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संकट को बेकार न जाने दें, भाजपा और पीएम मोदी पर कई सवाल उठा रहे रामचंद्र गुहा

रामचंद्र गुहा Published by: रामचंद्र गुहा Updated Sun, 03 Jan 2021 06:05 AM IST
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Do not let the crisis go waste, Ramchandra Guha is taking the Modi government on target
नरेंद्र मोदी-अमित शाह (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

भारतीयों के स्वास्थ्य और भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिहाज से 2020 एक खराब साल साबित हुआ। अपनी प्रकृति और विचार से सत्तावादी मोदी-शाह की सत्ता ने महामारी का इस्तेमाल सांविधानिक लोकतंत्र को कमतर करने, और राज्य और समाज में अपनी पकड़ को मजबूत करने में किया है। अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सत्ता ने भारतीय संसद, भारतीय संघवाद, भारतीय प्रेस और भारतीय नागरिक संगठनों पर हमले किए हैं। आइए, इन पर विचार करें।


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गुजरात का मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने विधायी प्रक्रिया की निरंतर अवज्ञा की। मुख्यमंत्री के रूप में उनके एक दशक पूरा करने पर तैयार की गई एक रिपोर्ट में बताया गया था कि गुजरात के राज्य बनने के बाद से सारे मुख्यमंत्रियों की तुलना में मोदी के समय विधानसभा की सबसे कम बैठकें हुईं। जैसा कि सर्वविदित है कि विपक्ष के साथ ही अपनी खुद की पार्टी के विधायकों की सलाह को तवज्जो न देने के साथ ही मुख्यमंत्री मोदी अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों से भी बड़े नीतिगत फैसलों के संबंध में कम ही मशविरा करते थे। 

मोदी परामर्श के प्रति इसी अवज्ञा के साथ नई दिल्ली आए। उनके लिए संसद बहस के जरिये निर्णय लेने के सदन के बजाय भावोत्तेजक भाषण देने की जगह है। लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति का पक्षपाती रुख अपने नेता के विचार करने के तरीके के अनुरूप ही होता है। उनके सहायक भी इसी तरह से काम करते हैं। जरा विचार कीजिए कि किस तरह से राज्यसभा में कृषि विधेयकों को उपसभापति हरिवंश ने संसद के सारे नियमों और कायदों को दरकिनार कर और वोटिंग से इनकार कर पारित करवाया। लोकतांत्रिक प्रक्रिया की इस अनदेखी पर लोकसभा के पूर्व महासचिव पी.डी.टी. आचार्य ने लिखा कि 'संसद की प्रणाली इस तरह से बनाई गई है कि विपक्ष अपनी बात कह सके और सरकार अपना काम कर सके। यदि विपक्ष अपनी बात न कह सके, तो एक लोकतांत्रिक संस्थान के रूप में संसद लंबे समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकती।'

जो लोग मोदी भक्त हैं या जो यह मानते हैं कि अंत भला तो सब भला, उन्होंने 'ऐतिहासिक' बताकर इन बिलों का स्वागत किया है। दूसरी ओर कहीं अधिक संदेह और इतिहास की गहरी समझ के साथ कृषि बिलों का समर्थन करने वालों ने सम्मानजनक ढंग से हमें संसद की ऐसी अवमानना के घनघोर नतीजे के प्रति आगाह किया है। जैसा कि वरिष्ठ वकील अरविंद दातार ने लिखा, 'यदि बिलों को संसद से इस तरह जबरिया पारित नहीं करवाया जाता, तो भारी आर्थिक नुकसान और दिल्ली के आसपास सामान्य जनजीवन को अस्त-व्यस्त होने से बचाया जा सकता था। इस आंदोलन ने हमें संसदीय प्रक्रिया के अनुपालन के बारे में सिखाया कि इन पर सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि भावना के साथ अमल होना चाहिए।' केंद्रीय मंत्री भले ही अर्बन नक्सलियों, खालिस्तानियों और विपक्षी दलों पर दोषारोपण करें, लेकिन जैसा कि दातार ने रेखांकित किया कि जिस असाधारण हड़बड़ी के साथ कृषि बिलों को दोनों सदनों से पारित करवाया गया, उससे यह संकट पैदा हुआ है, और यह महामारी से उपजे आर्थिक संकटों को और बढ़ाएगा। हाल ही में सरकार ने महामारी का हवाला देकर संसद के शीतकालीन सत्र को रद्द कर दिया, वह भी तब, जब केंद्रीय गृह मंत्री असम और पश्चिम बंगाल में बड़ी चुनावी रैलियों को संबोधित कर रहे थे।

