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तलाक के कगार पर: दरकते नजर आ रहे हैं अमेरिका और यूरोप के बीच दशकों पुराने रिश्ते

Wed, 06 May 2026 07:26 AM IST
Devesh Tripathi रहीस सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
रहीस सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार Published by: Devesh Tripathi Updated Wed, 06 May 2026 07:26 AM IST
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सार
ट्रंप का नाटो को ‘कागजी शेर’ कहना और यूरोपीय नेताओं की ईरान युद्ध पर असहमति के चलते अमेरिका व यूरोप के बीच दशकों पुराने रिश्ते अब दरकते नजर आ रहे हैं। देखने वाली बात होगी कि यदि यह दोस्ती टूटती है, तो दोनों में से किसका नुकसान अधिक होगा?
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अमेरिका और नाटो के बिगड़ते रिश्ते - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

बीते कुछ समय से अमेरिका व यूरोप के बीच घट रही घटनाओं तथा इस माहौल में निर्मित वैचारिकी में निहित असहमतियां अब टकराव तक पहुंचती हुई दिख रही हैं। पश्चिम के इस ‘लव और हेट’ के बीच एक प्रश्न उभरने लगा है कि क्या दोनों के बीच तलाक का वक्त नजदीक आ चुका है? एक सवाल और कि यदि ऐसा हुआ, तो सबसे ज्यादा नुकसान किसे उठाना पड़ेगा?


थोड़ा अतीत की ओर देखें, फिर वर्तमान में आएं तो पता चलेगा कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने यूरोप को अपना सैन्य अड्डा बनाना शुरू कर दिया था। इस दिशा में पहला कदम था-1948 में अमेरिकी वायुसेना का लाकेनहीथ (ब्रिटेन) पहुंचना और दूसरा था 1950 के दशक के आरंभ में जर्मनी के रामस्टीन एयर बेस का निर्माण। इसके बाद सिलसिला बढ़ता गया और यूरोप अमेरिकी सामरिक रणनीतिक का महत्वपूर्ण घटक बन गया। इसी का परिणाम है कि आज यूरोप में 40 से अधिक अमेरिकी सैन्य बेस हैं, जहां लगभग 85,000 सैनिक तैनात हैं। यहां एक बात समझने वाली है कि जब अमेरिकी नेतृत्व में पूंजीवादी शक्तियां सोवियत संघ के विरुद्ध शीतयुद्ध से गुजर रही थीं, तब नाटो के तहत इस तरह की सैन्य तैयारियां तर्कसंगत हो सकती थीं और अपेक्षित भी, पर 1991 में सोवियत संघ के बिखरते ही पूर्वी (साम्यवादी) संगठन, यानी वारसा पैक्ट खत्म हो गया, फिर भी नाटो को बनाए रखा गया, क्यों?


जब फ्रांसिस फुकुयामा से द एंड ऑफ हिस्ट्री एंड द लास्ट मैन  नाम की पुस्तक लिखवाकर ‘इतिहास के अंत’ का जोर-शोर से प्रचार कर दिया गया, तो डर किस बात का था, जिस कारण नाटो आवश्यक बना रहा? क्या नाटो वास्तव में उनकी रक्षा के लिए अस्तित्व में रहा या फिर वैश्वीकरण की आड़ में नवउपनिवेशवाद को स्थापित करने का एक माध्यम? अब राष्ट्रपति ट्रंप इसे ‘कागजी शेर’ बता रहे हैं, क्यों? इसलिए कि यह शेर अब बूढ़ा हो गया है या फिर यह शेर अब अपने सनकी मास्टर के अनुसार हमला नहीं कर रहा है? यहां ध्यान देना जरूरी है कि जब अर्थव्यवस्थाएं युद्धजनित हो जाएं और युद्ध ही उन्हें निर्देशित करने लगें, तो यूरोप के देश पहले अपने लोगों की जिंदगियों की चिंता करें अथवा बूढ़े शेर के भोजन की? ट्रंप को यह समझ में नहीं आ रहा और उनका ‘मागा’ (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) का सपना उन्हें चैन से सोने नहीं दे रहा। ईरान युद्ध ने इसे बेनकाब कर दिया और ट्रंप बे-आबरू होकर वहां से निकलना नहीं चाहते। चूंकि, अमेरिका के अंदर ट्रंप की लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है, इसलिए उनकी सनक का गुब्बारा कहीं तो फूटना चाहिए, जो शायद यूरोप पर फूटे और यही तलाक का कारण भी बने।  

