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कहीं यह तीसरा विश्व युद्ध तो नहीं

sudheesh pachauri सुधीश पचौरी
Updated Wed, 15 Apr 2020 07:10 AM IST
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Coronavirus Case News In Hindi : Is this third world war somehow
कोरोना वायरस - फोटो : social media
एक कोरोना कोविड-19 है, लेकिन उसकी हजार व्याख्याएं हैं, यानी जितने मुंह उतनी बातें! वह है ही ऐसा बहुरूपिया! कई वैज्ञानिक मानते हैं कि यह ऐसा वायरस है, जो ‘प्राकृतिक’ न होकर ‘मनुष्य-कृत’ है और चीन के ‘वुहान’ की लेबोरेट्री में बना है। कहते हैं कि वुहान में चमगादड़ों पर रिसर्च कराई जा रही थी।

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उसी रिसर्च के चक्कर में यह वायरस ‘चमगादड़ टू चमगादड़’ फैल गया और फिर लोगों में फैल गया और लोगों की सांस बंद होने लगी। वे पटापट मरने लगे! कोई बताता है कि इसी ‘वुहान’ की एक ‘लेबोरेट्री’  में इसके प्रयोगों को अमेरिका ने फाइनेंस किया! कोई कहता है कि यह शुद्ध चीनी दुष्प्रयोग था। कोई कहता है कि यह चीन के ‘मुनाफाखोर पतित कम्यूनिज्म’ और अमेरिका के ‘बड़े कॉरपोरेटी पूंजीवाद’ की ‘जारज संतान’ है!

इसी तरह, कोई कहता है कि यह एक नए ‘जैविक युद्ध’ का ‘ट्रायल रन’ है, तो कोई कहता है कि यह तीसरे विश्व युद्ध का आरंभ है, जिसके एक ओर चीन है, तो दूसरी ओर अमेरिका -यूरोप है और जिसका निशाना दुनिया भर के ‘कमजोर’ और ‘बीमार’ लोग हैं।

कुछ कहते हैं कि चीन ने अमेरिका की आर्थिक ‘ब्लेक मेल’ का जवाब देने के लिए अमेरिका के खिलाफ इसे छोड़ दिया है, ताकि आगे वह चीन से आर्थिक टक्कर में न जीत पाए! कोई कहता है कि अमेरिका ने इसे वुहान में इसलिए विकसित कराया, ताकि पहला शिकार चीन ही बने और वह कमजोर हो जाए!

पर लगता है कि किसी दुर्योगवश यह खतरनाक ‘जैविक हथियार’ अपने बनने की शुरूआती प्रक्रिया में ही ‘आउट ऑफ कंट्रोल’ हो गया। उसने आदमी की सांस, थूक, छींक और संपर्क में घर बना लिया और वहीं से तेजी से फैलने लगा।
आज सारी दुनिया इसके ‘डर’ से त्राहि-त्राहि कर रही है। अब तक यह महामारी दुनिया के बीस लाख लोगों को बीमार बना चुकी है और डेढ़ लाख से अधिक को मार चुकी है और नित्य हजारों लोगों को मार रही है, क्योंकि न इसका कोई इलाज है, न टीका। सारी दुनिया इसी की रोकथाम में लगी है।

कई लोग मजाक में कहते हैं कि यह ‘मेड इन चाइना’ बीमारी है, जो चीनी खान-पान से पैदा  हुई है। यद्यपि चीनी इसका खंडन करते हैं और इसे चीनी बताने पर एतराज करते हैं। कई कहते हैं कि वहां के किसी व्यक्ति ने चमगादड़ का सूप पिया और यह उससे फैला।

ऐसी ही कहानी हॉलीवुड की 2011 में बनी फिल्म कंटेजियन भी कहती है! फिल्म दिखाती है कि किस तरह एक चीनी चमगादड़ के कुतरे हुए फल को संयोगवश एक सूअर खा लेता है, फिर उस सूअर के मांस को कुछ लोग खाते हैं और फिर उनके संपर्क में जो भी आता है, वह संक्रमित हो जाता है। देखते-देखते दो-दूनी-चार-दूनी-आठ’ की गति से यह फैलता जाता है और लोग पट-पट मरते जाते हैं। यह फिल्म यूट्यूब पर अब भी देखी जा सकती है।

चीन कहता है कि उसने रिकॉर्ड सत्तर दिनों में इस पर काबू पाकर दुनिया को दिखा दिया कि वही अब असली सुपर पावर है, अमेरिका नहीं। अमेरिका अब भी महामारी से रो रहा है, जबकि चीन ने दिखा दिया कि कोई भी उसके मुकाबिल नहीं है। उसी ने बीमारी दी, उसी ने कंट्रोल किया। अब अगर इससे बचना है, तो चीन की शरण में जाओ, उससे वेंटीलेटर, सुरक्षा कवच, दवा खरीदो, क्योंकि वही इन सबका सबसे बड़ा निर्माता है!

