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अमेरिका का 250 स्वतंत्रता दिवस: कानून नहीं, नागरिकों की चेतना करती है आजादी की असली रक्षा

Sun, 05 Jul 2026 06:57 AM IST
निर्मल कांत ब्रेट स्टीफेंस, न्यूयॉर्क टाइम्स
ब्रेट स्टीफेंस, न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: निर्मल कांत Updated Sun, 05 Jul 2026 06:57 AM IST
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सार
आज जब अमेरिका अपनी ढाई सौवीं वर्षगांठ के जश्न में डूबा है, तब फिर वही प्रश्न सामने खड़ा है कि स्वतंत्रता की मूल भावना क्या है या वास्तव में क्या होनी चाहिए?
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US 250th Independence Day: Freedom is safeguarded by citizens’ awareness, not just laws
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

सन 1944 के मई महीने में न्यूयार्क में न्यायमूर्ति लर्नड हैंड ने ‘स्वतंत्रता के मर्म’ पर एक संक्षिप्त, किंतु कालजयी भाषण दिया। उन्होंने चेताया था कि स्वतंत्रता की रक्षा केवल संविधान, कानून या न्यायालय नहीं कर सकते। और जहां मनुष्य अपनी स्वतंत्रता पर किसी मर्यादा को स्वीकार नहीं करता, वहां अंततः स्वतंत्रता कुछ हिंसक और स्वार्थी लोगों की जागीर बन जाती है।


उनके अनुसार, स्वतंत्रता की आत्मा विनम्रता, जिज्ञासा, उदारता और आत्मसंयम के संगम में बसती है। वह उस मन की अवस्था है, जो अपने ही सत्य पर अभिमान से अडिग नहीं रहता, जो दूसरों के विचारों को समझने का प्रयास करता है, जो अपने हितों के साथ दूसरों के हितों को भी समान निष्पक्षता से तौलता है। यह कोई स्थिर उपलब्धि नहीं, बल्कि एक दुर्लभ चेतना है, जिसे केवल नागरिकों का विवेक और साहस ही जीवित रख सकता है। उसी चेतना की रक्षा के लिए उस समय असंख्य युवा अपने प्राण न्योछावर कर रहे थे।


यह भाषण डी-डे की पूर्व संध्या पर दिया गया था। आज जब अमेरिका अपनी ढाई सौवीं वर्षगांठ के जश्न में डूबा है, तब फिर वही प्रश्न सामने खड़ा है कि  स्वतंत्रता की मूल भावना क्या है या वास्तव में क्या  होनी चाहिए?

यह भावना है सार्वजनिक आदर्श की, जिसकी शुरुआत राष्ट्र प्रमुख के चरित्र से होती है। एक ऐसा मर्यादित चरित्र, जो विनम्रता, संयम और शुचिता से ओत-प्रोत हो। वे गुण, जो इस सर्वोच्च पद की असीम और कभी-कभी भयावह शक्तियों को संतुलित करने के लिए नितांत आवश्यक हैं। यह भावना है एक ऐसे नेतृत्व की, जो स्वयं को पूर्णतः, पारदर्शी रूप से और सूक्ष्मता के साथ नियम के अधीन रखकर कानूनों का निष्ठापूर्वक पालन सुनिश्चित करता है। यह भावना है एक ऐसी राज कुशलता की, जो कभी आडंबर को महानता, लफ्फाजी को यथार्थ या स्मारकों को सार्थकता समझने की भूल नहीं करती।

यह भावना है व्यक्तिगत उत्तरदायित्व की, इस बोध की कि लोकतांत्रिक विकल्प चुनने का अधिकार हमसे यह मांग करता है कि हम अपने निर्णयों की जिम्मेदारी स्वयं लें, न कि बलि के बकरे तलाशें। यह भावना है विक्टिम मेंटालिटी  के प्रति तिरस्कार की, जो एक स्वतंत्र समाज को शोभा नहीं देती और उसके चरित्र का पतन करती है। यह इस दृढ़ विश्वास की भावना है कि कोई भी व्यक्ति या राष्ट्र, जो सफलता का श्रेय तो लेता है, परंतु असफलता की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेता है। वह न तो सफलता के योग्य है और न ही अपनी भूलों को दोहराने से बच सकता है।