अमेरिका व यूरोप ने जिन संबंधों की ठोस बुनियाद 1930 और 1940 के दशक में रखी थी, शीतयुद्ध के दौर में उसे मजबूती मिली तथा उसके खत्म होने के बाद भी, विशेषकर वार इंड्यूरिंग फ्रीडम के असफल होने से पहले तक। पर राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। सब कुछ अवसरों के अर्थशास्त्र (इकनॉमिक्स ऑफ अपार्चुनिटी) के समीकरणों पर निर्भर होता है। शायद यूरोप ट्रंप के इस अर्थशास्त्र पर खरा नहीं उतर पा रहा। ट्रंप अभी तक जिसे अपनी ही बिल्ली समझ रहे थे, वही अब उनके सामने म्याऊं बोले, यह कैसे हो सकता है। इसलिए, ट्रंप ने अपने यूरोपीय साझेदारों को ‘कायर’ करार दिया और नाटो को ‘कागजी शेर’। एक यूरोपीय अखबार तो यहां तक लिखता है कि ट्रंप प्रशासन इस पर भी विचार कर रहा है कि ईरान युद्ध के खत्म होने के बाद यूरोपीय सहयोगियों को दंडित किया जाए और स्पेन को नाटो से बाहर कर दिया जाए और फॉकलैंड द्वीपों पर ब्रिटिश संप्रभुता की मान्यता वापस ले ली जाए। पर ट्रंप प्रशासन भूल रहा है कि तनाव में केवल वही नहीं, यूरोप भी है।

वैसे, यूरोपीय नेता सार्वजनिक रूप से यह कहते हुए देखे गए हैं कि ईरान युद्ध उनकी सहमति के बिना और गलत ढंग शुरू किया गया है। और इसे अवैध भी माना। महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिकी कमांडर इन चीफ खुद की मसीहा जैसी तस्वीरें पोस्ट करते हुए पूरी सभ्यता को मिटाने की धमकी दे रहे हैं, जो अमेरिकी नेतृत्व में यूरोपीय भरोसे को और कम करता है या यूं कहें कि ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तर पर पहुंचा देता है। क्यों न हो? अमेरिका द्वारा यूरोपीय सहयोगियों पर टैरिफ लगाना और ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की धमकी देना, क्या वास्तव में अजीब संभावनाएं पैदा नहीं करता? क्या ट्रंप की सनक यूरोपीय सैनिकों को अमेरिकी सेनाओं के खिलाफ लड़ने के लिए नहीं उकसा रही। इसी वजह से स्पेन, इटली, फ्रांस और जर्मनी में अधिक लोग अमेरिका को ‘करीबी सहयोगी’ बजाय खतरा मानने लगे हैं। दरअसल, ट्रंप का ‘मागा’ एक यूटोपियाई परिकल्पना है, जिसकी पृष्ठभूमि में युद्ध एक हथियार की तरह है। ऐसी स्थिति में यूरोप, पश्चिम एशिया और अफ्रीका में वह शक्ति प्रदर्शन जारी रखना चाहेगा। इसलिए उसे यूरोप का सहयोग अपेक्षित रहेगा। अमेरिका वर्तमान युद्ध के दौरान राजनीतिक दिखावे के बावजूद यूरोपीय अड्डों का उपयोग भी कर रहा था। जिस दिन अमेरिका आश्वस्त हो जाएगा कि उसे अब इनकी जरूरत नहीं है, तो वह उन्हें बंद कर देगा। हाल के दशकों में अमेरिका के पश्चिम एशिया (और बाल्कन) में लगातार सैन्य हस्तक्षेपों को देखते हुए, यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि ईरान युद्ध उसकी सैन्य संलिप्तता का अंतिम उदाहरण है। फिर तो उसे यूरोप की जरूरत पड़ती रहेेगी।

वैसे अमेरिका को अलविदा कहना यूरोप के लिए भी जोखिम भरा होगा। कारण यह कि रूस अब भी यूक्रेन में युद्ध कर रहा है। अगर इसके अंतिम परिणाम रूस के पक्ष में रहे, तो संभव है कि वह नाटो क्षेत्र पर भी हमला करे। यूरोप की असल चिंता यह भी है कि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका नाटो के सामूहिक रक्षा संबंधी सिद्धांत का अनुपालन करेगा या नहीं। नाटो महासचिव मार्क रुटे भी चेतावनी दे रहे हैं कि यूरोप अमेरिकी सहायता के बिना रूस के खिलाफ अपनी रक्षा नहीं कर सकता। इसलिए वह चाहते हैं कि यूरोप ट्रंप को हर हाल में संतुष्ट रखे। यूरोप रक्षा की दृष्टि से कई मामलों में अमेरिका पर निर्भर है, इसलिए, अधिकांश यूरोपीय नेता ‘एक्चुअली लव’ जैसे सपने देखने में तो सावधानी बरत रहे हैं, लेकिन साथ ही ट्रंप को नाराज करने से भी बच रहे हैं।

कुल मिलाकर, अटलांटिक के दोनों पक्ष यह जान रहे हैं कि फिलहाल वे एक असंतुष्ट विवाह में बंधे हुए हैं, पर दोनों के बीच औपचारिक तलाक बेहद जोखिम युक्त कदम होगा। सच भी यही है।
edit@amarujala.com
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