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जेन-जी को जेन-जी ही रहने दें: देश का सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक ताना-बाना जटिलतम, युवा पीढ़ी 'जादुई छड़ी’ से...

Mon, 10 Aug 2026 08:45 AM IST
sudheesh pachauri सुधीश पचौरी
Updated Mon, 10 Aug 2026 08:45 AM IST
सार

जेन-जी के पास भी भारत के जटिलतम सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक ताने-बाने को आनन-फानन में ठीक करने वाली कोई ‘जादुई छड़ी’ नहीं है कि उसे घुमाया और सब ठीक हो गया। ‘बदलाव’ का मुहावरा प्यारा होते हुए भी ‘धोखे भरा’ हो सकता है।

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Let Gen Z remain themselves socio-politico-economic fabric in India incredibly complex no magic wand to fix it
जंतर मंतर पर आंदोलन, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद जेन-जी पर नई बहस छिड़ी - फोटो : एएनआई

विस्तार

जेन-जी पीढ़ी बड़े भागों वाली है। कोई उसे पटा रहा है। कोई फुसला रहा है। कोई उकसा रहा है कि ‘जेन-जी’ तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं, जेन-जी तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं। कोई कह रहा है कि ‘अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो’! कोई उसे अपना चेला बनाने के चक्कर में है, तो कोई उसे ‘भगवान’ की तरह पधारने के चक्कर में है। कोई कह रहा है कि जेन-जी ने चमत्कार कर दिया। उसने असंभव को संभव कर दिखाया। जिसे कोई न कर पाया, उसने कर दिखाया। ऐसी जेन-जी पीढ़ी की जय हो! जय हो! एक बेहद घमंडी सरकार को उसने बात की बात में हिला दिया। जो किसी की नहीं मानती थी, उससे अपनी सारी मांगें मनवा लीं। बड़े-बड़े मंत्री कुछ ‘जेन-जी’ के आगे पीछे चक्कर मारते दिखे। उनके एक से एक नाज-नखरे उठाते दिखे।

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जिस शिक्षा मंत्री को कोई नहीं हटा पाया, जेन-जी ने उसे हटवा दिया। छात्रों पर सारे केस वापस करवा दिए। ‘नीट पेपर लीक’ से पैदा हुई हताशा के  कारण ‘आत्महत्या’ करने वाले छात्रों को कंपसेशन दिलाने की गारंटी ले ली। किसी से भी बात न करने वाले पीएम तक को सोशल मीडिया के जरिये जेन-जी से बात करने को मजबूर होना पड़ा।
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एक दिन भारत के ‘चीफ जस्टिस’ द्वारा ‘चलते-चलते’ किए कटाक्ष की प्रतिक्रिया में अमरीका में बैठे कुछ भारतीय ‘जेन-जी जनों’ ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ बना डाली। यही जेन-जी भारत सरकार की गले की हड्डी बन गए। ‘चौबीस बाई सात’ के मीडिया कवरेज ने ‘जेन-जी पीढ़ी’ को ‘जंतर मंतर’ में ‘विरोध का देवता’ बना दिया। अंततः सरकार झुकी और प्रधानमंत्री को  कई ‘रीलों’ के जरिये जेन-जी पीढ़ी से संवाद करने की जरूरत हुई। नतीजतन जेन-जी पीढ़ी को ‘अपरिभाषेय मिथक’ में बदल दिया गया।
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फिर ‘संघ’ के मुखिया मोहन भागवत ने जेन-जी से बातचीत करके, जेन-जी के ‘भाव’ को और बढ़ा दिया कि जेन-जी ज्यादा ईमानदार है...कि जेन-जी के सवालों का जबाव देना होगा...कि जेन-जी की शिकायतें सही हैं...कि जेन-जी से पहले बात करनी चाहिए थी...कि आंदोलन भी संवाद का तरीका है...कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में कमी है...कि शिक्षा का बजट ‘छह प्रतिशित’ होना चाहिए...कि जेन-जी राष्ट्र विरोधी नहीं...कि संवाद की जरूरत है, मतभेद की नहीं...आदि। यह एक प्रकार की ‘मनोवैज्ञानिक ‘नजलिंग’ थी। ‘नजलिंग’ यानी टहोका या हल्का धक्का मारकर किसी रूठे को मनाने, उसे ‘पुचकार’(पैंपर) कर, उसको ‘अलेले मेला मुन्ना मुन्नी’ आदि कह, उसकी ‘लल्लो-चप्पो’ कर उसे चुप करने की कोशिश। किसी रोते हुए शिशु को चुप करने के लिए माता-पिता द्वारा उसके मुंह में ‘पूप्सी फीडर’ या ‘सूदर’  ठूंस देना, फिर लोरी सुनाकर सुलाने की कोशिश करना! बताइए, ऐसी अखंड चापलूसी सुन कोई बालक बावला क्यों न हो जाए? और जो पीढ़ी ‘सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर ‘अधिकाधिक व्यूज’ को पाकर अपने को ‘आभासी दुनिया’ का ‘खुदा’ समझती हो, वह क्यों न इतराए?

