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सवाल कई, जवाब नहीं: रुपये की गिरावट का बड़ा संदेश

shankar aiyyar शंकर अय्यर
Updated Thu, 11 Jun 2026 07:04 AM IST
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सार

हर सुबह किसी अनहोनी की आशंका को अपने साथ ला रही है। अंतहीन युद्ध हों, टैरिफ की पहेली हो, महंगाई का संकट हो, मुद्रा का नीचे जाना हो या फिर परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों का लीक होना, ये वे सवाल हैं, जो हवा में तैर रहे हैं, लेकिन अब तक इनका कोई जवाब नहीं मिल सका है।

rupee fall Many questions no answers message behind Economy challenges
रुपये की गिरावट चिंता की बात - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

हवा में कुछ अनहोनी होने का अजीब-सा डर है। ऐसी बातों की सूची लंबी होती जा रही है, जिनके बारे में हमें पता तो है, लेकिन पूरी जानकारी नहीं है। बिना किसी दिशा के आगे बढ़ने का यह एहसास एक गहरे संदेह की ओर इशारा करता है कि क्या भू-राजनीति में कुछ न करने पर कोई फायदा मिलता है? सोमवार की सुबह दुनिया के लिए सबसे भयावह डर को लेकर आई, क्योंकि भू-राजनीतिक तनाव और शेयर बाजार में मूल्य संकट एक साथ आ गए। ईरान ने इस्राइल पर मिसाइलों की बौछार कर दी और डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनियों के बावजूद इस्राइल ने जवाबी कार्रवाई की।


ट्रंप का नाजुक शांति समझौता टूटता हुआ दिख रहा है। इसी समय, कोरियाई स्टॉक इंडेक्स केओएसपीआई लोअर सर्किट पर पहुंच गया, जिससे वैल्यूएशन में भारी गिरावट का संकेत मिला। निक्केई 225 और चीन व दक्षिण-पूर्व एशिया के टेक इंडेक्स में भी गिरावट आई। भारत में निफ्टी 50 की शुरुआत निचले स्तर पर हुई, जिससे रुपये पर दबाव और बढ़ गया। भू-राजनीति और वित्तीय बाजार, दोनों ही 'सौदेबाजी की कला' में माहिर होने के ट्रंप के दावों को चुनौती दे रहे हैं। नाश्ते और लंच के बीच, वॉल स्ट्रीट पर दस खरब डॉलर से ज्यादा की वैल्यू खत्म हो गई। इस गिरावट की वजह थी यूएस फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने का डर। सिर्फ स्टॉक्स ही नहीं गिरे, बल्कि मेटल्स का पूरा ग्रुप (सोना, चांदी, तांबा, प्लेटिनम) भी स्टॉक्स के साथ नीचे आ गया।
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महंगाई का खतरा कोई नई बात नहीं थी। दुनिया भर में महंगाई पहले से ही बढ़ी हुई है और देशों की बैलेंस शीट में भी यह साफ दिख रही है। महंगाई, पश्चिम एशिया में ट्रंप की जंग की ही देन है। रविवार को इस जंग को शुरू हुए 100 दिन हो गए हैं, जबकि ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका ने पहले ही हफ्ते में ईरान को 'पूरी तरह खत्म' कर दिया था। दुनिया शब्दों और उनके असल मतलब के बीच उलझी हुई है—जैसे, गाजा, लेबनान और होर्मुज जलडमरूमध्य में जिन युद्ध-विरामों की बात हो रही है, क्या वे सचमुच युद्ध-विराम हैं? विचित्र तर्क देते हुए ट्रंप का कहना है कि दुनिया के उस हिस्से में 'युद्ध-विराम का मतलब है कि आप थोड़ी कम तीव्रता से गोलीबारी कर रहे हैं।' अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसी स्थिति में फंस गए हैं, जहां उनके पास युद्ध खत्म करने का कोई तरीका नहीं है। हफ्ते की शुरुआत शांति की अपील से होती है और अंत पूरी तरह से तबाही की आशंका पर होता है।
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इसी तरह टैरिफ युद्ध भी कभी खत्म नहीं होने वाला युद्ध है। कुख्यात 'लिबरेशन डे' को बीते 432 दिन हो चुके हैं, फिर भी चारों ओर अफरा-तफरी मची हुई है। इस बीच बहुत कुछ बदल चुका है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ को रद्द कर दिया और रिफंड का आदेश दिया। लेकिन ट्रंप बिना डरे, पुराने कानूनों को लागू करने के नए तरीके अपना रहे हैं।

