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चांद के पार चलो: आर्टेमिस-2 से अंतरिक्ष अन्वेषण का एक नया दौर शुरू हो चुका है

सर्गे श्मेमैन, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nitin Gautam Updated Sun, 19 Apr 2026 07:04 AM IST
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सार
आर्टेमिस-II की कामयाब उड़ान रोमांचक अनुभव रही है-उपकरणों से भरा तंग केबिन; दूर से दिखती छोटी, नीले-सफेद रंग की पृथ्वी की झलकियां; अंतरिक्ष यात्री क्रिस्टीना के हवा में लहराते बाल; और यह एहसास कि अंतरिक्ष अन्वेषण का एक नया दौर शुरू हो चुका है। ये सभी मिलकर मन में विस्मय और उल्लास की भावना जगाते हैं।
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nasa Moon mission A New Era of Space Exploration Has Begun with artemis two
आर्टेमिस-2 मिशन की टीम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

किसी भी बड़े रोमांच की तरह, खासकर ऐसे रोमांच की, जिसे हम पल-पल, हर कदम पर देख सकते हैं, आर्टेमिस-II की उड़ान एक बेहद रोमांचक अनुभव रही है। होज, उपकरणों और बोल्ट से भरा वह तंग केबिन; दूर से दिखती छोटी, नीले-सफेद रंग की पृथ्वी की झलकियां; अंतरिक्ष यात्री क्रिस्टीना कोच के हवा में लहराते बाल; और यह एहसास कि विशाल तथा जोखिम भरे अंतरिक्ष अन्वेषण का एक नया दौर शुरू हो चुका है, ये सभी मिलकर हमारे मन में विस्मय और उल्लास की ऐसी भावना जगाते हैं, जिसकी हमें इस समय बेहद जरूरत है। पर मैं कितनी भी कोशिश कर लूं, उस आवाज को नजरअंदाज नहीं कर पाता, जो लगातार मेरे कानों में फुसफुसाती रहती है, ‘लेकिन हां, हम पहले भी वहां जा चुके हैं।’ मैं उस पीढ़ी का बुजुर्ग हूं, जिसके लिए जुलाई 1969 में चांद पर पहली बार कदम रखना एक ऐसा जीवन बदल देने वाला अनुभव था, जिसका महत्व आज से कहीं ज्यादा गहरा था।


अपोलो 11 से पहले, किसी खगोलीय पिंड पर इन्सान के कदम रखने की बात तो बस जूल्स वर्न के उपन्यासों या मार्वल के कार्टूनों में ही सुनने को मिलती थी। फ्लाइ मी टू द मून फ्रैंक सिनात्रा का एक प्रेम गीत था, और उस समय तक होम कंप्यूटर आए भी नहीं थे। 57 साल और कई पीढ़ियों की तकनीकी प्रगति के बाद, उस असाधारण घटना को दोहराना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। ओक्लाहोमा की एक गर्म और सूखी रात में, जब मैं दागों से भरे चांद को निहार रहा था, तब मुझे आज भी वही हैरानी याद आती है-मैं सोच रहा था कि सच में वहां ऊपर दो लोग मौजूद थे। मशहूर न्यूज एंकर वॉल्टर क्रोनकाइट ने याद करते हुए बताया कि वह इसे बयां करने के लिए शब्द ही नहीं ढूंढ पा रहे थे। आज भी इसके लिए सही शब्द ढूंढना मुश्किल है। उस समय का माहौल बिल्कुल ही अलग था। चांद तक पहुंचने के लिए जिस विस्तृत कंप्यूटिंग की जरूरत थी, वह लगभग किसी चमत्कार जैसी ही अद्भुत लगती थी। उस समय मुझे फोर्ट सिल में एक शुरुआती मिलिट्री कंप्यूटर पर ट्रेनिंग दी जा रही थी, जिसे ‘फील्ड आर्टिलरी डिजिटल ऑटोमैटिक कंप्यूटर’ या एफएडीएसी कहा जाता था। इसका वजन लगभग 200 पाउंड था और तोपखाने के निशाने तय करने के लिए इसे एक अलग से जनरेटर की जरूरत पड़ती थी। आज, शायद इसकी जगह एक आइपैड ले सकता है।


यह सच है कि लोगों को अंतरिक्ष में भेजना कोई नई बात नहीं थी। यूरी गागरिन अपोलो 11 से आठ साल पहले ही अंतरिक्ष में जा चुके थे। इसके बावजूद किसी ने नहीं सोचा था कि इन्सान सच में चांद पर खड़े दिखेंगे और उनके पीछे छोटी-सी गोल पृथ्वी संगमरमर जैसी नजर आएगी। चांद पर पहली बार उतरने की घटना पर द टाइम्स के लिए अपनी जबर्दस्त मुख्य रिपोर्ट में, ‘मैन वॉक ऑन द मून’ जैसी विशाल सुर्खियों के नीचे, विज्ञान लेखक जॉन नोबल विल्फोर्ड ने उस हैरानी और अविश्वास की भावना का वर्णन किया, जो कई लोगों ने महसूस की थी। उन्होंने कहा था, ‘पृथ्वी पर मौजूद लोगों को कीड़े जैसे दिखने वाले लूनर मॉड्यूल और उसके आसपास घूमते इन्सानों की ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविजन तस्वीरें इतनी साफ और स्पष्ट लगीं कि वे अवास्तविक-सी प्रतीत हुईं। वे उन्हें इन्सानों के बजाय, किसी खिलौने और खिलौने जैसी आकृतियों की तरह ज्यादा लगीं, जबकि वे अब तक की सबसे साहसी और दूरगामी मुहिम पर निकले हुए असली इन्सान थे।’ आजकल एक साजिश वाली बात भी फैल रही है कि नासा ने 1969 से 1972 के बीच अपोलो मिशन के तहत छह बार चांद पर इन्सानों को उतारने का जो दावा किया, उनमें से कुछ या शायद सभी लैंडिंग असली नहीं, नकली थीं।