इस जेन-जी पीढ़ी को भूख हड़ताल और धरने पर बैठने के कारण मिली हमदर्दी ने हीरो बना दिया। बहुत से युवाओं  के ‘आउट ऑफ कंट्रोल’  हो जाने पर भी पुलिस तो टारगेट बनी, लेकिन उनके प्रति हमदर्दी कम न हुई और सरकार उनके आगे ‘लंबलेट’ नजर आई। अब भी उनकी जरा-सी धमकी भी राज्य की सारी मशीनरी को हकबका देती है। भाजपा के जिस अश्वमेध के घोड़े को बारह साल से कोई नहीं रोक पाया, उसे कुछ जेन-जी युवाओं ने अपने पिछवाड़े बांध लिया। इसे देख विपक्ष भी अपने फॉर्म में आ गया। इसीलिए लगभग सभी दल, नेता व बुद्धिजीवी, जेन-जी की लल्लो चप्पो करते, उसे मनाते से, उसकी हां में हां मिलाते नजर आते हैं। कुछ विपक्षी जेन-जी को ‘दुलारने’(पेंपरिंग) में लगे दिखते हैं, कुछ ‘जेन-जी’ का ‘बिजूका’ दिखाकर सत्ता को डराते दिखते हैं कि अगर अब भी तुम्हारा अहंकार कम न हुआ व तुम न संभले और सड़ी-गली शिक्षा व्यवस्था को नहीं सुधारा, बेरोजगारों को रोजगार न दिया, तो जेन-जी आ जाएगी और तुमको खा जाएगी। इसे देख कुछ ने ‘कॉकरोच पार्टी’ के कुछ नेताओं  को ‘आप पार्टी’ का पूर्व सदस्य बताकर उन्हें एक्सपोज करने की भी कोशिश की। कुछ ने उन्हें ‘भारत विरोधी’ अरबपति ‘जार्ज सोरोस’ से जुड़ा बताया, लेकिन जेन-जी का जलवा और धमक कम नहीं हुई। कल को कोई कहने लगे कि ये जेन-जी उसके या इसके एजेंट हैं, उससे भी उनका रुतबा कम नहीं होने वाला, क्योंकि एक तो ‘जेन-जी’ प्रकारांतर से हमारे जैसे ‘बेबी बूमर्स व ओल्डर मिलेनियल्स’ के ही बच्चे हैं, हमारे जैसों के ही ‘नाती-पोते’ हैं। ऐसे में हम भी भला अपने बच्चों के खिलाफ कैसे जा सकते हैं?

यह ‘कैच 22’ वाली स्थिति है। कॉकरोच पार्टी ने अचानक इन्हीं ‘बेबी बूमर्स व ओल्ड मिलेनियल्स’ के मन को दो फाड़ कर दिया है, जिनमें से बहुत से भाजपा के भी हो सकते हैं। इसीलिए मोदी से लेकर भागवत तक जेन-जी के आगे-पीछे करते नजर आते हैं। यह सच है कि कोई भी अपने बच्चों से दुश्मनी नहीं कर सकता, लेकिन यह भी सच है कि कोई अपने बच्चों को भगवान बनाकर अपने सिर पर नहीं बिठा सकता। और इन जेन-जी के पास भी भारत के जटिलतम सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक ताने-बाने को आनन-फानन में ठीक करने वाली कोई ‘जादुई छड़ी’ नहीं है कि उसे घुमाया और सब ठीक हो गया। पहले भी भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ लोग संपूर्ण क्रांति किए हैं, लेकिन उसके अंत में भ्रष्टाचार ने कैसे-कैसे ‘फूल’ खिलाए हैं, यह हम सब जानते हैं। ऐसे में कहीं ये ‘जेन-जी’ भी तो  इतिहास रिपीट करने नहीं आए?


लंबी अधीनता में जीने व उपनिवेशवादियों के अपने हितों के लिए बनाए और अब तक जड़ीभूत हो चुके सिस्टम को आमूल-चूल बदलना न दो दिन में संभव है, न आसानी से हो सकता है। ‘बदलाव’ का मुहावरा प्यारा होते हुए भी ‘धोखे भरा’ हो सकता है। यों, अपने जैसे समाज में किसी को ‘भगवान’ बना लेना आसान है, लेकिन भगवान को झेलना उतना ही कठिन है और भगवान को सिर पर ढोना तो और भी असंभव। इसीलिए भगवानों के विग्रहों को मंदिरों में पूजा जाता है। घर में भी उनको चौबीस घंटे सिर पर नहीं बिठाया जाता। अपने भगवान तो स्वयं भी किसी पर लदकर नहीं चलते, फिर भगवान भी एक-दो दिन में नहीं बनते, वे सदियों में बना करते हैं। इसीलिए हमारा निवेदन है कि ‘जेन-जी’ को ‘जेन-जी’ ही रहने दें, भगवान न बनाएं। किसी के पीछे दौड़ने की जगह खुद में भगवानत्व पैदा कीजिए। उसके कुछ गुण अपने में ले आइए, तब किसी कॉकरोच या छिपकली के अवतार की जरूरत नहीं होगी।

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