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चीन के कुटिल इरादे: कम्युनिस्ट नहीं, हान राष्ट्रवादी है सीपीसी
प्रदीप कुमार
Published by: Pradip Kumar
Updated Wed, 30 Jun 2021 05:25 AM IST
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Central Committee of the Communist Party of China (CPC)
- फोटो : chinausfocus
आज विकसित पूंजीवाद के प्रतीक, शंघाई में सौ साल पहले एक जुलाई 1921 को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) की स्थापना हुई थी। किसी भी पार्टी का वजूद मुख्यतः वक्त के तकाजे के हिसाब से होता है। जैसे, भारतीय राष्ट्र की कांग्रेसी अवधारणा से असहमत और विभाजन के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की नींव डाली थी। उसी तरह चीन में मंचू साम्राज्य के पतन के बाद सुन यात सेन और चियांग काई शेक की सरकारें हान जनता की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकीं। आज चीन जिसे 'सौ साल का अपमान' कहता है, उसका अंतिम अध्याय चियांग शासन में ही लिखा गया था।
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आधुनिकतम अमेरिकी हथियारों से लैस चियांग की सेना आहत हान जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे कम्युनिस्ट सैनिकों से हार गई और उसे ताइवान द्वीप पर शरण लेनी पड़ी। अक्तूबर 1949 में चीन में सीपीसी की सरकार बन गई। सीपीसी सरकार की नीतियों के कारण 1950 में कोरिया युद्ध शुरू हो गया। कई दशक बाद अमेरिका के अवर्गीकृत दस्तावेजों से ज्ञात हुआ कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमन ने चीन और उत्तर कोरिया के खिलाफ एटम बम के इस्तेमाल का फैसला कर लिया था। चीन का अगला निशाना बना भारत। लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र पर चीन का अधिकार कभी नहीं रहा। लेकिन सामरिक महत्व की, तिब्बत-सिंकियांग सड़क बनाने के लिए उसने अक्साई चिन पर कब्जा कर लिया। भारत के लिए पहला सबूत कि शांतिपूर्ण समाधान में सीपीसी का यकीन ही नहीं है। 1962 में भारत पर हमला करने से पहले माओत्से तुंग ने सेंट्रल मिलिटरी कमीशन और पोलित ब्यूरो की बैठक में कहा,'भारत को इतना झन्नाटेदार झापड़ मारो कि लंबे समय तक याद रखे।'
यह भाषा कम्युनिस्टों की नहीं हुआ करती। 2021 में सीपीसी से जुड़े एक अखबार ने भारत में कोविड-मृतकों की चिताओं पर नस्लवादी टिप्पणी की। वर्ष 1962 से जुड़ी एक और बड़ी घटना है, जिससे सिद्ध हुआ कि सीपीसी अंतरराष्ट्रीयतावादी होने की मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा की शर्त पूरी नहीं करती। लैटिन अमेरिकी देश क्यूबा में फिदेल कास्त्रो की क्रांतिकारी सरकार को अमेरिकी हमलों से सुरक्षा प्रदान करने लिए सोवियत संघ ने वहां न्यूक्लियर मिसाइल तैनात कर दी थी। अमेरिका ने क्यूबा की नौसैनिक घेरेबंदी कर दी। दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के कगार पर पहुंच गई। पोलैंड की राजधानी वारसा में चीन के राजदूत को अमेरिकी राजदूत से संकेत मिला कि अमेरिका भारत-चीन विवाद में दखल की हालत में नहीं है। चीन ने ठीक यही वक्त हमले के लिए चुना। बिरादरानी कम्युनिस्ट पार्टी का बुनियादी फर्ज अदा करते हुए चीन को उस समय सोवियत संघ के साथ खड़ा होना चाहिए था।