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी दावा करते थे कि वह 'सहकारी संघवाद' पर विश्वास करते हैं। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने निर्ममता के साथ राज्यों के अधिकारों और जिम्मेदारियों में कटौती करनी चाही। इस मामले में भी किसान बिलों को उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। जैसा कि हरीश दामोदरण ने रेखांकित किया, 'चूंकि संविधान में स्पष्ट रूप से कृषि और बाजार, दोनों को राज्य सूची में रखा गया है, केंद्र राज्यों को इनसे संबंधित मामलों में प्रोत्साहित कर सकता है और लुभा सकता है। हालांकि वह खुद से कानून नहीं बना सकता।' इसके बावजूद समवर्ती सूची में शामिल खाद्य सामग्री के व्यापार और विपणन से संबंधित एक विषय की रचनात्मक (कु)व्याख्या के जरिये केंद्र ने राज्यों से मशविरा किए बिना ऊपर बताए गए ढंग से इन बिलों को पारित करवाया।

महामारी संघीय सिद्धांतों पर कहीं अधिक सामान्य ढंग से किए गए हमले की गवाह बन गई। औपनिवेशिक दौर के कानूनों और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम के जरिये केंद्र की शक्तियों में इजाफा किया गया। इस बीच, विपक्षी दलों के विधायकों को भाजपा से जुड़ने के लिए रिश्वत देकर, बहला-फुसलाकर या धमका कर उनकी राज्य सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश की गई। प्रधानमंत्री ने जिस तरह से महज चार घंटे के नोटिस पर लागू किए गए लॉकडाउन के लिए मध्य प्रदेश में नई सरकार के शपथ ग्रहण का इंतजार किया था, वह दिखाता है कि भाजपा को सत्ता की कैसी फिक्र है और भारतीयों के स्वास्थ्य को लेकर वह कितनी कम गंभीर है। संघवाद पर हमले के क्रम में भाजपा ने खासतौर से दो बड़े राज्यों पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र को निशाना बनाया है। राज्यपाल संविधान से कहीं अधिक हिंदुत्व के प्रति वफादार हैं और मोदी-शाह ने गैर भाजपा सरकार शासित राज्यों को उत्पीड़ित करने के लिए उनका इस्तेमाल किया है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान नरेंद्र मोदी अत्यंत गैरराजनीतिक नागरिक संगठनों के प्रति भी गहराई से अविश्वास जताते थे। इसी अविश्वास के साथ वह दिल्ली आए। वर्ष 2020 पहले से दबाव में आए गए एनजीओ पर और अधिक अंकुश लगाने वाला साबित हुआ। एक विश्लेषक के मुताबिक फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेग्यूलेशन) ऐक्ट में किया गया नया संशोधन अधिकारियों द्वारा मनमानी बदले की कार्रवाई करने के लिए किया गया। एनजीओ पर अंकुश लगाने से इस बिल का शिक्षा, स्वास्थ्य और लोगों की आजीविका, लैंगिक न्याय और वास्तव में भारत के लोकतंत्र पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा।

