता है।
भारत में भी ट्रैफिक को रेडियो का सबसे बड़ा लक्षित श्रोता बनाने की गुंजाइश है। सड़क परिवहन मंत्रालय के मुताबिक, देश में करीब सात करोड़ कारें पंजीकृत हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार बाजार है। देश में करीब दो करोड़ कारें हमेशा सड़कों पर रहती हैं। व्यस्त समय में इस संख्या में कई गुना इजाफा हो जाता है। रेडियो ट्रकों और बसों के ड्राइवरों को भी अपना लक्षित श्रोता बना सकता है। लेकिन इसके लिए विशेष रेडियो कार्यक्रम बनाने होंगे।
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समय के साथ रेडियो ने खुद को भी बदला है। अब यह सिर्फ पुराने ट्रांजिस्टर सेटों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आधुनिक स्मार्ट स्पीकर, मोबाइल एप और इंटरनेट स्ट्रीमिंग के जरिये भी दुनिया के हर कोने में अपनी मौजूदगी बनाए हुए है। कारों में भी वह ‘कार रेडियो’ के तौर पर जिंदा है। ड्राइविंग करते समय भारत में रेडियो अब भी सबसे लोकप्रिय माध्यम है। रेडियो की मौजूदगी के लिए स्थानीय विषय वस्तु भी बड़ा माध्यम बनी है। स्थानीय खबरें, मौसम की जानकारी और स्थानीय भाषा में जितने कार्यक्रम सार्वजनिक रेडियो, यानी आकाशवाणी पर है, उतना न तो इंटरनेट पर है और न टीवी में। रेडियो के आधुनिक अस्तित्व को बनाने में सस्ता इंटरनेट पैक सहज भूमिका निभा सकता है। इसके जरिये यह दुनिया के किसी भी कोने में आसानी से काम कर सकता है। प्राकृतिक आपदा या संकट के समय, जब इंटरनेट या मोबाइल नेटवर्क ठप हो जाते हैं, तब रेडियो ही संचार का अकेला विश्वसनीय साधन बचा रहता है। रेडियो की महत्ता उसकी पोर्टेबिलिटी भी बढ़ा देती है। स्थानीय समुदायों से जुड़ाव और आधुनिक तकनीक के संग तालमेल इसकी प्रासंगिकता बढ़ाते हैं।
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भारत में लगभग डेढ़ हजार रेडियो स्टेशन हैं, जिनमें आकाशवाणी के साथ ही निजी और सामुदायिक रेडियो शामिल हैं। जुलाई 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, देश में आकाशवाणी से 585 एफएम स्टेशन और 591 सामान्य स्टेशन काम कर रहे हैं। अकेले आकाशवाणी के ही देश भर में करीब 755 ट्रांसमीटर काम कर रहे हैं। 231 स्टेशनों पर प्रोग्राम बनाए जा रहे हैं। आकाशवाणी का नेटवर्क देश के करीब 99.2 प्रतिशत जनसंख्या तक पहुंच रखता है। इसके साथ ही, देश के 112 शहरों में 388 निजी एफएम रेडियो स्टेशन सक्रिय हैं। देश में 500 सामुदायिक रेडियो स्टेशनों के जरिये किसानों, जनजातीय क्षेत्रों और स्थानीय समुदायों के लिए प्रसारण हो रहे हैं। इतना विशाल नेटवर्क होने के बावजूद पारंपरिक रेडियो प्रसारण और उसे सुनने को लेकर दिलचस्पी घटी है, हालांकि एफएम प्रसारणों मे कुछ दिलचस्पी बनी हुई है। अगर रेडियो को भारत में और ज्यादा प्रासंगिक होना है, तो उसे अमेरिकी और ब्रिटिश रेडियो प्रसारण मॉडल से प्रेरणा लेनी होगी। अमेरिका, ब्रिटेन आदि पश्चिमी देशों में रेडियो ट्रैफिक में सुना जाता है, क्योंकि यह अकेला संचार माध्यम है, जिसे ड्राइविंग करते हुए भी सुना जा सकता है।
भारत में भी ट्रैफिक को रेडियो का सबसे बड़ा लक्षित श्रोता बनाने की गुंजाइश है। सड़क परिवहन मंत्रालय के मुताबिक, देश में करीब सात करोड़ कारें पंजीकृत हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार बाजार है। देश में करीब दो करोड़ कारें हमेशा सड़कों पर रहती हैं। व्यस्त समय में इस संख्या में कई गुना इजाफा हो जाता है। रेडियो ट्रकों और बसों के ड्राइवरों को भी अपना लक्षित श्रोता बना सकता है। लेकिन इसके लिए विशेष रेडियो कार्यक्रम बनाने होंगे।