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गोल से इतर: जब फुटबॉल बना सत्ता, युद्ध और साजिश का सबसे बड़ा मैदान
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फीफा विश्व कप
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अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
11 जून, 2026। मेक्सिको सिटी। एस्तादियो आज्तेका। एक लाख बीस हजार लोग। तीन देशों के झंडे-अमेरिका, मेक्सिको, कनाडा। दुनिया का सबसे बड़ा खेल उत्सव। फीफा वर्ल्ड कप 2026। 48 टीमें। 16 शहर। 39 दिन। मगर, एक मिनट। जरा तस्वीरों को गौर से देखिए। यही तीन देश एक-दूसरे से लड़ भी रहे हैं। ट्रंप ने मेक्सिको सीमा पर दीवार बनवाई। टैरिफ लगाए। बच्चों को मां-बाप से अलग किया। और अब? वही मेक्सिकन और अमेरिकी दर्शक एक साथ बैठे हैं और गोल के दीवाने हुए जा रहे हैं। और यह वही एस्तादियो आज्तेका है, जहां 1986 में माराडोना ने ‘हैंड ऑफ गॉड’ खेला था। हाथ से गोल चुराया। रेफरी ने नहीं देखा। धोखा। राजनीति। खून। फुटबाल में इनका भी पुराना खेल है।आइए, टाइम मशीन में बैठिए। यह सफर खूबसूरत नहीं होगा, क्योंकि फुटबाल कभी सिर्फ खेल नहीं रहा। यह 1934 है। टाइम मशीन रोम के स्टूडियो नाजियोनाले में उतर रही है। बालकनी पर बेनिटो मुसोलिनी खड़ा है। काला कोट। ठोड़ी ऊपर। फासिस्ट सलाम। इटली के तानाशाह ने वर्ल्ड कप को अपना प्रचार हथियार बनाया है। ‘इल ड्यूस’ को जीत चाहिए। किसी भी कीमत पर। रेफरी तय किए गए। स्वीडन के खिलाफ इटली ने बर्बर खेल खेला। लात, घूंसा, कोहनी सब चले। रेफरी ने सीटी नहीं बजाई। सेमीफाइनल में ऑस्ट्रिया की ‘वंडरटीम’ इतनी पिटी, खेल में नहीं हाथ पैर से, कि खिलाड़ी चलने लायक नहीं रहे। फाइनल से एक दिन पहले मुसोलिनी ने रेफरी बदलवाया। इटली जीत गया। मुसोलिनी ने ट्रॉफी उठाई-जैसे यह उसकी निजी जीत हो। फीफा के तत्कालीन अध्यक्ष ज्यूल रिमे ने बाद में कहा, ‘बेनिटो मुसोलिनी ने वर्ल्ड कप चुरा लिया।’
फुटबाल का पहला अपहरण था यह। तानाशाह ने खेल को अपनी ताकत का आईना बनाया। पैटर्न यहीं से शुरू हुआ। अब हम मध्य अमेरिका पहुंच रहे हैं। टेगुसिगलपा और सैन साल्वाडोर। जुलाई 1969। दो छोटे देश हैं-होंडुरास और एल साल्वाडोर।
1970 वर्ल्ड कप का क्वालिफायर चल रहा है। पहले मैच में होंडुरास के दर्शकों ने रातभर एल साल्वाडोर की टीम के होटल के बाहर शोर मचाया। पत्थर फेंके। खिड़कियां तोड़ीं। एल साल्वाडोर हारा। दूसरे मैच में होंडुरास के झंडे जलाए गए। होंडुरास हारा। तीसरा मैच मेक्सिको सिटी में। तटस्थ मैदान में एल साल्वाडोर जीता। और फिर? 14 जुलाई, 1969 को एल साल्वाडोर की सेना ने होंडुरास पर हमला कर दिया। असली हमला। बम। टैंक। हवाई जहाज। चार दिन में 3,000 मरे। एक लाख बेघर। इतिहास इसे ‘फुटबाल वॉर’ कहेगा। यह एकमात्र जंग थी, जो फुटबाल से शुरू हुई।
टाइम मशीन आगे बढ़ रही है। अब अर्जेंटीना। ब्यूनस आयर्स। जून 1978। अर्जेंटीना नाच रहा है। मगर जरा बाहर देखिए। स्टेडियम से सिर्फ एक किलोमीटर दूर एस्मा है, यानी नौसेना का इंजीनियरिंग स्कूल। यह स्कूल नहीं है। सैन्य तानाशाही का सबसे कुख्यात यातना केंद्र है। जब स्टेडियम में गोल होता है और भीड़ चीखती है, तब एस्मा के तहखाने में बिजली के झटके दिए जा रहे होते हैं। जब दर्शक ताली बजाते हैं, तब कैदी चीखते हैं। जनरल विदेला की हुकूमत ने 30,000 लोग ‘गायब’ कर दिए। कैदी महिलाओं के बच्चे छीनकर सैनिक परिवारों को दिए गए। जिंदा लोगों को हेलिकॉप्टर से समुद्र में फेंक दिया गया। इन्हें ‘डेथ फ्लाइट्स’ कहा जाएगा। और बाहर? फुटबाल। अर्जेंटीना ने वर्ल्ड कप जीता। तानाशाही को चार साल वैधता और मिली। प्लाजा दे मायो की माताएं, जिनके बेटे गायब हो गए, हर गुरुवार चौक में चक्कर लगाती हैं। सफेद रूमाल सिर पर, यही उनकी ट्रॉफी है। कोई दर्शक उनके लिए नहीं था।
