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अनलिमिटेड केयर की वह वसीयत: मूल्य सबसे अहम... अच्छाई-नैतिकता के साथ जीने वाले इंसान के लिए यह जीवन पर्यंत सबक
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रतन टाटा (फाइल)
- फोटो :
अमर उजाला / एजेंसी
विस्तार
जब भी कोई महान लीडर इस संसार को छोड़कर जाता है, तो उसकी विरासत की चर्चा जरूर होती है। और उन मूल्यों की भी, जिनकी बात होनी चाहिए। कोविड के बाद फिर से इस बनती-बिगड़ती दुनिया में कुछ केयर छूटती-सी नजर आ रही है। आखिर क्यों दुनिया का इतना समृद्ध और सफल आदमी अपने जीवन के मूल्यों की तरह अपनी वसीयत को लिखते हुए भी उन मूल्यों को याद कर सभी के बारे में सोचता रहा, जो उनसे किसी न किसी रूप में जुड़े हुए थे, कोई मनुष्य के रूप में, तो कोई ‘पेट’ टीटो बनकर। चाहे वह उनके भाई हों या बहन, वह बटलर हो या रसोइया या उम्र में बहुत ही छोटे उनके मित्र सरीखे असिस्टेंट हों या उनका सबसे प्रिय पेट, टीटो।रतन टाटा सभी के लिए मानो ‘हैप्पी न्यू ईयर’ कहते हुए धन से भरी वह वसीयत छोड़ गए, जिसमें वह धनी आदमी कुछ ज्यादा ही मनुष्य बना बैठा था। और वह भी ईमानदारी या यों कहें, केयर के संबंध के साथ। उनकी वह वसीयत कुछ ऐसा उपहार रही, जिसमें पैकेजिंग से ज्यादा उपहार की उपयोगिता पर ध्यान दिया गया। क्योंकि रतन जी को पता था कि गर देने का भाव है, तो पैकेजिंग से ज्यादा उस वस्तु की अहमियत होनी चाहिए, जो उस गिफ्ट के अंदर होगी।
‘वैल्यूज आर स्ट्रांगर दैन स्टील’ के स्लोगन की प्रतिध्वनि में रतन टाटा को अपने सभी शुभचिंतकों की दुनिया को वास्तविक रूप से बड़ा करने का भाव था, इतना बड़ा, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। इसलिए रतन टाटा नेटवर्किंग के जमाने में, रिचेस्ट मैन के नंबर वन बनने की दौड़ को छोड़ जा बैठे केयर की स्याही से संबंधों की वसीयत लिखने। और ऐसा लिखा कि उनकी मृत्यु के बाद अब यह वसीयत भी संदेश दे रही है कि धन की प्रकृति में अगर दूसरों की फिक्र आ जाए, तो जॉन रॉल्स के न्याय के अंतर सिद्धांत की उपयोगिता और भी बढ़ जाती है।
आखिरकार, संबंध का मतलब भी तो दूसरों से जुड़ना ही होता है और वह भी केयर के तारों के साथ। रतन जी यह बखूबी समझते रहे कि मानव सभ्यता एक रिश्ते की कहानी है। और इसलिए संबंध भी समाज में मानवीय जरूरत की तरह महत्वपूर्ण होते जाते हैं। और महत्वपूर्ण हो जाता है यह समझना कि हमारी जिंदगी में कोई न कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हम पर निर्भर होता है। यह जानना और समझना ही केयर की परिभाषा है और वह भाव भी।
जैसा कि मनोवैज्ञानिक कैरोल गिलिगन ने अपने प्रयोग से यह निष्कर्ष भी निकाला कि केयर से ही संबंधों का निर्माण होता है। लेकिन क्या यह इतना आसान होता है? वे लोग जो दूसरों के बारे में सोचते
व महसूस करते हैं और उनके लिए कुछ करना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं, क्या उनके जीवन में मानवीय भाव से जुड़ना एक आसान-सी दिनचर्या होती है? क्या वे लोग अपने जीवन को हमेशा आत्म निरीक्षण के भाव में रखते हैं? उस सुकरात के दर्शन के नजदीक, जहां अपरीक्षित जीवन एक निरर्थक जीवन-सा हो जाता है। स्पेनिश कवि पाब्लो नेरुदा ने सही ही कहा है कि जीवन के बुनियादी या सीधे सवाल सबसे कठिन होते हैं, जब ऐसे सवाल पलक झपकाते हैं, तो आत्म-विमर्श की प्रतिध्वनि सुनाई देती है और तब हमें ठहरकर सोचने, विचार करने और आश्चर्य करने का मौका मिलता है कि इतने वर्षों का जीवन क्या यों ही खर्च हो गया?
