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अतुल सुभाष मामले के सबक: इसे स्त्री बनाम पुरुष की लड़ाई न बनाएं... मानसिक स्वास्थ्य का गंभीरता से उपचार जरूरी

Thu, 19 Dec 2024 03:26 AM IST
Advaita Kala अद्वैता काला
Updated Thu, 19 Dec 2024 03:26 AM IST
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सार
यह स्त्री बनाम पुरुष का मुद्दा नहीं है, जैसा कि बनाया जा रहा है। अतुल सुभाष ने किसी और की नहीं, बल्कि विरोध स्वरूप अपनी ही जान ले ली। हमें उनके संदेश का जवाब विभाजित होकर नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण करके देना चाहिए कि हम ऐसी घटनाओं को कैसे रोक सकते हैं।
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Lessons from Atul Subhash case it is not men women fight Serious treatment of mental health is necessary
स्त्री बनाम पुरुष की लड़ाई (प्रतीकात्मक) - फोटो : फ्री पिक

विस्तार

आत्महत्या की वजह से अतुल सुभाष की त्रासद मौत कानूनी व्यवस्था और विवादास्पद तलाक के मामलों से जूझ रहे पुरुषों के अनकहे संकट को उजागर करती है। कुछ वर्ष पहले जब मी टू आंदोलन जोरों पर था, तो कई पुरुष अपराधियों के अपराध उजागर हुए थे। हालांकि तब व्यक्तिगत प्रतिशोध के मामले भी सामने आए और झूठे आरोप भी लगाए गए थे। उस समय किसी भी व्यक्ति का नाम लेकर उत्पीड़न का आरोप लगाना सरल था, जिसके कारण कई लोगों ने अपनी नौकरी, प्रतिष्ठा और परिवार खो दिया। इन मामलों में से कुछ आरोप झूठे साबित हुए, लेकिन इससे आंदोलन की ताकत कम नहीं हुई, क्योंकि अपराधियों का सार्वजनिक रूप से पर्दाफाश होना भी जरूरी था।



व्यापक हित में लोग, उन्हें नजर अंदाज करने को तैयार थे, जिन्होंने अपने निजी प्रतिशोध के लिए मी टू आंदोलन का दुरुपयोग किया। हालांकि इसने बहुत से लोगों, यहां तक कि समर्थकों को भी असहज करने वाली आशंका में डाल दिया। पिछले वर्ष मैंने अपने इसी कॉलम में एक ऐसी मां के बारे में लिखा था, जिसने गोवा में अपने बेटे की हत्या कर दी थी, ताकि वह अलग हुए पति को ‘सबक सिखा’ सके, जिसके साथ वह क्रूर तलाक से गुजर रही थी। वह महिला शिक्षित, सशक्त और कामकाजी स्त्री थी। उस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया और वह मां भारत की सबसे बदनाम स्त्री बन गई, क्योंकि व्याकुल पिता और उसके पति ने बच्चे को मुखाग्नि दी।


ज्यादातर लोगों के लिए तलाक एक दर्दनाक और अप्रिय अनुभव होता है, यह रिश्ता वित्तीय समझौते के जरिये दोषारोपण और शिकायतों के छोटे-छोटे पहलुओं में बिखर जाता है। दो आत्माओं के खूबसूरत मिलन का भद्दा अंत। तलाक और अन्य घरेलू मामले में महिलाओं को संदेह का लाभ मिलता है। हालांकि कई ऐसे उदाहरण हैं, जब बच्चे की परवरिश की जिम्मेदारी और वित्तीय लाभ लेने के लिए पुरुष साथी के खिलाफ पोक्सो सहित कई तरह के आरोप लगाए जाते हैं। पॉक्सो के तहत लगाया गया आरोप विनाशकारी होता है और पूरे समाज को उस एक व्यक्ति के खिलाफ खड़ा कर देता है, साथ ही यह उन सभी लोगों के लिए शर्म का विषय होता है, जो उसका समर्थन करने की कोशिश करते हैं। हालांकि ये सभी आरोप रिश्तों की जटिलताओं के दायरे में हैं, लेकिन यह भी सामने आया है कि इन सब धाराओं का चिंताजनक रूप से दुरुपयोग हो रहा है, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा है। यह हम सभी के लिए चिंता का कारण होना चाहिए, क्योंकि ये कानून हमारे देश में महिलाओं द्वारा झेले जा रहे व्यवस्थागत उत्पीड़न के संदर्भ में आवश्यक हैं और अच्छे इरादे से बनाए गए, जिनका उद्देश्य उन महिलाओं की रक्षा करना था, जिन्हें इनकी जरूरत थी। लेकिन आज हम सभी चीजों की तरह चरमपंथी रुख अपना रहे हैं- यानी या तो आप पुरुष समर्थक हैं या महिला समर्थक और यदि आप किसी एक खेमे में हैं, तो स्वतः आप ‘दूसरे’ के खिलाफ हैं।

हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि लिंग के आधार पर भेदभाव उतना नहीं है, जितना दिखाया जा रहा है। जब भी अन्याय के चरम मामले सामने आए हैं, पुरुषों ने महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा के लिए उनके साथ कदम बढ़ाया है। उदाहरण के लिए निर्भया मामले को देखा जा सकता है, जिसमें हमारे देश के पुरुषों ने कंधे से कंधा मिलाकर महिलाओं का साथ दिया। इसे नजर अंदाज करना पूरी तरह से अनुचित होगा। हालांकि तथाकथित ‘नारीवाद’ एक ऐसे समय में लिंग-भेद की लड़ाई को बढ़ावा दे रहा है, जब लोगों को लैंगिक भेदभाव से परे एकसाथ आगे आना चाहिए।

एक युवा व्यक्ति की त्रासद आत्महत्या हमारे लिए आत्मनिरीक्षण का अवसर होना चाहिए। किसी व्यक्ति द्वारा सुनियोजित तरीके से इतना बड़ा कदम उठाना, उसकी असहायता की गहराई को दर्शाता है, जिसने उसके लिए आत्महत्या को तर्कसंगत बना दिया।

अतुल सुभाष ने बंदूक उठाकर उन पर हमला नहीं किया, जिन्होंने उसके साथ गलत किया था, बल्कि विरोध स्वरूप उसने फंदे पर लटकर अपनी जान दे दी। हमें उनके संदेश का जवाब विभाजित होकर नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण करके देना चाहिए कि हम ऐसी घटनाओं को कैसे रोक सकते हैं। ये दोनों ही मामले हमारे ध्यान देने और आत्मनिरीक्षण की मांग करते हैं। समानता की लड़ाई का मतलब दूसरों के साथ अन्याय करना नहीं है। महिलाओं की रक्षा करने वाले कानूनों का इस्तेमाल पुरुषों के साथ दुर्व्यवहार और उत्पीड़न के लिए नहीं किया जा सकता। त्रासदी यह है कि जब भी बेईमान वकीलों की सलाह पर इन कानूनों का इस्तेमाल महिलाओं द्वारा अन्यायपूर्ण तरीके से किया जाता है, तो उन पीड़ित महिलाओं पर विश्वास नहीं किया जाता है, जिन्हें इन कानूनों की सुरक्षा की सख्त जरूरत है। अब समय आ गया है कि इन कानूनों में लैंगिक तटस्थता का पहलू शामिल किया जाए, जिनका दुरुपयोग किया जा रहा है। यह एक ऐसा प्रस्ताव है, जिसका मूल्यांकन कानूनी विशेषज्ञों द्वारा सबसे बेहतर ढंग से किया जा सकता है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर कानूनों का दुरुपयोग किया जाता है, खासकर कठोर धारा 498ए का, जो विवाद का मुख्य कारण है, तो आरोप लगाने वाले को इसकी कीमत चुकानी होगी।

हमारे देश में तलाक, शादी की तरह ही सिर्फ दो लोगों के बीच नहीं, बल्कि दो परिवारों के बीच होता है। अतुल सुभाष के पिता कहते हैं कि अपने बेटे को खोने के बावजूद वे अब भी उन मामलों में उलझे हुए हैं। कानूनी प्रक्रिया इतनी कठिन और घुमावदार थी कि अतुल सुभाष की सारी ऊर्जा खत्म हो गई थी, उसे कई बार अदालत में पेश होना पड़ा। जूम मीटिंग के जमाने में, इन बैठकों में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की क्या जरूरत थी? अतुल सुभाष कानूनी व्यवस्था से भी पीड़ित था। निचली अदालतों में भ्रष्टाचार एक और ऐसा क्षेत्र है, जिसकी निंदा की जानी चाहिए।

देश के विभिन्न कोनों में प्रतिदिन होने वाला उत्पीड़न वादी को हताश बना देता है, तथा उन्हें न्याय की आशा नहीं रहती। इसके अलावा, मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। हमारे समाज में पुरुषों को अपनी भावनाओं को परे रखकर हर तरह की परिस्थितियों का सामना करना सिखाया जाता है, बिना अपने भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य की जांच किए। मजबूत दिखने का दबाव और कमजोर कर देता है। मानसिक स्वास्थ्य की समस्या, चाहे पुरुषों में हो या महिलाओं में, उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए और उसका उपचार किया जाना चाहिए और कमजोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उसे आम स्वास्थ्य समस्या माना जाना चाहिए। हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने देश के पिताओं, भाइयों और पुत्रों को अधिक समझ प्रदान करें।

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