यक्ष प्रश्न: क्या राज्यसभा जाना सियासी मोक्ष से पहले ‘गंगा स्नान’ की तरह है?
नीतीश कुमार को बिहार से क्यों हटाया जा रहा है या फिर वो स्वयं राजनीतिक वानप्रस्थ अंगीकार कर रहे हैं, इन सवालों को अलग रखें तो भी प्रश्न यह बचता है कि इस तरह राज्यसभा जाने का व्यामोह पालने के पीछे नेताओं का मकसद क्या है?
विस्तार
क्या राज्यसभा जाना भारत में राजनेताओं के लिए राजनीतिक मोक्ष से पहले ‘गंगा स्नान’ की तरह है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि इधर लगभग 20 साल से बिहार के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार राज्यसभा जा अथवा भिजवाए जा रहे हैं तो उधर महाराष्ट्र के वयोवृद्ध नेता शरद पवार फिर से राज्यसभा (यानी राज्यों की परिषद) जाने के लिए तैयार बैठे हैं।
राज्यसभा के लिए नामांकन भरने से पहले नीतीश ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि उनकी (अंतिम) दिली इच्छा अब उच्च सदन जाने की है, बाकी सत्ता सुख वो भोग ही चुके हैं। जबकि शरद पवार जो अब बगैर सहारे के चल भी नहीं पाते, देश के ऊपरी सदन में कानून निर्माण में अपनी भूमिका निभाते रहना चाहते हैं।
जहां तक नीतीश कुमार की बात है तो भाजपा उन्हें बिहार से बाहर करने की तजवीज तो बरसों से करती रही है, लेकिन लगता है दांव अब लगा है।
नीतीश के भाजपा के दबाव में बिहार की सत्ता छोड़ने के पीछे कारण यह प्रचारित किया जाता रहा है, जो काफी हद तक सही भी है कि उनका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य ठीक नहीं है, लिहाजा उनके लिए राज्यसभा से बेहतर कोई आश्रयस्थल नहीं है।
नीतीश कुमार को बिहार से क्यों हटाया जा रहा है या फिर वो स्वयं राजनीतिक वानप्रस्थ अंगीकार कर रहे हैं, इन सवालों को अलग रखें तो भी प्रश्न यह बचता है कि इस तरह राज्यसभा जाने का व्यामोह पालने के पीछे नेताओं का मकसद क्या है?
जनता की सेवा, नीति नियंता के रूप में अहम भूमिका निभाना या फिर सुरक्षित पनाहगाह अटकाना? क्योंकि राज्यसभा के लिए अब ज्यादातर नाम जिन पैमानों और तकाजों पर तय होते हैं, उसका आधार केवल तुष्टिकरण, संतुष्टिकरण और समायोजन ज्यादा दिखाई पड़ता है।
गौरतलब है कि भारतीय लोकतंत्र में द्वि-सदनीय व्यवस्था बनाने के पीछे संविधान निर्माताओं का पवित्र उद्देश्य यही था कि केवल निर्वाचित प्रतिनिधियों को ही अमर्यादित अधिकार न दिए जाएं, राज्यसभा के रूप में उन पर अपेक्षाकृत प्रगल्भ और समग्रता में सोचने वाले प्रतिनिधियों का अंकुश रहे। केवल चुनावी राजनीति के बजाय वो गुण दोषों के आधार पर राष्ट्र और समाजहित में ज्यादा सोंचे।
इनमें वो लोग भी हों, जो चुनाव भले न जीत सकते हों, लेकिन अपने विषयों के प्रतिष्ठित विद्वान हों। लेकिन अब राज्यसभा केवल वृद्धों और चुनाव जीतने में अक्षम नेताओंको संसद में भेजने, अपनों को उपकृत करने, सत्ता के जोड़तोड़ का गणित बिठाने, जातीय और क्षेत्रीय समीकरण साधने और राजनीतिक रूप से उपेक्षित अथवा पराजित नेताओं के पुनर्वास का केन्द्र ज्यादा बनती जा रही है।
गौरतलब है कि राज्यसभा की वर्तमान में कुल सदस्य संख्या 245 है। इनमें से 233 सदस्य देश के विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं के विधायक चुनकर भेजते हैं। इन सदस्यों की संख्या विधानसभा में दलवार निर्वाचित सदस्यों की संख्या के हिसाब से तय होती है। 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामजद होते हैं।
मोटे तौर पर नामजद प्रतिनिधियों को केन्द्र में सत्तारूढ़ दल का प्रसाद माना जाता है। यूं लोकसभा का महत्व राज्यसभा से ज्यादा इसलिए है, क्योंकि वह जनता से सीधे शक्ति पाता है। लेकिन राज्य सभा के पास कुछ विशेष शक्तियां भी हैं।
मसलन संसद सामान्य परिस्थितियों में राज्य सूची में रखे गए मामले पर कानून नहीं बना सकती है। लेकिन यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से यह कहते हुए एक प्रस्ताव पारित करती है कि कोई मुद्दा "राष्ट्रीय हित में आवश्यक या समीचीन" है कि संसद को राज्य सूची में सूचीबद्ध मामले पर एक कानून बनाना चाहिए।
लेकिन यहां मुद्दा राज्यसभा के लिए लोगों के चयन का है। नीतीश कुमार को राज्यसभा इस अघोषित बिना पर भेजा जा रहा है कि वो अब सीएम जैसे अहम पद की जिम्मेदारी वहन करने में सक्षम नहीं हैं। बुढ़ापा उनके आभामंडल पर हावी हो रहा है।