हाल ही में भारत ने दुनिया को बताया कि पिछले साल उसकी जीडीपी में 7.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। लेकिन इससे ज्यादा खुशी नहीं मनाई गई। उसी सुबह, रिजर्व बैंक ने आने वाले साल के लिए ग्रोथ का अनुमान घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया और महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया। हालात ऐसे थे कि देश बीते हुए दौर और भविष्य के अनिश्चित बादलों के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहा था। इस दशक की शुरुआत में भारत पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था, फिर चौथे स्थान पर पहुंचा और अब छठे स्थान पर खिसक गया है। इसमें युद्ध का असर और अधूरे एजेंडे की अनिश्चितता, दोनों शामिल है।

रैंक और रुतबे में गिरावट की वजह रुपये की गिरती कीमत को माना जा रहा है। एक साल में रुपया प्रति अमेरिकी डॉलर 86 से गिरकर 95 पर आ गया है। रुपया इस स्थिति का खलनायक भी है और शिकार भी। विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली से रुपया गिरता है और रुपये के गिरने से विदेशी संस्थागत निवेशक और बिकवाली करते हैं। रिजर्व बैंक ने छह उपाय बताए हैं—इनमें दो बड़े उपाय हैं-विदेशी निवेशकों के लिए लंबे समय वाले बॉन्ड खोलना और डॉलर जमा लाने वाले बैंकों के हेजिंग खर्च के भुगतान की सुविधा देना। क्या इसका फायदा होगा? इसके समर्थक कहते हैं कि सितंबर 2013 में ऐसा हुआ था। हालात अब बहुत अलग हैं। 2013 में भारत की पॉलिसी रेट 7.5 प्रतिशत थी और अमेरिकी फेड फंड्स रेट 0.08 प्रतिशत थी। दोनों के बीच का अंतर (असल में 7.5 प्रतिशत) और करेंसी रिस्क कवर वाकई बहुत ज्यादा था। साल 2025 में भारत की पॉलिसी रेट 5.25 प्रतिशत है और फेड फंड्स रेट 3.5 प्रतिशत से 3.75 प्रतिशत के बीच है। क्या यह दर जमाकर्ताओं को आकर्षित करने के लिए काफी है?

रुपये की गिरावट उन समस्याओं को दिखाती है, जिन पर ध्यान नहीं दिया गया है। इस बात पर काफी अफसोस जताया जाता है कि भारत के पास एआई की कोई कहानी नहीं है। यह सच है, लेकिन अफसोस की बात सिर्फ यही नहीं है। भारत का प्राइवेट सेक्टर लगभग 15 लाख करोड़ रुपये नकद लेकर बैठा है और निवेश नहीं कर रहा है; रिसर्च और डेवलपमेंट पर खर्च के मामले में देश का रिकॉर्ड बहुत खराब है। अगर एक लाख करोड़ रुपये का 'रिसर्च, डेवलपमेंट और इनोवेशन फंड' जारी किया जाए, तो इससे मदद मिल सकती है। अगर एक लाख करोड़ रुपये के 'अर्बन चैलेंज फंड' के तहत पैसे देने की रफ्तार बढ़ाई जाए, तो इससे स्मार्ट सिटी को बढ़ावा मिल सकता है। फरवरी 2025 में दो कमेटियों को नियमों और मंजूरी से जुड़ी उलझनों को सुलझाने का काम सौंपा गया था। उन्होंने क्या सुझाव दिए हैं? क्या सोलर प्रोजेक्ट के लिए 116 से कम मंजूरी और परमिट की जरूरत होगी? क्या होटल या अस्पताल बनाना आसान है?

आखिरकार, युवाओं से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के तरीके (जैसे कि पेपर लीक का मामला) से पता चलता है कि चीजें बगैर किसी दिशा के चल रही हैं। दिसंबर 2025 में, संसद की एक स्थायी समिति ने साफ तौर पर कहा कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। 2026 में एनटीए ने उन्हें सही साबित कर दिया! शिक्षा मंत्रालय अरबों डॉलर की कंपनियों को चलाने वाले टेक एक्सपर्ट्स से सिस्टम डिजाइन करने के लिए संपर्क क्यों नहीं करेगा? भारत की अर्थव्यवस्था कई अनसुलझे सवालों से घिरी हुई है। मार्गरेट हेफरनन ने मशहूर बात कही थी, 'खामोशी सुस्ती की भाषा है।' भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में, मिलीभगत की राजनीति इस सुस्ती को बढ़ावा देती है।            
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