स्वतंत्रता की आत्मा इतिहास की स्मृति से भी जन्म लेती है। यदि हम यह भूल जाएं कि स्वतंत्रता पाने के लिए कितने संघर्ष, कितने बलिदान और कितनी पीढि़यों की तपस्या लगी है, तो उसे बचाए रखना भी संभव नहीं होगा। इतिहास का सम्मान न तो आंख मूंदकर नायकों की पूजा करना है और न ही हर पूर्वज को कठघरे में खड़ा कर देना। बुद्धिमत्ता इस बात में है कि हम उनके योगदान को समझें, उनकी सीमाओं को भी पहचानें और उस व्यवस्था की मजबूती को संजोएं, जिसने आने वाली पीढि़यों को स्वयं को और बेहतर बनाने का अवसर दिया।

स्वतंत्रता का स्वभाव खुलापन है। खुला हाथ, जो उदारता से आगे बढे़। खुला द्वार, जो योग्य लोगों का स्वागत करे  और खुला मन, जो नए विचारों का स्वागत कर सके। यह आत्मविश्वास भी उसी का हिस्सा है कि उदार बने रहते हुए भी कोई समाज अपनी सीमाओं, सुरक्षा और मूल विश्वासों की रक्षा कर सकता है। ऐसा समाज स्वयं का उत्सव मनाने से अधिक स्वयं का आत्मपरीक्षण करता है। वह पुराने विशेषाधिकारों को केवल उनकी उम्र के कारण महत्व नहीं देता, बल्कि  नए विचार, नई प्रतिभा और नए नागरिक का भी    समान सम्मान करता है। आर्थिक जीवन में भी यही खुलापन उद्यम, सृजन और श्रम को सम्मान देता है, जिससे समृद्धि जन्म लेती है और परोपकार के नए मार्ग खुलते हैं।

स्वतंत्रता की आत्मा यह भी जानती है कि संसार में उसके विरोधी हैं। उनसे संघर्ष केवल शक्ति के बल पर नहीं, बल्कि विश्वसनीय मित्रताओं, धैर्य और सिद्धांतों के प्रति निष्ठा से जीता जाता है। नेतृत्व वही कर सकता है, जो पहले स्वयं नेतृत्व के योग्य सिद्ध हो। जो समाज स्वतंत्रता का आदर्श प्रस्तुत करता है, उसके विरोधी अक्सर उसकी त्रुटियों से अधिक उसके आदर्शों से भयभीत होते हैं, क्योंकि वही आदर्श उनके अपने उत्पीडि़त नागरिकों को आशा देते हैं।

स्वतंत्रता का सबसे बड़ा शत्रु केवल हथियार उठाने वाला उग्रवादी नहीं होता। वह हर वह व्यक्ति भी है, जो विचारों पर पहरा बैठाना चाहता है। जो यह तय करना चाहता है कि कौन-सा विचार वर्जित है और कौन-सा शब्द बोलना अपराध है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उद्देश्य केवल श्रेष्ठ विचारों की रक्षा करना नहीं, बल्कि उन विचारों की भी रक्षा करना है, जो गलत सिद्ध हो सकते हैं, क्योंकि अनेक बार भूल ही सत्य तक पहुंचने का पहला सोपान बनती है। विश्वविद्यालयों, समाचार माध्यमों और सभी बौद्धिक संस्थाओं का दायित्व है कि वे निर्भीक प्रश्न पूछने और निर्बाध अभिव्यक्ति की संस्कृति को जीवित रखें, न कि वैचारिक अनुरूपता के आगे समर्पण कर दें।

स्वतंत्रता निरंतर बनने की प्रक्रिया है। किसी राष्ट्र की पहचान केवल उसके पूर्वजों की जन्मभूमि या उनके साथ हुए व्यवहार से निर्धारित नहीं होती। वह इस बात से निर्मित होती है कि आज उसके नागरिक कौन हैं और भविष्य में क्या बनना चाहते हैं। अतीत की स्मृतियां मूल्यवान हैं, पर उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण भविष्य की आकांक्षाएं हैं। स्वतंत्र समाज मनुष्य को अपना भाग्य स्वयं गढ़ने की क्षमता देता है।

और अंततः, स्वतंत्रता की आत्मा आशावान होती है। इसलिए नहीं कि सफलता निश्चित है, क्योंकि ऐसा कभी नहीं होता और इसलिए भी नहीं कि अच्छाई हर बार विजय प्राप्त करती है। आशा इसलिए बनी रहती है कि भूलों, पराजयों और निराशाओं के बीच भी मनुष्य को फिर से आरंभ करने का अवसर मिलता है। यही किसी भी स्वतंत्र समाज की सबसे बड़ी शक्ति है और यही उसकी सबसे उजली पहचान।

©The New York Times 2026
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