टाइम मशीन कोलंबिया में उतर रही है। मेदेयिन। दो जुलाई, 1994। यह दृश्य बड़ा कसाईनुमा होगा। एंड्रेस एस्कोबार। कोलंबिया का डिफेंडर। शांत चेहरा। ‘एल काबायेरो’ कहते थे उसे, यानी सज्जन आदमी। 1994 का वर्ल्ड कप। अमेरिका में। कोलंबिया बनाम अमेरिका। 34वां मिनट। एस्कोबार ने गेंद काटने की कोशिश की। गेंद उसके पैर से लगकर अपनी ही गोल में चली गई। खुद पर गोल। कोलंबिया हारा। वर्ल्ड कप से बाहर। एस्कोबार मेदेयिन लौटा। दस दिन बाद। एक नाइट-क्लब की पार्किंग में तीन आदमियों ने उसे घेरा। वे ड्रग कार्टेल से जुड़े थे। छह गोलियां मारीं। हर गोली के साथ चिल्लाते गए-‘गोल! गोल! गोल!’ एंड्रेस एस्कोबार मर गया। वह 27 साल का था। कोलंबिया के ड्रग माफिया ने मैचों पर करोड़ों का सट्टा लगाया था। गलती से खुद पर गोल की वजह से उनका पैसा डूबा, तो मौत की सजा। फुटबाल ने यह भी देखा।
अब ज्यूरिख चलते हैं, जहां खेल का कारोबार होता है। 27 मई, 2015। ओ लैक होटल। यह दुनिया के सबसे महंगे होटलों में से एक है। कल फीफा कमेटी का मतदान है। सेप ब्लैटर फिर अध्यक्ष बनने वाले हैं। और तभी, स्विस पुलिस लॉबी में घुसती है। सात गिरफ्तारियां। चादरों से मुंह छिपाते अधिकारी। हथकड़ियां। अमेरिकी न्याय विभाग में 164 पन्ने की चार्जशीट। दो दशकों में 15 करोड़ डॉलर की रिश्वत। मनी लॉन्ड्रिंग। फुटबाल इतना दागी पहली बार नजर आया। सेप ब्लैटर तो फीफा को ‘शिकागो के राजनेता की तरह’ चलाता था। उसने इस महंगे खेल आयोजन पर 17 साल राज किया। कतर ने 2022 वर्ल्ड कप खरीदा। एक ऐसा देश, जहां 50 डिग्री गर्मी पड़ती है, जिसकी टीम कभी क्वालिफाई नहीं कर पाई। कतर के शाही परिवार ने ब्लैटर को प्राइवेट जेट दिया। चुनाव में वोट खरीदे। बदले में वर्ल्ड कप मिला। टाइम मशीन बर्लिन पहुंच रही है। यहां सबसे बड़ा धोखा होने वाला है और सबसे ज्यादा तालियां भी बजेंगी। बर्लिन। नौ जुलाई, 2006। वर्ल्ड कप फाइनल सामने है। इटली बनाम फ्रांस। जीदान ने मातेराजी के सीने में सिर मारा। रेड कार्ड। और इटली ने पेनल्टी शूटआउट में ट्रॉफी जीती। रोम में लाखों लोग सड़कों पर। मगर इसी वक्त इटली में ‘काल्चोपोली’ स्कैंडल फट रहा है। यूवेंटस, यानी इटली के सबसे बड़े क्लब का जनरल मैनेजर लूचानो मोगी। रेफरियों को फोन करते पकड़ा गया है। कौन-सा रेफरी, कौन-सा मैच संभालेगा। यह सब मोगी तय कर रहा था। बातचीत टेप हुई। हजारों कॉल। सैकड़ों मैच। यूवेंटस की दो सीरी ए चैंपियनशिप छीनी गईं। इटली के सबसे बड़े क्लब को द्वितीय श्रेणी में डाल दिया गया। एसी मिलान, फियोरेंटीना, लात्जियो, सब इस फिक्सिंग की लपेट में आए। भारी जुर्माने लगे। प्रतिबंध लगा। और जिस इतालवी टीम ने बर्लिन में वर्ल्ड कप उठाया, उसके कई खिलाड़ी उन्हीं क्लबों से थे, जिन पर मैच फिक्सिंग साबित हुई थी। चैंपियन और चोर-एक ही जर्सी में। टाइम मशीन वापस लौट रही है। वर्ल्ड कप अपने चरम पर है। स्टेडियम भरे हैं। दुनिया देख रही है। फुटबाल दुनिया का सबसे खूबसूरत खेल है और दुनिया का सबसे खूबसूरत झूठ भी। गोल होता है और सब गोल हो जाता है। दुनिया गोल याद रखती है और बाकी सब भूल जाती है। तानाशाह, भ्रष्ट नौकरशाह, राजनेता और अपराधी यही तो चाहते हैं।
फिर मिलते हैं अगले सफर पर...