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ईरान युद्ध का अंत कैसे होगा: सत्ता परिवर्तन, समझौता या लंबा संघर्ष?
ब्रेट स्टीफेंस, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: Devesh Tripathi
Updated Mon, 16 Mar 2026 06:47 AM IST
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सार
ईरानी नेताओं के खुद को अभेद्य समझने का दौर अब खत्म हो चुका है। आपसी कलह या फिर जन-विद्रोह के चलते जल्द ही ईरानी शासन में बदलाव आ सकता है। लेकिन फिलहाल सबसे यथार्थवादी रास्ता यही है कि ईरान को धमकाते हुए युद्ध को अंत की तरफ पहुंचाया जाए।
पश्चिम एशिया संघर्ष
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
ईरान युद्ध के संदर्भ में यदि आधुनिक युद्ध इतिहास का सबसे मशहूर सवाल पूछा जाए कि इस युद्ध का अंत कैसे होगा, तो मोटे तौर पर चार संभावित परिदृश्य हैं। सत्ता परिवर्तन सबसे आशावादी संभावना है। कुछ लोगों का मानना है कि फिर से वैसे ही बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों का दौर शुरू होगा-जिन्हें जनवरी में ईरानी सत्ता ने बेरहमी से कुचल दिया था-लाखों ईरानी दर्जनों शहरों में मार्च करेंगे, जिनमें पुलिस अधिकारी, सैनिक और नियमित सेना के कमांडर भी शामिल होंगे; अमेरिकी और इस्राइली हवाई समर्थन से उत्साहित वे अपने शासकों के कमजोर पड़ चुके दमनकारी तंत्र को उखाड़ फेंकने के लिए उठ खड़े होंगे। किसी को भी इस स्थिति को कम करके नहीं आंकना चाहिए-खास तौर पर तब, जब ईरान को सैन्य और राजनीतिक, दोनों ही मोर्चों पर लगातार झटके लग रहे हों, और शायद उसे अपने नेतृत्व के और भी अहम पदों पर बैठे लोगों को खोना पड़े। पर किसी को भी इस बात पर पूरी तरह निर्भर भी नहीं रहना चाहिए-कम से कम, निकट भविष्य में तो बिल्कुल भी नहीं।
भले ही ईरानी शासन अपने हवाई क्षेत्र की रक्षा करने में कितना भी अक्षम क्यों न हो, पर अपने ही लोगों को मौत के घाट उतारने में यह अब भी सक्षम है। सत्ता पर काबिज रहने के लिए इसके पास हर मुमकिन वजह मौजूद है। शासन में सुधार-यानी, एक ऐसा शासन, जो सत्ता में तो बना रहे, लेकिन अमेरिका और इस्राइल के निर्देशों का पालन करे-यह एक और आशावादी परिदृश्य है। इसकी संभावना कम ही है कि नए सर्वोच्च नेता, मोजतबा खामनेई, ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को छोड़ने और हिजबुल्ला जैसे क्षेत्रीय प्रॉक्सी को समर्थन देना बंद करने पर सहमत होंगे। पर नए खामनेई का शासन बहुत छोटा हो सकता है। और जो कोई भी इसके बाद शासन की बागडोर संभालेगा, उसे सत्ता की कमजोरी और अलगाव का सामना करना पड़ेगा। यह अलगाव तब और भी ज्यादा गहरा हो जाएगा, जब अमेरिकी सेनाएं फारस की खाड़ी में ईरानी तट से 15 या 16 मील दूर स्थित खार्ग द्वीप पर कब्जा कर लेंगी-जो ईरान के लगभग 90 प्रतिशत तेल निर्यात के लिए टर्मिनल का काम करता है। इससे शासन के सबसे कट्टरपंथी तत्वों को भी यह समझने में मदद मिल सकती है कि क्या यूरेनियम संवर्धन, या लेबनान में हिजबुल्ला को और अधिक गोला-बारूद भेजना (जिसे इस्राइल नष्ट कर देगा) वास्तव में फायदेमंद है। लेकिन शायद ईरानी शासन झुकने से इन्कार कर दे और युद्ध अगले दो या तीन हफ्तों तक जारी रहे, जिसके बाद किसी तरह की युद्धविराम की घोषणा हो-संभवतः 31 मार्च को बीजिंग में राष्ट्रपति ट्रंप की प्रस्तावित यात्रा से पहले। ऐसे में, सभी पक्ष अपनी-अपनी जीत की घोषणा करेंगे, पर उनमें से कोई भी इस पर पूरी तरह यकीन नहीं करेगा।
