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जनादेश, जिद और अराजकता: लोकतंत्र की मूलभावना के विरुद्ध है ममता बनर्जी का इस्तीफा देने से इन्कार

अमर उजाला Published by: Devesh Tripathi Updated Thu, 07 May 2026 07:10 AM IST
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सार
यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि 2011 में वामपंथी शासन के खिलाफ परिवर्तन का नारा देकर सत्ता में आईं ममता अब लोकतंत्र की उसी प्रक्रिया को स्वीकारने को तैयार नहीं दिख रहीं, जिसने उन्हें तीन बार मुख्यमंत्री बनाया। यह रवैया उनकी छवि को धूमिल करने के साथ बंगाल को भी अस्थिरता की ओर ले जा सकता है।
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Bengal Mandate stubbornness and anarchy Mamata Banerjee s refusal to resign against very spirit of democracy
पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजों के बाद अराजकता की आशंका - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का इस्तीफा देने से इन्कार करना लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध तो है ही, यह राज्य में नतीजों की घोषणा के बाद से फैली अराजकता को और भी भड़का सकता है। यह इसलिए भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि देश में शायद यह पहला ही ऐसा मामला होगा, जब विधानसभा चुनाव में किसी मुख्यमंत्री ने अपनी पार्टी की हार के बाद पद से इस्तीफा देने से इन्कार किया हो। ममता निर्वाचन आयोग और एसआईआर प्रक्रिया को अपनी हार के लिए जिम्मेदार ठहरा रही हैं, लेकिन इस मामले में वह चयनात्मक नहीं हो सकतीं। आखिर इसी निर्वाचन आयोग ने केरल और तमिलनाडु में भी तो चुनाव कराए। इन दोनों ही राज्यों में सत्ताधारी दल को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन वहां के मुख्यमंत्रियों ने तो सहजता से इसे स्वीकार कर लिया। नतीजे बताते हैं कि कुल 293 सीटों में से सिर्फ 49 सीटों पर जीत का अंतर उन मतदाताओं की संख्या से कम था, जिन्हें एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से हटाया गया था। इन सीटों पर भी आधी भाजपा ने, तो लगभग इतनी ही तृणमूल ने जीतीं। लोकतंत्र में कोई भी हार या जीत अंतिम नहीं होती, पर केवल संदेह और जिद के आधार पर जनादेश की अवहेलना करना ठीक नहीं। हार के बाद चुनाव आयोग या प्रशासनिक प्रक्रिया पर कोई भी सवाल उठा सकता है। यह उसका अधिकार है। ममता बनर्जी चाहें तो चुनाव परिणाम को अदालत में चुनौती दे सकती हैं, व्यवस्था के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ सकती हैं या फिर कोई राजनीतिक आंदोलन भी खड़ा कर सकती हैं। लेकिन फिलहाल वह जो कर रही हैं, वह सत्ता में बने रहने का हठ ही अधिक लगता है। ममता बनर्जी निस्संदेह बड़ी राजनेता हैं और जिस जुझारूपन से उन्होंने कभी सीपीएम का मुकाबला किया था, वह उन्हें देश के राजनीतिक इतिहास में एक अहम स्थान देता है, लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि राजनीति में एक नेता की भूमिका सत्ता तक पहुंचने से पहले, सत्ता मिलने के बाद और सत्ता से बाहर होने के बाद बदलती रहती है और यह अस्वाभाविक नहीं कि उनके कद के राजनेता से इसे सहजता से लेने की उम्मीद रखी जाए। यह दुखद ही है कि 2011 में वामपंथी शासन के खिलाफ परिवर्तन का नारा देकर सत्ता में आईं ममता अब लोकतंत्र की उसी प्रक्रिया को स्वीकारने को तैयार नहीं दिख रहीं, जिसने उन्हें तीन बार मुख्यमंत्री बनाया। ममता को चाहिए कि वह जनादेश को स्वीकार करें, विपक्ष की भूमिका निभाएं और उचित मार्ग से अपनी शिकायतों का समाधान ढूंढें। अड़ियल रवैया न केवल उनकी उनकी छवि को धूमिल करेगा, बल्कि बंगाल को भी अस्थिरता की ओर ले जा सकता है।
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