नव उदारवादी ग्लोबल नीतियों के चलते जिन अमेरिकी-यूरोपीय बहुराष्ट्रीय निगमों ने चीन के सस्ते श्रम को देख वहां अपनी फैक्टरियां लगाईं और वहां बने माल को दुनिया में बेचकर अकूत कमाई की और चीन से भी कमाई करवाई, वही अब कोरोना महामारी को रोकने के लिए जरूरी ‘लॉकडाउन’ करने के बजाय उसे जनता में फैलने दे रहे हैं, ताकि जनता में सामूहिक रोग अवरोधक क्षमता पैदा हो जाए, जिससे दवाई बनाई जा सके और इस तरह इस बीमारी से भी कमाया जा सके! चाहे इस चक्कर में लाखों मरें तो मरें!

ट्रंप की नीति भी कॉरपोरेटों के हित साधने वाली इसी नीति से चालित है, जिसके केंद्र में आदमी की जिदंगी नहीं, बल्कि मुनाफा है! लेकिन चीन की नीति भी इसी से परिचालित है! इसीलिए जैसे ही वुहान में कोरोना कंट्रोल हुआ, उसने शहर को रोशनियों से जगमगा दिया और दुनिया को जता दिया कि अगर कोरोना से लड़ना है, तो चीन से ये खरीदो, वो खरीदो! इस तरह यह एक ‘नई विश्व व्यवस्था’ की शुरूआत है, जो विश्व के बाजारों को एक बार फिर अपने कंट्रोल में लेना चाहती है।

कोरोना इसका ही एक औजार है, जिसके कारण सारे देशों की अर्थव्यवस्थाएं हिल रही हैं। अब अगर कोरोना को रोकना है, तो सब कुछ बंद करो! यानी अर्थव्यवस्था को चौपट होने दो और घाटा झेलो। और अपनी जनता को बचाना है, तो नए कर्जदार बनो! कर्ज देंगे बड़े कॉरपोरेशनों द्वारा संचालित आइएमएफ, वर्ल्ड बैंक और चीन!

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोप के देशों ने पिछड़े देशों को अपनी कॉलोनी बनाने व बसाने का काम छोड़ दिया। अब उत्साह में है तो चीन और वह चाहता है कि दुनिया को अपना बाजार बनाए, आपके देश में ‘बैल्ट रोड कॉरीडोर’ बनाए और आपको नई कॉलोनी बनाए, ताकि उसका माल आपके देश के बाजारों में बेखटके आ-जा सके।

यह है ‘चीनी नव साम्राज्यवाद’ का नक्शा, जो इन दिनों अमेरिकी-यूरोपीय नव-साम्राज्यवाद से टकराता दिखता है! इसीलिए यह लड़ाई लोगों के स्वास्थ्य, अस्तित्व व जीवनशैली को बदलने व जीतने की लड़ाई है, ताकि जो ‘सक्षम उपभोक्ता’ है, वह तो जिए, बाकी जाते हैं तो जाएं! यह है नया जैविक-युद्ध, जिसे विश्व की बड़ी दवा कंपनियां आदमी को ही कॉलोनी बनाने के लिए चला रही हैं, जिसकी एक कमान चीन के हाथ में, तो दूसरी बड़े कॉरपोरेशनों और उनके राजनीतिक रहनुमाओं के हाथ में है!

अपवाद है तो सिर्फ भारत, जिसने आम आदमी के जीवन को मुनाफेबाजी से ऊपर रखा है और इसीलिए लंबा लॉकडाउन किया है। देशवासियों की एकजुटता और जीने की इच्छाशक्ति के बल पर इसने कोरोना से लड़ाई को नए आयाम दिए हैं, जिनकी प्रशंसा दुनिया कर रही है! जाहिर है, जीवन-मरण के इस युद्ध में भारत वह तीसरा पक्ष है, जो विकल्प दे सकता है, बशर्ते कि हम गांधी के हिंद स्वराज के सुझाए रास्ते को भी एक बार परखें और उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ में न फंसकर ‘त्यक्तेन भुंजीथा’ की बात करें! (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)
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