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विडंबना: पलायन की मार से पहाड़ का एक और गांव हुआ वीरान, नहीं रहा एक भी व्यक्ति

Thu, 12 Dec 2019 08:51 AM IST
अलका त्यागी विनय बहुगुणा, अमर उजाला, रुद्रप्रयाग
विनय बहुगुणा, अमर उजाला, रुद्रप्रयाग Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 12 Dec 2019 08:51 AM IST
सार

  • सुविधाओं के अभाव में उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले का ढिंगणी गांव हुआ जनशून्य
  • अकेले रह रहे बुजुर्ग दंबति भी बीमारी के कारण बेटों के पास गए दून
  • गांव में रहते थे पहले 15 परिवार, अब सभी घरों में लटके हैं ताले
     

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Amar ujala Exclusive: Uttarakhand Rudraprayag one More Village Empty after Migration
उत्तराखंड का ढिंगणी गांव - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में अगस्त्यमुनि ब्लाक की ग्राम पंचायत बंगोली का ढिंगणी गांव पलायन की मार से जनशून्य हो गया है। पिछले आठ वर्ष से यहां रह रहे बुजुर्ग दंपति भी बीमारी के चलते अपने बच्चों के पास देहरादून चले गए हैं। अब इस गांव में भी वीरानगी छा गई है। हाल यह है कि सभी घरों और गोशालाओं में ताले लटके हैं।

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1990 में सुबेदार पद से रिटायर हुए नत्थी सिंह रौथाण(79 वर्ष) और उनकी पत्नी कमला देवी इस गांव के आखिरी निवासी थे। उनके तीन पुत्र और दो पुत्रियां हैं, सभी की शादी हो चुकी है। बुजुर्ग दंपति बीमार होने के कारण अब दून के भानियावाला में रहने वाले अपने दो बेटों के पास चले गए हैं। बच्छणस्यूं पट्टी में ढिंगणी गांव की बसावट करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व की बताई जाती है।
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तब दो-तीन परिवार अन्य गांव से यहां आकर बसे थे। वर्ष 2007-08 तक यहां लगभग 15 परिवार निवास कर रहे थे। परेशानी यह थी कि सड़क नहीं होने से उन्हें चीनी, नमक जैसी रोजमर्रा की जरूरत की सामग्री के लिए भी चार किमी की खड़ी चढ़ाई तय कर खेड़ाखाल जाना पड़ रहा था। ऐसे में बुजुर्ग, बीमार और गर्भवती महिलाओं को समय पर इलाज तक नहीं मिल पाता था।

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नहीं जाना चाहते थे अपनी जड़ों से दूर

वयोवृद्ध नत्थी सिंह रौथाण कहते हैं कि वे अपनी जड़ों से दूर नहीं जाना चाहते थे, पर हालात ने गांव छोड़ने को मजबूर कर दिया। वर्ष 2004 में पांच किमी दैजीमांडा-पौड़ीखाल मोटर मार्ग की मंजूरी मिली थी।

विभाग की ओर से इस मार्ग के गहड़खाल तक विस्तार का प्रस्ताव शासन को भेजा गया, लेकिन सड़क ढाई किमी बनने के बाद आगे नहीं बढ़ी। सड़क नहीं होने से मूलभूत जरूरतों की उम्मीदें दम तोड़ने लगीं। फिर रही-सही कसर जंगली जानवरों ने पूरी कर दी। छोटी सी जरूरत के लिए भी 79 की उम्र में चार किमी खड़ी चढ़ाई तय करना उनके लिए संभव नहीं रहा।

उपेक्षा से खाली हो रहे गांव

गांव छोड़कर शहरी इलाकों में शिफ्ट हुए रिटायर्ड शिक्षक मोहन सिंह रौथाण, त्रिभुवन सिंह चौधरी, गोविंद सिंह चौधरी और बीरेंद्र चौधरी का कहना है कि प्रदेश सरकारों और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं।

वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य बनने पर उम्मीद जगी थी कि गांवों के दिन बहुरेंगे। सड़क, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी होंगी, पर किसी ने सुध नहीं ली। वहीं गुलदार समेत अन्य जंगली जानवरों का आतंक अलग से, ऐसे में गांव नहीं छोड़ते तो क्या करते।

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