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संस्कृति के पन्नों से: धन्वंतरि ने लिया काशी में अवतार, मानवता को मिला आरोग्य का वरदान
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धन्वंतरि
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अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
समुद्र मंथन के समय जब देवता और दानव अमृत पाने के लिए क्षीरसागर का मंथन कर रहे थे, तब दिव्य रत्नों के साथ एक तेजस्वी पुरुष भी प्रकट हुए। उनके मुख पर अद्भुत शांति थी। समुद्र मंथन से प्रकट होते ही वह भगवान विष्णु के विभिन्न नामों का जप करते हुए समस्त प्राणियों के आरोग्य तथा कल्याण का चिंतन करने लगे।अपने सामने श्रीहरि को देख वह विनम्रतापूर्वक खड़े हो गए। तब प्रभु ने उनसे कहा, ‘तुम जल से उत्पन्न हुए हो, इसलिए तुम्हारा नाम ‘अब्ज’ होगा।’ उसी समय से वह देवता अब्ज के नाम से प्रसिद्ध हो गए। उन्होंने नारायण को प्रणाम करके कहा, ‘प्रभो! मैं आपका पुत्र हूं। कृपा करके मेरे लिए भी यज्ञभाग और लोक में कोई सम्मानित स्थान निर्धारित कीजिए।’
भगवान विष्णु ने स्नेहपूर्वक कहा, ‘वत्स! यज्ञों के भाग का विभाजन पहले ही देवताओं में हो चुका है। महर्षियों ने हविष्य और यज्ञफल देवताओं के लिए निश्चित कर दिए हैं। तुम देवताओं के बाद प्रकट हुए हो, इसलिए वैदिक यज्ञों में तुम्हारे लिए पृथक भाग निर्धारित नहीं किया जा सकता। परंतु, निराश मत हो। भविष्य में तुम्हें ऐसा गौरव प्राप्त होगा, जो अत्यंत दुर्लभ है। अगले जन्म में तुम मनुष्यों के बीच जन्म लोगे। गर्भावस्था से ही तुम्हें दिव्य सिद्धियां प्राप्त होंगी। उसी शरीर में रहते हुए तुम देवतुल्य सम्मान पाओगे। ब्राह्मण तुम्हारी पूजा मंत्रों, व्रतों, जपों और अनुष्ठानों से करेंगे।’
श्रीहरि ने आगे कहा, ‘तुम आयुर्वेद को व्यवस्थित करोगे और उसे आठ अंगों में विभाजित करके संसार के लिए अमूल्य ज्ञान का स्रोत बनाओगे। तुम्हारे द्वारा रोगियों को जीवन और स्वास्थ्य प्राप्त होगा।’ भगवान विष्णु के इन वचनों को सुनकर अब्ज अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रभु को प्रणाम किया और उनके अंतर्धान होने के बाद अपने नियत समय की प्रतीक्षा करने लगे।
द्वापर युग का आगमन हुआ। उस समय काशी के राजा सुनहोत्र के पुत्र धन्व पुत्रप्राप्ति की इच्छा से तपस्या करने लगे। उन्होंने भगवान धन्वंतरि की उपासना आरंभ की। उनकी एक ही इच्छा थी-उन्हें असाधारण गुणों से संपन्न और लोककल्याण का कार्य करने वाला पुत्र प्राप्त हो। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान धन्वंतरि प्रकट होकर बोले, ‘राजन! मैं तुम्हारी आराधना से प्रसन्न हूं। जो वर मांगना चाहो, मांगो।’ राजा धन्व ने कहा, ‘भगवन! कृपा करके आप मेरे पुत्र के रूप में जन्म लीजिए। इससे मेरा जीवन धन्य हो जाएगा।’ धन्वंतरि ‘तथास्तु’ कहकर अंतर्धान हो गए।
कुछ समय बाद राजा के घर एक दिव्य पुत्र का जन्म हुआ। वह भगवान धन्वंतरि थे। बड़े होने पर उन्होंने महर्षि भारद्वाज से आयुर्वेद और चिकित्सा विज्ञान का गहन अध्ययन किया। शीघ्र ही वह इस ज्ञान में पारंगत हो गए। उन्होंने अनुभव किया कि आयुर्वेद का ज्ञान विशाल और विस्तृत है। इसलिए, भगवान धन्वंतरि ने उसे व्यवस्थित करके आठ प्रमुख अंगों में विभाजित किया। उन्होंने केवल सिद्धांत ही नहीं दिए, बल्कि रोगों की पहचान, उपचार और स्वस्थ जीवन के नियम भी बताए। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। असंख्य शिष्य उनके पास शिक्षा लेने आने लगे। धन्वंतरि ने सबको आयुर्वेद का ज्ञान प्रदान किया और चिकित्सा को लोककल्याण का साधन बनाया। इसी कारण वह आज भी आयुर्वेद के आदिदेवता और चिकित्सा विज्ञान के महान आचार्य माने जाते हैं।
धन्वंतरि के पुत्र का नाम केतुमान था। आगे चलकर उनके वंश में भीमरथ और धर्मात्मा राजा दिवोदास का जन्म हुआ। दिवोदास वाराणसी के प्रसिद्ध शासक बने। उनके समय में भगवान रुद्र के पार्षद निकुंभ के शाप के कारण वाराणसी एक हजार वर्षों तक निर्जन हो गई। नगर के उजड़ जाने पर राजा दिवोदास ने गोमती नदी के तट पर एक नई व सुंदर नगरी बसाई। इस प्रकार भगवान धन्वंतरि का अवतार केवल एक राजा के पुत्र के रूप में नहीं हुआ था, बल्कि मानवता को स्वास्थ्य, दीर्घायु और चिकित्सा का अमूल्य ज्ञान देने के लिए हुआ था।