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मुद्दा: ताकि मनमर्जी से चिकित्सा पद्धति चुन सकें, सवाल है समान अवसरों का
डॉ. विवेक एस अग्रवाल
Published by: Pavan
Updated Wed, 15 Apr 2026 08:26 AM IST
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विस्तार
हाल ही में, ‘स्वास्थ्य के लिए एकजुट। विज्ञान के साथ खड़े रहें’, विषय के साथ पूरी दुनिया में विश्व स्वास्थ्य दिवस संबंधी आयोजनों का आह्वान किया गया। इस संबंध में कभी भी दो मत नहीं रहे कि स्वास्थ्य एकजुटता के बिना संभव नहीं है। यह बात दीगर है कि गत दो-तीन दशकों में स्वास्थ्य को नेपथ्य में धकेलते हुए चिकित्सा सेवाओं का वर्चस्व कायम हो गया। ऐसा नहीं है कि यह प्रभुत्व रातों-रात हुआ हो।आधुनिक या मॉडर्न मेडिसिन (एलोपैथी) के प्रायः एकाधिकार की छाया में समस्त पारंपरिक, देशज और अन्य चिकित्सकीय पद्धतियों का ह्रास होता चला गया। त्वरित उपचार की अपेक्षा में यह मरीजों की भी पहली पसंद बनी और अन्य चिकित्सकीय पद्धतियों को नकार दिया गया। होम्योपैथी की पृष्ठभूमि से उत्पन्न एलोपैथी ने कालांतर में अपनी जननी को काफी पीछे धकेल दिया। यही हाल भारत में आयुर्वेद समेत दुनिया के हर राष्ट्र की प्रचलित पारंपरिक पद्धति के साथ हुआ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, लगभग 170 देशों में पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा पद्धतियां आधी से ज्यादा लोगों के लिए इलाज का मुख्य साधन हैं। पर इनका इतना अधिक उपयोग होने के बावजूद, चिकित्सा शोध पर होने वाले कुल खर्च का एक प्रतिशत या उससे भी कम हिस्सा ही एलोपैथी के अलावा अन्य पद्धतियों पर खर्च किया जाता है। दुनिया के प्रमुख राष्ट्रों की चिकित्सकीय पद्धति का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि कई देशों में स्थानीय एवं पारंपरिक पद्धति से अब भी इलाज किया जाता है। ये पद्धतियां प्रमुखतया पंच तत्वों, जड़ी-बूटियों और पादप आधारित होती हैं, जिनमें रसायनों का नगण्य उपयोग किया जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत समेत कई राष्ट्रों में अब भी शहरी-ग्रामीण विभेद के अनुरूप ही आधुनिक एवं परंपरागत इलाज की पद्धतियां उपयोग में हैं। लेकिन बाजार और प्रचार के प्रभाव में, आम लोगों के मन में यह धारणा बनाई जा रही है कि पारंपरिक इलाज गैर-वैज्ञानिक, पुराने और धीरे असर करने वाले होते हैं, जिससे लोग उनसे दूर होते जा रहे हैं। एलोपैथी का बाजार कायम करने में फार्मा एवं जांच संबंधी मशीन उद्योग का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उद्योगों के समावेश से एलोपैथी की चिकित्सा का सेवा से वाणिज्यिक या औद्योगिक वर्ग में संक्रमण हो गया।
भारत में आयुष मंत्रालय का गठन कर परंपरागत चिकित्सा को पुनर्जीवित व प्रोत्साहित करने की दिशा में अहम कदम उठाए गए हैं। पेटेंट प्रणाली के दुरुपयोग को रोकने के लिए आयुष की विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के करीब सवा पांच लाख से अधिक फॉर्मूलेशन पंजीकृत किए गए हैं। इसका उद्देश्य इन्हें वैज्ञानिक आधार देना और लोगों के बीच इनकी स्वीकार्यता बढ़ाना है। अब जरूरत है कि इनके बारे में लोगों में जागरूकता केवल वेबसाइट तक सीमित न रहे, बल्कि जमीनी स्तर पर भी काम किया जाए। इससे लोग पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को लेकर हीन भावना महसूस करने के बजाय, उन पर गर्व महसूस करेंगे। यह भी जरूरी है कि विभिन्न विधाओं में प्रशिक्षित व्यक्ति अपनी विधा विशेष का ही अभ्यास करें। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि इस्तेमाल की जा रही एलोपैथी बेमानी या कमतर है। सुश्रुत काल में शल्य क्रिया का उल्लेख मिलता है। समय के साथ एलोपैथी ने वैज्ञानिक आधार पर इसे लगातार विकसित किया और आज यह लैप्रोस्कोपिक से लेकर रोबोटिक सर्जरी तक पहुंच गई है। वहीं पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां इस दिशा में उतनी आगे नहीं बढ़ सकीं और अपने ज्ञान को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर पाईं।
चिकित्सा की समस्त पद्धतियां प्रभावी होती हैं, पर उनकी व्यापकता हेतु वैज्ञानिक आधार एवं समुचित प्रचार प्रसार नितांत आवश्यक है। अब, जब डब्ल्यूएचओ ने स्वास्थ्य के लिए एकजुटता का आह्वान किया है, तब यह उपयुक्त होगा कि समस्त चिकित्सकीय पद्धतियों को गुणावगुण के आधार पर समान रूप से उपलब्ध करवाया जाए। भारत के परिप्रेक्ष्य में चीन, जापान, कोरिया आदि देशों के अनुसार प्रस्तावित आयुष्मान मंदिरों में तय अवधारणा का पालन करते हुए आधुनिक एवं आयुष चिकित्सा को समान रूप से सुलभ करवाया जाना चाहिए। आमजन को एक ही छत के नीचे विकल्पों की उपलब्धता के चलते मनमर्जी से चिकित्सा पद्धति चुनने का अवसर मिलेगा। इस अधोसंरचना के विस्तार से उत्पन्न अहम प्रश्नों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय मानव संसाधन का रहेगा। आधुनिक चिकित्सा हेतु देश-विदेश में सरकारी व निजी शिक्षण संस्थाओं की प्रचुरता ने पर्याप्त मानव संसाधन की व्यवस्था कर दी है, किंतु अन्य पद्धतियों में व्याप्त विभिन्न अनिश्चितताओं के कारण समुचित विकास नहीं हो पाया। आमजन ने भी पारंपरिक पद्धतियों के स्थान पर आधुनिक चिकित्सा को अपना लिया। संतुलन एवं परंपरागत चिकित्सा प्रोत्साहन हेतु चीन, जापान, कोरिया, रूस, ऑस्ट्रेलिया जैसे राष्ट्रों से सबक लेते हुए पहुंच को बढ़ाने की भी आवश्यकता है, तब ही स्वास्थ्य के लिए एकजुट प्रयास होंगे।

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