ट्रंप को ईरान का 'बेशर्त समर्पण' जैसी कोई चीज तो हासिल नहीं ही होगी, शासन के अगले नेता को चुनने में उनकी कोई भूमिका दूर की कौड़ी है। इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू मुल्लाओं को सत्ता से हटाने के अपने दशकों पुराने सपने को साकार करने में नाकाम रहेंगे। और ईरान के नेता डींग हांकेंगे कि जिस 'प्रतिरोध' का वे कथित तौर पर प्रतिनिधित्व करते हैं, वह 'महान शैतान' और 'छोटे शैतान'-दोनों के संयुक्त ताकत से भी अधिक शक्तिशाली साबित हुआ। हालांकि हकीकत सामने आ ही जाएगी। वे प्रतिबंध, जिन्होंने पहले ही ईरान को आर्थिक रूप से पंगु बना दिया है, हटाए नहीं जाएंगे।
यह कल्पना करना कठिन है कि अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान के शेष परमाणु स्थलों पर हमला किए जाने से पहले यह युद्ध समाप्त हो जाएगा। ईरान द्वारा बड़े आतंकवादी हमले करने, या होर्मुज जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंगें बिछाने का कोई भी प्रयास एक और युद्ध का कारण बनेगा। ईरानी नेताओं के खुद को अभेद्य समझने का दौर अब खत्म हो चुका है। यह बताता है कि ईरानी शासन केवल एक बेजान अवस्था में ही टिक पाएगा। नतीजतन, कुछ ही वर्षों में शासन में बदलाव आ सकता है-संभवतः नेतृत्व के भीतर आपसी कलह के कारण, या फिर किसी अन्य जन-विद्रोह के चलते। दोनों ही स्थितियों में, इस शासन के दिन अब गिने-चुने ही रह गए हैं। इसका एक बदसूरत पहलू भी है: शासन परिवर्तन नहीं, बल्कि राज्य का पतन। इसका जो सबसे चिंताजनक रूप सामने आ सकता है, वह सीरिया के 13 साल लंबे गृहयुद्ध जैसा होगा; जिसमें ईरान के कुछ इलाकों में तो मौजूदा शासन बचा रहेगा, लेकिन अन्य इलाकों में उसका पतन हो जाएगा, जिससे विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा मिलेगा और बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान होगा। इसके साथ-साथ पूरे पश्चिम एशिया से लेकर यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक शरणार्थियों की भीड़ उमड़ पड़ेगी। हैरानी नहीं है कि ट्रंप ने इराक में मौजूद कुर्दिश सेनाओं को ईरान में जाने से रोका। लेकिन अगर ईरान की कमजोर होती सरकार अपनी सीमा में अशांत कुर्दों का नरसंहार शुरू कर देती है, तो ये सेनाएं चुपचाप नहीं बैठेंगी।
कुछ ऐसी ही स्थिति दक्षिण-पूर्व में ईरान के बलूच अल्पसंख्यक और दक्षिण-पश्चिम में ईरानी अरबों के साथ भी हो सकती है। हो सकता है कि इस्राइलियों को यह बुरा न लगे, इस सोच के साथ कि एक टूटा हुआ ईरान किसी और की समस्या है। पर अमेरिका और उसके अरब सहयोगियों के लिए ईरान में लंबे समय तक चलने वाली आपसी कलह से भले ही परमाणु खतरे का अंत हो जाए, लेकिन इससे पश्चिम एशिया के संकट से कोई राहत नहीं मिलेगी। तो फिर, ट्रंप प्रशासन को क्या करना चाहिए? मेरा सुझाव है: खार्ग द्वीप पर कब्जा कर लें।