रतन टाटा अपनी केयर रूपी कलम लिए ठहरे और जब अपनी वसीयत लिखी, तो अपने प्रिय डॉग टीटो के लिए ‘अनलिमिटेड केयर’ का प्रावधान रखा। जब उनकी मृत्यु के बाद दस हजार करोड़ की वसीयत को पढ़ा गया, तो उसमें उनके भाई-बहन का तो जिक्र था ही, उनका पेट डॉग टीटो भी उपस्थित था। टीटो को भला क्या मालूम था कि रतन जी उसकी केयर के लिए बहुत चिंतित थे।
आखिरकार, ‘पैसा ये पैसा’ की ध्वनि लोगों को पैसे के वजन से इतना भारी कर देती है कि वे मरने के बाद भी जीने के भाव से पैसा सिर्फ अपने और उन अपनों के लिए संभालते हैं और उनको कभी नहीं गिनते, जो रक्त के संबंध में फिट नहीं बैठते। धन इकट्ठा और निवेश किया जाता है, और अनजानों के साथ बांटा नहीं जाता। पर रतन जी ने धन का पाठ्यक्रम ही बदल दिया और उस ‘अनलिमिटेड केयर’ के साजो-सामान और भाव को जीवन भर तो बांटा ही, अपनी वसीयत में भी उसका ख्याल रखा।
रतन जी कुछ भूलना नहीं चाहते थे। न देश को, न इनको, न उनको। तभी तो 2018 में जब तत्कालीन ब्रिटिश प्रिंस चार्ल्स ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड के लिए आमंत्रित किया, तो रतन टाटा अपने प्रिय पेट टीटो की तबीयत को लेकर परेशान थे और बिना किसी उलझन के इस फैसले पर पहुंचे कि प्रिंस चार्ल्स का निमंत्रण हो या बकिंघम पैलेस में पहुंचकर अवॉर्ड लेने का मौका, जीवन में सब कुछ छोड़ा जा सकता है, गर मन में केयर का वह भाव हो, जो इन्सान के वजूद, उसके किरदार और उस जुड़ाव को निश्चित करता है, जिससे किसी समाज और परिवार का ताना-बाना तय होता है। केयर उनके लिए सब कुछ रहा।
इसलिए उन्होंने टाटा का समाज के प्रति ट्रस्टी के भाव का बखूबी ख्याल रखा, दूसरी ओर वह अपने कुक राजन, बटलर सुबैया, एग्जीक्यूटिव असिस्टेंट शांतनु नायडू या टीटो के बहाने इस दुनिया से कहना चाहते थे कि ईमानदारी और देखभाल से बने संबंध सिर्फ रक्त के संबंध लिए ही नहीं होते, बल्कि उन तमाम संबंधों के लिए भी होते हैं, जिनमें वर्ग, जाति, धर्म, जानवर, मनुष्य के भेद नहीं होते। और तभी उन संबंधों को याद करती हुई और सभी भेद मिटाने वाली वह वसीयत तैयार होती है, जिसमें ‘अनलिमिटेड केयर’ का भाव होता है। अच्छा हो, अगर उस अनलिमिटेड केयर से सजी यह दुनिया बनी रहे, हर उस व्यक्ति के लिए, जो अच्छाई और नैतिकता के साथ जीवन जीना चाहता है।