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महिलाएं और राजनीति: सियासी खींचतान में अटका नारी शक्ति वंदन अधिनियम

अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nitin Gautam Updated Sat, 18 Apr 2026 07:11 AM IST
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सार
कुछ राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों की दृष्टि से देखें, तो विधेयकों का गिरना भी भाजपा के लिए फायदे का सौदा है, क्योंकि उसने यह संदेश देने की कोशिश बखूबी की है कि वह तो महिलाओं को जल्द आरक्षण देना चाहती थी, लेकिन विपक्ष की वजह से ऐसा नहीं हो सका। 
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women reservation constitution amendment bill stuck in politics nda opposition delimitation
Parliament - फोटो : PTI

विस्तार

नारी शक्ति वंदन अधिनियम को प्रभावी बनाने और परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने तीन महत्वपूर्ण विधेयकों को संसद में पेश कर जो पहल की थी, पर्याप्त समर्थन के अभाव में उसका सदन में गिर जाना प्रत्याशित ही था। हालांकि, इससे यह भी पता चलता है कि राजनीतिक दल अब भी महिला आरक्षण के मुद्दे को प्रक्रियाओं के जाल में उलझाकर आधी आबादी को उनका उचित राजनीतिक हक देने की वास्तविक मंशा से कहीं दूर हैं। आंकड़े अपनी कहानी आप कहते हैं। 


सदन में फिलहाल करीब 14 फीसदी महिलाएं हैं, जो काफी निराशाजनक स्थिति है, जिसे बदलने की जरूरत है। किस पार्टी ने महिलाओं पर कितना भरोसा किया, इस पर नजर डालने से साफ हो जाता है कि इस मामले में सभी राजनीतिक दलों की स्थिति कमोबेश एक जैसी ही रही है। वर्तमान संविधान संशोधन विधेयकों को लेकर विपक्ष की मूल चिंता यह थी कि परिसीमन के तहत सीटों का पुनर्निर्धारण दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक भागीदारी को प्रभावित कर सकता है, जिस पर सरकार ने आश्वासन देने का प्रयास किया कि सीटों की कुल संख्या बढ़ाने के बावजूद संतुलित प्रतिनिधित्व बना रहेगा। फिर भी, विधेयकों का गिरना यही संकेत देता है कि राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं अलग हैं। जो महिला आरक्षण, सभी दलों के घोषणापत्रों में शामिल रहा है, उसे प्रक्रियाओं, गणित और क्षेत्रीय हितों के जाल में उलझाने की कोशिश निराशाजनक ही है। 


दशकों से लंबित महिला आरक्षण विधेयक को अब केंद्रीय विधि मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 के रूप में लागू तो कर दिया गया है, पर देखने वाली बात होगी कि महिला आरक्षण के फायदे वास्तव में सभी महिलाओं को समान रूप से मिल पाते हैं या नहीं। इस मामले में स्थानीय स्व-शासन के निकायों में महिलाओं की भागीदारी के अनुभव से सबक लिया जा सकता है। 

कुछ राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों की दृष्टि से देखें, तो विधेयकों का गिरना भी भाजपा के लिए फायदे का सौदा है, क्योंकि उसने यह संदेश देने की कोशिश बखूबी की है कि वह तो महिलाओं को जल्द आरक्षण देना चाहती थी, लेकिन विपक्ष की वजह से ऐसा नहीं हो सका। अच्छी बात है कि रास्ता खुला है, लेकिन महिला आरक्षण अधिनियम अपने उद्देश्यों में तभी सफल हो सकता है, जब विभिन्न पृष्ठभूमि की महिलाओं को प्रतिनिधित्व का समान मौका मिले।
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