नरेंद्र मोदी कभी भी खुद के लिए सोचने वाले पत्रकारों को पसंद नहीं करते हैं, जैसा कि साढ़े छह साल में प्रधानमंत्री द्वारा एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित न करना दिखाता है। 2020 भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर बढ़ते हमले का गवाह बना। मार्च के आखिर में लॉकडाउन लागू गिए जाने के बाद शुरुआती दो महीनों में 55 पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, उन्हें धमकाया गया और उनकी गिरफ्तारी हुई। पत्रकारों पर सबसे अधिक हमले भाजपा शासित उत्तर प्रदेश, जम्मू और कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश में हुए। फ्री स्पीच कलेक्टिव की रिपोर्ट कहती है, 2020 भारत में पत्रकारों के लिए सबसे बुरा रहा।...पत्रकारों पर हमले और उनकी हत्याएं जारी रही। मीडिया में स्वघोषित सेंशरशिप खुला रहस्य है, सरकार ने ऑनलाइन मीडिया के लिए मीडिया नीति, फंडिंग और प्रशासनिक तंत्र के जरिये मीडिया को और नियंत्रित करना चाहा।

संसद, संघवाद, नागरिक समाज संगठन और प्रेस पर हमलों के अलावा 2020 भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को और अधिक कलंकित करने का गवाह बना। ऐसा भारत के दो सबसे ताकतवर राजनेताओं ने किया। गृह मंत्री अमित शाह की यह भूमिका भाजपा के बंगाल अभियान और दिल्ली के दंगों के बाद पुलिस की पक्षपाती कार्रवाई के दौरान नजर आई। वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की भूमिका हल्के-फुल्के आरोपों या बेबुनियाद मामलों में मुस्लिमों की बढ़ती गिरफ्तारी में नजर आई। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रधानमंत्री के हाल के भाषण के बावजूद स्पष्ट रूप से यह आदित्यनाथ का बहुसंख्यकवाद है, जो पार्टी के निष्ठावानों की भावनाओं को प्रदर्शित कर रहा है, जैसा कि भाजपा के मुख्यमंत्रियों द्वारा उत्तर प्रदेश जैसे पक्षपाती कानूनों और अभ्यास पर अमल को लेकर दिखाई जा रही उत्सुकता से प्रदर्शित हो रहा है। 

कृषि और श्रम से संबंधित नए कानूनों के पारित होने के बाद मुक्त बाजार समर्थक स्तंभकारों ने एक स्वर से कहना शुरू कर दिया, संकट बेकार नहीं गया है। यह कोरस भोलापन है, क्योंकि सतत आर्थिक विकास के लिए समान अवसर और कानून का राज चाहिए। मोदी-शाह के शासन में यह संभव नहीं। गुप्त इलेक्टोरल बांड के रूप में सहयोग करने वाले पूंजीपतियों को प्राथमिकता मिलेगी। दूसरी पार्टियों से भाजपा में जाने वाले राजनेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के सारे मामले खत्म हो गए। पुलिस, नौकरशाह यहां तक कि अदालतें तक कानून के बजाय अपने राजनीतिक आकाओं के हितों के लिए काम करती हैं।

राज्य और निजी क्षेत्र को जवाबदेह बनाने के लिए स्वतंत्र प्रेस की पारदर्शी नजर, संसद में बहस और स्वतंत्र नागरिक संगठनों की जरूरत होती है। 2020 ने दिखाया कि ये चीजें पहले से और कम हुई हैं। अंत में, तब तक सामाजिक सौहार्द कायम नहीं हो सकता, जब तक कि राज्य और सत्तारूढ़ दल गैर हिंदुओं के प्रति निम्न व्यवहार करें।

प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी के लिए राजनीतिक सत्ता, वैचारिक नियंत्रण और व्यक्तिगत गौरव भारतीय नागरिकों की आर्थिक और सामाजिक समृद्धि से ऊपर हैं। इसलिए उन्होंने भारतीय लोकतंत्र के संस्थानों और भारतीय बहुलतावाद की परंपराओं को कमजोर करने के लिए संकट का उपयोग या दुरुपयोग किया, ताकि सत्तावादी और बहुसंख्यकवादी राज्य की स्थापना में तेजी लाई जा सके।

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