ईरान के बाकी बचे बंदरगाहों में बारूदी सुरंगें बिछा दें या उनकी घेराबंदी कर दें। अगले एक-दो हफ्तों में ईरान की जितनी हो सके, उतनी सैन्य क्षमता नष्ट कर दें, जिसमें 'मिडनाइट हैमर' ऑपरेशन का दूसरा चरण भी शामिल है, ताकि ईरान की बची-खुची परमाणु क्षमता और तकनीकी जानकारी को पूरी तरह खत्म किया जा सके। और ईरानी शासन को धमकी दें कि अगर वह अपने ही नागरिकों का नरसंहार करता है, विदेशों में आतंकी हमले करता है, या फिर से परमाणु कार्यक्रम शुरू करता है, तो उस पर और बमबारी की जाएगी। यह जीत का सबसे यथार्थवादी रास्ता है, जिसमें जान-माल, जोखिम और पैसे का नुकसान सबसे कम होने की संभावना है। तमाम खतरों के बावजूद, यह ईरान के लोगों को अपनी आजादी पाने का सबसे बेहतरीन मौका देता है। एक महीने की इस जंग के लिए यह नतीजा बुरा नहीं है-जिसके आलोचकों ने चेतावनी दी थी कि यह 'एक और इराक' साबित होगा। ©The New York Times 2026
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भले ही ईरानी शासन अपने हवाई क्षेत्र की रक्षा करने में कितना भी अक्षम क्यों न हो, पर अपने ही लोगों को मौत के घाट उतारने में यह अब भी सक्षम है। सत्ता पर काबिज रहने के लिए इसके पास हर मुमकिन वजह मौजूद है। शासन में सुधार-यानी, एक ऐसा शासन, जो सत्ता में तो बना रहे, लेकिन अमेरिका और इस्राइल के निर्देशों का पालन करे-यह एक और आशावादी परिदृश्य है। इसकी संभावना कम ही है कि नए सर्वोच्च नेता, मोजतबा खामनेई, ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को छोड़ने और हिजबुल्ला जैसे क्षेत्रीय प्रॉक्सी को समर्थन देना बंद करने पर सहमत होंगे। पर नए खामनेई का शासन बहुत छोटा हो सकता है। और जो कोई भी इसके बाद शासन की बागडोर संभालेगा, उसे सत्ता की कमजोरी और अलगाव का सामना करना पड़ेगा। यह अलगाव तब और भी ज्यादा गहरा हो जाएगा, जब अमेरिकी सेनाएं फारस की खाड़ी में ईरानी तट से 15 या 16 मील दूर स्थित खार्ग द्वीप पर कब्जा कर लेंगी-जो ईरान के लगभग 90 प्रतिशत तेल निर्यात के लिए टर्मिनल का काम करता है। इससे शासन के सबसे कट्टरपंथी तत्वों को भी यह समझने में मदद मिल सकती है कि क्या यूरेनियम संवर्धन, या लेबनान में हिजबुल्ला को और अधिक गोला-बारूद भेजना (जिसे इस्राइल नष्ट कर देगा) वास्तव में फायदेमंद है। लेकिन शायद ईरानी शासन झुकने से इन्कार कर दे और युद्ध अगले दो या तीन हफ्तों तक जारी रहे, जिसके बाद किसी तरह की युद्धविराम की घोषणा हो-संभवतः 31 मार्च को बीजिंग में राष्ट्रपति ट्रंप की प्रस्तावित यात्रा से पहले। ऐसे में, सभी पक्ष अपनी-अपनी जीत की घोषणा करेंगे, पर उनमें से कोई भी इस पर पूरी तरह यकीन नहीं करेगा।
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ट्रंप को ईरान का 'बेशर्त समर्पण' जैसी कोई चीज तो हासिल नहीं ही होगी, शासन के अगले नेता को चुनने में उनकी कोई भूमिका दूर की कौड़ी है। इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू मुल्लाओं को सत्ता से हटाने के अपने दशकों पुराने सपने को साकार करने में नाकाम रहेंगे। और ईरान के नेता डींग हांकेंगे कि जिस 'प्रतिरोध' का वे कथित तौर पर प्रतिनिधित्व करते हैं, वह 'महान शैतान' और 'छोटे शैतान'-दोनों के संयुक्त ताकत से भी अधिक शक्तिशाली साबित हुआ। हालांकि हकीकत सामने आ ही जाएगी। वे प्रतिबंध, जिन्होंने पहले ही ईरान को आर्थिक रूप से पंगु बना दिया है, हटाए नहीं जाएंगे।
