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खुद को बदलना सिर्फ इच्छाशक्ति का खेल नहीं: अंदर से बदलाव जरूरी
बेनोइट डेनिजेट-लुईस, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Nitin Gautam
Updated Sun, 19 Apr 2026 07:17 AM IST
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सार
अगर आप खुद को बदलना चाहते हैं, तो सिर्फ इच्छाशक्ति से काम नहीं चलेगा। सच्चा बदलाव तब आता है, जब आप ‘जैसे हैं, वैसे ही’ खुद को स्वीकार करते हैं।
बदलाव अंदर से आता है
- फोटो : फ्रीपिक
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विस्तार
हम अक्सर खुद को अपने बदलाव की कहानी का संचालक मान लेते हैं। हमें लगता है कि हम खुद को वैसा बना सकते हैं, जैसा चाहते हैं। खुद को बेहतर बनाने की बातें हमें बार-बार और बड़े आकर्षक तरीके से सुनने को मिलती हैं। ये बातें अक्सर ऐसे लोग करते हैं, जो खुद को ‘बदलाव का विशेषज्ञ’ बताते हैं। बेशक, खुद में बदलाव की भावना जरूरी होती है, पर अगर यह प्रेरणा आपके भीतर से आए, तो वह ज्यादा लंबे समय तक टिकती है।
इस बात को मनोविज्ञान के कई शोध भी सही मानते हैं, जैसे ‘सेल्फ-डिटरमिनेशन थ्योरी’, जो बताती है कि अंदर से आने वाली प्रेरणा ही सबसे मजबूत होती है। बदलाव उतना इच्छाशक्ति का खेल नहीं है, जितना हम समझते हैं। यह दूसरों से ज्यादा प्रभावित होता है। हमारे आसपास ऐसे बहुत-से लाइफ कोच और वेलनेस इन्फ्लुएंसर हैं, जो हमें खुद को और बेहतर बनाने के लिए उकसाते रहते हैं। गेस्टाल्ट थेरेपी के संस्थापकों में से एक, मनोचिकित्सक फ्रिट्ज पर्ल्स हमारे अंदरूनी बदलाव की चाहत को एक तरह का आत्म-छलावा मानते थे। दूसरों को बदलने की कोशिश के बारे में भी उनका यही मानना था।
पर्ल्स और उनके साथी डॉ. अर्नोल्ड बेइसर, जिन्होंने ‘पैराडॉक्सिकल थ्योरी ऑफ चेंज’ दी, कहते थे कि बदलाव तब आता है, जब हम अपने आप को बदलने की कोशिश छोड़कर ‘जैसे हैं, वैसे ही’ खुद को स्वीकार करते हैं। इसके लिए दो चीजें सबसे जरूरी हैं : एक तो, बदलाव की नीयत और दूसरी, समर्पण की भावना, यानी बिना किसी जोर-जबर्दस्ती के बस कोशिश करते रहना। पर समस्या यह है कि हम खुद अपने बदलाव को सही से समझ नहीं पाते। कई बार लगता है कि हम बदल रहे हैं, जबकि हम नहीं बदल रहे होते और कई बार हम बदल जाते हैं, पर हमें पता ही नहीं चलता। मनोवैज्ञानिक जेफ्री कॉटलर कहते हैं कि ज्यादातर बदलाव ऐसे स्तर पर होते हैं, जो हमारी समझ से परे होते हैं। विशेषज्ञ भी एकमत नहीं हैं कि बदलाव का सर्वश्रेष्ठ तरीका क्या है।
तो क्या हमें हार मान लेनी चाहिए? बिल्कुल नहीं। प्रयास जरूरी है, पर उसके साथ विनम्रता भी। हमें खुद पर काम करना चाहिए, सही माहौल बनाना चाहिए, अच्छे लोगों की संगति में रहना चाहिए और फिर धीरे-धीरे बदलाव अपने आप होने लगता है। डॉ. विक्टर फ्रैंकल ने भी कहा था कि जब हम दूसरों से प्यार करते हैं या किसी और के मकसद के लिए काम करते हैं, तो इस तरह हम कहीं न कहीं खुद को भी बेहतर ही बना रहे होते हैं।
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इस बात को मनोविज्ञान के कई शोध भी सही मानते हैं, जैसे ‘सेल्फ-डिटरमिनेशन थ्योरी’, जो बताती है कि अंदर से आने वाली प्रेरणा ही सबसे मजबूत होती है। बदलाव उतना इच्छाशक्ति का खेल नहीं है, जितना हम समझते हैं। यह दूसरों से ज्यादा प्रभावित होता है। हमारे आसपास ऐसे बहुत-से लाइफ कोच और वेलनेस इन्फ्लुएंसर हैं, जो हमें खुद को और बेहतर बनाने के लिए उकसाते रहते हैं। गेस्टाल्ट थेरेपी के संस्थापकों में से एक, मनोचिकित्सक फ्रिट्ज पर्ल्स हमारे अंदरूनी बदलाव की चाहत को एक तरह का आत्म-छलावा मानते थे। दूसरों को बदलने की कोशिश के बारे में भी उनका यही मानना था।
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पर्ल्स और उनके साथी डॉ. अर्नोल्ड बेइसर, जिन्होंने ‘पैराडॉक्सिकल थ्योरी ऑफ चेंज’ दी, कहते थे कि बदलाव तब आता है, जब हम अपने आप को बदलने की कोशिश छोड़कर ‘जैसे हैं, वैसे ही’ खुद को स्वीकार करते हैं। इसके लिए दो चीजें सबसे जरूरी हैं : एक तो, बदलाव की नीयत और दूसरी, समर्पण की भावना, यानी बिना किसी जोर-जबर्दस्ती के बस कोशिश करते रहना। पर समस्या यह है कि हम खुद अपने बदलाव को सही से समझ नहीं पाते। कई बार लगता है कि हम बदल रहे हैं, जबकि हम नहीं बदल रहे होते और कई बार हम बदल जाते हैं, पर हमें पता ही नहीं चलता। मनोवैज्ञानिक जेफ्री कॉटलर कहते हैं कि ज्यादातर बदलाव ऐसे स्तर पर होते हैं, जो हमारी समझ से परे होते हैं। विशेषज्ञ भी एकमत नहीं हैं कि बदलाव का सर्वश्रेष्ठ तरीका क्या है।
तो क्या हमें हार मान लेनी चाहिए? बिल्कुल नहीं। प्रयास जरूरी है, पर उसके साथ विनम्रता भी। हमें खुद पर काम करना चाहिए, सही माहौल बनाना चाहिए, अच्छे लोगों की संगति में रहना चाहिए और फिर धीरे-धीरे बदलाव अपने आप होने लगता है। डॉ. विक्टर फ्रैंकल ने भी कहा था कि जब हम दूसरों से प्यार करते हैं या किसी और के मकसद के लिए काम करते हैं, तो इस तरह हम कहीं न कहीं खुद को भी बेहतर ही बना रहे होते हैं।

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