सीपीसी सरकार का हर फैसला हान राष्ट्रवाद (चीन की करीब 95 फीसदी जनता हान नस्ल की है) से प्रेरित होता है। चीनी मूल की प्रतिष्ठित लेखिका हान सुइन ने अपनी किताब द मॉर्निंग डेल्यूज में लिखा है कि चीन और सोवियत संघ में मनमुटाव किसी वैचारिक मतभेद के कारण नहीं हुआ। 1958 में चीन सोवियत संघ से एटम बम की तकनीक चाहता था। सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने यह अनुरोध ठुकरा दिया था। इसी के बाद हजारों सोवियत सलाहकारों को चीन से हटना पड़ा था। चीन के बिरादराने विश्वासघात से अंतरराष्ट्रीय इतिहास भरा पड़ा है। अफ्रीकी देश अंगोला में पुर्तगाल की औपनिवेशिक सरकार थी। सोवियत हथियारों और अन्य सहायता से खड़े किए गए वहां की जनता के मुक्ति संगठन, एमपीएलए की मदद के लिए क्यूबा ने ब्रिगेड भेजी। लेकिन चीन अमेरिका के समर्थकों और एमपीएलए के विरोधियों का साथ दे रहा था। वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी जब हमलावर अमेरिकी सेना से युद्धरत थी, उसी दौरान चीन ने स्प्राटले शृंखला के कई द्वीपों पर कब्जा कर लिया। ऐसी दर्जनों मिसाल हैं।
कुछ घटनाएं प्रमाण हैं कि प्रभुत्व और विस्तार के मामले में सैकड़ों साल में चीन में कोई बदलाव नहीं आया है। मिंग सम्राट के आदेश पर एडमिरल जेंग हे (यह एक मुस्लिम हिजड़ा था) ने 1405 और 1433 के बीच दुनिया के सबसे बड़े जहाजी बेड़े के साथ हिंद महासागर क्षेत्र के कई चक्कर मारे। श्रीलंका पर हमला कर वह सिंहल राजा को चीन पकड़ ले गया। देखें, इतिहास दुहरा रहा है। चीन का कर्ज न उतार पाने की वजह से श्रीलंका को अत्यंत सामरिक महत्व वाला बंदरगाह, हंबनटोटा 99 साल के पट्टे पर उसे देना पड़ा। आज चीन की नौसेना अमेरिका से भी आगे हो चुकी है। इस विस्तारवाद की वेदी है हान नस्लवाद। तिब्बत, पूर्वी तुर्किस्तान (जिसे चीन सिंकियांग अर्थात नया प्रदेश कहता है) का जनसांख्यिकीय रूप बदल चुका है। किसी समय युन्नान में मुसलमानों की बड़ी आबादी थी। अब नाम भर को रह गए हैं। अतीत में चीन पर शासन करने वाले मंगोलों और मंचुओं की मूल भूमि अब हान बहुल हो चुकी है। कैंब्रिज में बर्मी मूल के पूर्व प्रोफेसर, इतिहासकार थांत मिंत-यू वेअर चाइना मीट्स इंडिया में 1957 के बाद का हाल बताते हैं,'पूरे चीन में मस्जिदों को निशाना बनाया गया।
मुख्यधारा की संस्कृति, अर्थात हान संस्कृति, से भिन्न हर व्यवहार के विरुद्ध निंदा अभियान चलाया गया।' (पृष्ठ- 155)। आज भी चीन में मुसलमानों को इस्लाम के दस्तूर से चलने की आजादी नहीं है। लेनिन के सिद्धांत की कसौटी पर चीन को परखते हैं। उन्होंने लिखा,'समाजवादी क्रांति महाशक्ति के श्रेष्ठवाद और राष्ट्रवाद के सामाजिक आधार का उन्मूलन कर देती है। मार्क्सवाद-लेनिनवाद के झंडे तले काम करने वाली कम्युनिस्ट-श्रमिक पार्टियां महाशक्ति श्रेष्ठवाद के हर प्रकटन के खिलाफ अडिग संघर्ष करती हैं। महाशक्ति श्रेष्ठवाद की विचारधारा और राजनीति का जन्म साम्राज्यवाद के दौर में हुआ था।' माओ से लेकर शी जिनपिंग तक चीन की कोई भी सरकार इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती। ऐतिहासिक कारणों से भारत की ब्रिटिश सरकार 'ग्रेट गेम' के परिणामों से बच गई। लद्दाख तक आने की ताकत रूस की जार सरकार में नहीं थी। अफगानिस्तान के वाखन गलियारे तक भी आना बहुत मुश्किल था।
आज हान राष्ट्रवादियों के लिए ये सब संभव है। जब तक भारत चीन को असहनीय नुकसान पहुंचाने की कुव्वत हासिल नहीं कर लेता, वह केवल अपनी शर्तों पर हमें सुकून से रहने देगा। 'ग्रेट गेम' ताकत से टला था। 'न्यू ग्रेट गेम' को नाकाम करने के लिए कम से कम समानुपातिक शक्ति तो ग्रहण ही करनी होगी। शक्ति होगी, तो राजनय भी काम करेगा।