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मुस्लिम नाटो की राह: बदलती सामरिक तस्वीर में नए आयाम के संकेत से PAK उत्साहित, भारत को सतर्क रहने की जरूरत
Mon, 10 Aug 2026 08:37 AM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 10 Aug 2026 08:37 AM IST
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मक्का रक्षा समझौता।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
पिछले दिनों मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुआ रक्षा समझौता, जिसके तहत किसी एक देश पर हमला, तीनों देशों पर सामूहिक हमला माना जाएगा, पश्चिम एशिया की बदलती सामरिक तस्वीर में एक नए आयाम के जुड़ने का संकेत है। उल्लेखनीय है कि समझौता आधिकारिक तौर पर किसी देश को साझा शत्रु के रूप में चिह्नित करने से बचता है, लेकिन पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने जिस तरह से समझौते की घोषणा के अगले ही दिन मुस्लिम देशों से इस्राइल के खिलाफ एकजुट होने और साझा सैन्य मोर्चा बनाने का आह्वान किया है, वह येरूशलम के साथ-साथ भारत जैसे देशों की चिंताएं भी बढ़ाने वाला है।
दरअसल, सामूहिक रक्षा समझौते का औचित्य तभी तक विश्वसनीय रहता है, जब तक उसका उद्देश्य अपने सदस्यों की सुरक्षा तक सीमित हो। लेकिन, अगर यही व्यवस्था किसी धार्मिक या राजनीतिक पहचान के आधार पर साझा शत्रु गढ़ने का जरिया बन जाए, तो उसके नतीजे कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं और यही इस समझौते का सबसे बड़ा जोखिम भी है। खास बात यह है कि तीनों देशों की क्षमताएं भी एक-दूसरे की पूरक हैं। सऊदी अरब के पास आर्थिक शक्ति और रक्षा पर भारी निवेश की क्षमता है।
तुर्किये के पास विकसित रक्षा उद्योग, ड्रोन तकनीक, सैन्य अनुभव और नाटो सदस्य होने के नाते रणनीतिक पहुंच है। पाकिस्तान के पास भी बड़ी और अनुभवी सेना, मिसाइल क्षमता तथा परमाणु प्रतिरोधक क्षमता है। लिहाजा यह समझौता केवल प्रतीकात्मक नहीं रह जाता, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करने की भी पूरी क्षमता रखता है। यही वजह है कि ख्वाजा आसिफ की मुस्लिम नाटो बनाने का संकेत देती टिप्पणी को महज राजनीतिक बयान मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि जो वह कह रहे हैं, वह इतना आसान नहीं होगा।
पाकिस्तान बेशक इस्राइल को मान्यता न दे, लेकिन तुर्किये का मामला बिल्कुल अलग है। वह इस्राइल को मान्यता देता है और कुछ तनावों के बावजूद दोनों के बीच दशकों से राजनयिक संबंध भी रहे हैं। इसी तरह, अमेरिका के साथ संबंधों के मद्देनजर सऊदी अरब के लिए भी यह आसान नहीं होगा कि वह सीधे तौर पर इस्राइल के खिलाफ खड़ा हो जाए।
जहां तक भारत की बात है, तो उसने पश्चिम एशिया के लगभग सभी प्रमुख देशों के साथ अलग-अलग स्तर पर मजबूत संबंध बनाए हैं, जो उसकी संतुलित और बहुस्तरीय विदेश नीति की सबसे बड़ी रणनीतिक पूंजी भी है। फिर भी, मुस्लिम नाटो के गठन को लेकर पाकिस्तान के उत्साह को देखते हुए उसे क्षेत्र की बदलती भू-राजनीति पर सतर्क निगाह रखने की जरूरत है।