मुझे पता है, यह थोड़ा अहंकारी और अन्यायपूर्ण है कि हम यह जताएं कि हमने तो यह सब पहले ही देख रखा है। असल में, आर्टेमिस-II मिशन अंतरिक्ष खोज के नए दौर की शुरुआत है, जिसमें आगे चलकर चांद पर इन्सानों का ठिकाना बनाना और मंगल तक जाना भी शामिल हो सकता है। पृथ्वी से अब तक की सबसे ज्यादा दूरी (2,52,756 मील) तक पहुंचकर आर्टेमिस ने अपोलो का एक रिकॉर्ड तो पहले ही तोड़ दिया है, जहां कोई इन्सान कभी गया ही नहीं, जबकि 1970 में अपोलो 13 ने 2,48,655 मील की दूरी तय की थी। लंबे समय बाद फिर से अंतरिक्ष की लंबी यात्राएं शुरू हो रही हैं। यह काफी अच्छी बात है। अब नई पीढ़ी भी इस अनुभव को महसूस कर सकेगी। वे पृथ्वी को अंतरिक्ष में एक खूबसूरत नखलिस्तान की तरह देख पाएंगे। जैसा कि अपोलो 8 के अंतरिक्ष यात्री और अपोलो 13 के कमांडर जिम लवेल ने कहा था। साथ ही, उन्हें दूर के ग्रहों को खोजने का रोमांच भी मिलेगा।

आर्टेमिस के चार अंतरिक्ष यात्रियों में से कोई भी (रीड वाइजमैन-50, विक्टर ग्लोवर-49, क्रिस्टीना कोच-47, और जेरेमी हैनसेन-50) उस समय जीवित नहीं थे, जब नील आर्मस्ट्रांग ने वह मशहूर वाक्य कहा था, ‘यह इन्सान के लिए एक छोटा-सा कदम है, पर मानवता के लिए एक बहुत बड़ी छलांग है।’ और न ही तब, जब यूजीन सेर्नन ने अपोलो कार्यक्रम के आखिरी मिशन (मिशन नंबर 17) को भविष्य के लिए एक संकल्प के साथ समाप्त किया था। उन्होंने कहा था, ‘अमेरिका की आज की चुनौती ने ही इन्सान के कल के भाग्य को गढ़ा है। हम चांद और टॉरस-लिट्रो को छोड़कर जा रहे हैं। हम वैसे ही जा रहे हैं, जैसे आए थे, और अगर ईश्वर ने चाहा, तो हम जरूर लौटेंगे, वह भी पूरी मानवता के लिए शांति और उम्मीद लेकर।’ अगस्त में अपनी मृत्यु से पहले रिकॉर्ड किए गए शब्दों में जिम लवेल ने कहा, ‘मेरे पुराने पड़ोस में आपका स्वागत है। यह एक ऐतिहासिक दिन है, और मुझे पता है कि आप व्यस्त होंगे। पर नजारे का आनंद लेना मत भूलना।’

उस अग्रणी दौर के अंतरिक्ष यात्रियों के लिए प्रभावशाली उद्घोषणाएं और हाजिरजवाबी एक अनिवार्य चलन था, और मौजूदा टीम इस परंपरा को पुनर्जीवित करने की पुरजोर कोशिश कर रही है। ओरियन अंतरिक्ष यान के चंद्रमा के पीछे से गुजरते हुए संचार-विहीन क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले, पायलट ग्लोवर ने कहा कि जैसे ही हम रेडियो संचार से बाहर जाने की तैयारी कर रहे हैं, हम अब भी पृथ्वी से आपके प्यार को महसूस करेंगे। हम चांद से पृथ्वी पर मौजूद आप सभी लोगों को अपना प्यार भेज रहे हैं। हम आपसे दूसरी तरफ मिलेंगे। क्रिस्टीना कोच ने नए युग की बात की, जिसमें लोग न केवल फिर से चंद्रमा पर कदम रखेंगे, बल्कि वहां रहेंगे भी। क्रिस्टीना ने कहा, ‘हालांकि अंततः, हम हमेशा पृथ्वी को ही चुनेंगे। हम हमेशा एक-दूसरे को ही चुनेंगे।’ फिर, मानो इस बात पर जोर देने के लिए कि अंतरिक्ष में जाना अब कोई बहुत ही अनोखा नहीं रह गया है, आर्टेमिस-II के अंतरिक्ष यात्रियों ने घर लौटते समय, इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) में पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे अपने साथियों के साथ एक दोस्ताना बातचीत की।

आईएसएस में 25 साल से भी ज्यादा समय से लोग रह रहे हैं, और हाल ही में एक रूसी सोयुज अंतरिक्ष यान के आने की बात पर किसी का ज्यादा ध्यान नहीं गया, लेकिन वह अपने साथ एक अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और दो रूसी कॉस्मोनॉट को लेकर आया, जिससे अब वहां कुल 10 लोग मौजूद हैं। वहां अंतरिक्ष में एक चीनी स्पेस स्टेशन भी चक्कर लगा रहा है, जिसमें कम से कम तीन क्रू सदस्य मौजूद हैं। क्या वे जल्द ही चांद पर एक-दूसरे से मिलने जाएंगे? या मंगल पर? क्या हमें यह सब अद्भुत लगेगा?
 
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