पिछले विस. चुनाव के बाद 10 वीं बार सीएम पद की शपथ लेते समय उनका गड़बड़ाना, भूल जाना और सार्वजनिक रूप से ऐसा आचरण जो शालीनता और सभ्यता के दायरे में नहीं आता आदि की वजह से नीतीश को बिहार से हटाया जा रहा है और उनके जाने से राजगद्दी भाजपा को मिलेगी, यह तय है।
यूं सार्वजनिक रूप से नीतीश ने अपने राज्यसभागमन को अपनी दिली तमन्ना बताया है, लेकिन अब तक अपने कई पट्ठों को राज्यसभा भेजने वाले नीतीश का खुद राज्यसभा जाने की मासूम तमन्ना मर्सिडीज छोड़ मारूति 800 में बैठने की आकांक्षा जैसी लगती है। यह उनकी राजनीतिक असहायता का भी संकेत है। हो सकता है कि अब राज्यसभा ही उनका अंतिम पड़ाव हो।
वैसे भी नीतीश सत्ता और भाजपा के मकड़जाल में अब ऐसे उलझ गए हैं कि इस चक्रव्यूह से सुरक्षित निकलने का तरीका यही है कि वो राज्यसभा जाकर विश्राम करें। वो राज्यसभा में जाकर भी क्या करेंगे, इसकी कल्पना की जा सकती है।
नीतीश कुमार की 'विदाई'
हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि नीतीश कुमार की इससे बेहतर विदाई हो सकती थी। इन हालात में कैसे होती, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। एक मजे की बात और है। नीतीश की इस ‘विदाई’ पर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बिहार के विकास और सुशासन में नीतीश के योगदान की खुलेमन से तारीफ की। जबकि केन्द्र सरकार के नीति आयोग के आंकड़े बताते हैं कि विकास के सूचकांकों (2024) पर आज भी बिहार देश के राज्यों में सबसे निचली पायदान पर है।
जबकि नीतीश के साथ साथ ज्यादातर समय भाजपा ही सत्ता में साझीदार रही है। आयोग ने केवल एक मामले में जरूर बिहार की तारीफ की है, और वो है गुणवत्तापूर्ण व्यय के मामले में बिहार का अच्छा स्कोर।
उधर शरद पवार 86 साल की उम्र में विपक्षी पार्टियों की मदद से तीसरी बार राज्यसभा जाने को बेताब हैं। वो अभी भी विपक्ष की राजनीति करते रहना चाहते हैं और नेतृत्व की छड़ी किसी दूसरे को सौंपने के बारे में सोचना भी नहीं चाहते। हालांकि पवार 12 वर्षों से राज्यसभा में हैं, वहां उन्होंने महाराष्ट्र अथवा राष्ट्रहित में क्या किया, यह सवाल न ही पूछा जाए तो अच्छा है।
हरिभजन की उम्र और राज्यसभा का मोह
यूं भी राज्यसभा जाने के इच्छुकों की संख्या कम नहीं है। इनमें बड़ी संख्या उन नेताओं की है, जिसे आम बोलचाल में हरिभजन की उम्र कहते हैं। मसलन 93 साल के एच.डी.देवेगौडा इसी साल राज्यसभा से रिटायर होने वाले हैं, वो अब शायद फिर राज्यसभा नहीं जाएंगे। जाते तो एक और पूर्व राज्यसभा सदस्य राम जेठमलानी रिकाॅर्ड तोड़ते, जो 96 साल की उम्र तक भाजपा के टिकट पर राज्यसभा के सदस्य रहे।
उनके बाद मणिपुर के रिशांग किशिंग का नंबर हैं, जिन्होंने 94 साल की उम्र में खुद ही राज्यसभा से रिटायरमेंट लेकर देश पर रहम किया। ऐसे में कुछ लोग मजाक में राज्यसभा को ‘राजनीतिक वृद्धाश्रम’ कहने लगे हैं और यह काफी हद तक सच भी है।
उपलब्ध आंकड़ों देखें तो जुलाई 2024 तक राज्यसभा के 70 सदस्यों की औसत आयु 61 से 70 के बीच, 36 सदस्यों की उम्र 71 से 80 के बीच और 7 सदस्य ऐसे थे, जिनकी उमर 80 के ऊपर थी। इन सबकी कुल संख्या सदस्यों का लगभग 40 फीसदी होती है।
अब सवाल यह कि राजनेताओं का राज्यसभा जाने का मोह आखिर क्यों नहीं छूटता? क्योंकि यह सियासी हसरतों को पूरा करने का शर्तिया शाॅर्टकट है इसलिए। इसका पहला कारण तो यह कि राज्यसभा में 6 साल (अगर पूर्ण काल के लिए जाएं तो) राजनीतिक सुरक्षा की सौ फीसदी गारंटी है।
बाकी सुख- सुविधाएं और पेंशन लोकसभा सांसदों के समान ही मिलती हैं, सियासी जलवा बना भी रहता है, लेकिन सियासी टेंशन न्यूनतम होता है। सत्ता में भी भागीदारी मिल जाती है। लोकसभा सांसद को फिर भी चुनाव में अपना रिपोर्ट कार्ड देना पड़ता है, लेकिन राज्यसभा में अन्य योग्यताएं ज्यादा मायने रखती हैं।
अगर आप वकील आदि हैं तो राजनेताओं को उनकी जरूरत पड़ती ही है। राज्यसभा जाकर वो अपनी पेशे के साथ-साथ पार्ट टाइम राजनीति भी करते रहते हैं। इसे चाहें तो पार्ट टाइम जन सेवा और पार्ट टाइम आराम भी कह सकते हैं।
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