यह कल्पना करना कठिन है कि अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान के शेष परमाणु स्थलों पर हमला किए जाने से पहले यह युद्ध समाप्त हो जाएगा। ईरान द्वारा बड़े आतंकवादी हमले करने, या होर्मुज जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंगें बिछाने का कोई भी प्रयास एक और युद्ध का कारण बनेगा। ईरानी नेताओं के खुद को अभेद्य समझने का दौर अब खत्म हो चुका है। यह बताता है कि ईरानी शासन केवल एक बेजान अवस्था में ही टिक पाएगा। नतीजतन, कुछ ही वर्षों में शासन में बदलाव आ सकता है-संभवतः नेतृत्व के भीतर आपसी कलह के कारण, या फिर किसी अन्य जन-विद्रोह के चलते। दोनों ही स्थितियों में, इस शासन के दिन अब गिने-चुने ही रह गए हैं। इसका एक बदसूरत पहलू भी है: शासन परिवर्तन नहीं, बल्कि राज्य का पतन। इसका जो सबसे चिंताजनक रूप सामने आ सकता है, वह सीरिया के 13 साल लंबे गृहयुद्ध जैसा होगा; जिसमें ईरान के कुछ इलाकों में तो मौजूदा शासन बचा रहेगा, लेकिन अन्य इलाकों में उसका पतन हो जाएगा, जिससे विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा मिलेगा और बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान होगा। इसके साथ-साथ पूरे पश्चिम एशिया से लेकर यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक शरणार्थियों की भीड़ उमड़ पड़ेगी। हैरानी नहीं है कि ट्रंप ने इराक में मौजूद कुर्दिश सेनाओं को ईरान में जाने से रोका। लेकिन अगर ईरान की कमजोर होती सरकार अपनी सीमा में अशांत कुर्दों का नरसंहार शुरू कर देती है, तो ये सेनाएं चुपचाप नहीं बैठेंगी।
कुछ ऐसी ही स्थिति दक्षिण-पूर्व में ईरान के बलूच अल्पसंख्यक और दक्षिण-पश्चिम में ईरानी अरबों के साथ भी हो सकती है। हो सकता है कि इस्राइलियों को यह बुरा न लगे, इस सोच के साथ कि एक टूटा हुआ ईरान किसी और की समस्या है। पर अमेरिका और उसके अरब सहयोगियों के लिए ईरान में लंबे समय तक चलने वाली आपसी कलह से भले ही परमाणु खतरे का अंत हो जाए, लेकिन इससे पश्चिम एशिया के संकट से कोई राहत नहीं मिलेगी। तो फिर, ट्रंप प्रशासन को क्या करना चाहिए? मेरा सुझाव है: खार्ग द्वीप पर कब्जा कर लें।
ईरान के बाकी बचे बंदरगाहों में बारूदी सुरंगें बिछा दें या उनकी घेराबंदी कर दें। अगले एक-दो हफ्तों में ईरान की जितनी हो सके, उतनी सैन्य क्षमता नष्ट कर दें, जिसमें 'मिडनाइट हैमर' ऑपरेशन का दूसरा चरण भी शामिल है, ताकि ईरान की बची-खुची परमाणु क्षमता और तकनीकी जानकारी को पूरी तरह खत्म किया जा सके। और ईरानी शासन को धमकी दें कि अगर वह अपने ही नागरिकों का नरसंहार करता है, विदेशों में आतंकी हमले करता है, या फिर से परमाणु कार्यक्रम शुरू करता है, तो उस पर और बमबारी की जाएगी। यह जीत का सबसे यथार्थवादी रास्ता है, जिसमें जान-माल, जोखिम और पैसे का नुकसान सबसे कम होने की संभावना है। तमाम खतरों के बावजूद, यह ईरान के लोगों को अपनी आजादी पाने का सबसे बेहतरीन मौका देता है। एक महीने की इस जंग के लिए यह नतीजा बुरा नहीं है-जिसके आलोचकों ने चेतावनी दी थी कि यह 'एक और इराक' साबित होगा। ©The New York Times 2026