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कोटद्वारम्: अब संस्कृत भाषा में पढ़ा जाएगा कोटद्वार रेलवे स्टेशन का नाम, उर्दू में लिखा पुराना बोर्ड हटाया गया

Fri, 17 Jul 2026 05:46 PM IST
Renu Saklani चरनजीत सिंह, संवाद न्यूज एजेंसी, कोटद्वार
चरनजीत सिंह, संवाद न्यूज एजेंसी, कोटद्वार Published by: Renu Saklani Updated Fri, 17 Jul 2026 05:46 PM IST
सार

कोटद्वार रेलवे स्टेशन का नाम अब संस्कृत भाषा में पढ़ा जाएगा। प्लेटफार्म से उर्दू भाषा में लिखा पुराना डिस्प्ले बोर्ड हटा दिया गया है। रेलवे स्टेशन ब्रिटिश सरकार के राज में अस्तित्व में आया था।

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Kotdwaram Now Kotdwar railway station name will be read in Sanskrit language Uttarakhand news
कोटद्वार रेलवे स्टेशन - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत निर्माणाधीन कोटद्वार रेलवे स्टेशन के डिस्प्ले बोर्ड से उर्दू भाषा को हटाकर संस्कृत को स्थान दिया गया है। अब कोटद्वार जन-जन के बीच कोटद्वारम् नाम से पहचाना जाएगा।

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ब्रिटिश सरकार के राज में 19वीं सदी के आखिर में कोटद्वार रेलवे स्टेशन अस्तित्व में आया था। आजादी के बाद से अब तक रेलवे स्टेशन प्लेटफार्म पर लगे डिस्प्ले बोर्ड पर तीन भाषाओं हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में रेलवे स्टेशन के नाम को पढ़ा व पहचाना जाता था। इसमें सबसे ऊपर हिंदी, नीचे बाईं ओर अंग्रेजी और दाईं ओर उर्दू में नाम लिखा जाता था।

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इसमें से उर्दू भाषा को अब हटा दिया गया है। अब जो नए लुक में नया डिस्प्ले बोर्ड लगाया गया है। उस पर सबसे ऊपर हिंदी, फिर अंग्रेजी और फिर संस्कृत भाषा को स्थान दिया गया है। वहीं रेलवे भवन के मुख्य द्वार के ऊपरी हिस्से में इलेक्टि्रक डिजिटल बोर्ड पर केवल हिंदी और अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया गया है। देहरादून, ऋषिकेश, कोटद्वार के बाद अब चर्चा है कि आगामी कुछ समय में उत्तराखंड के सभी रेलवे स्टेशनों का नाम अब हिंदी, अंग्रेजी के साथ संस्कृत भाषा में भी पढ़ा जाएगा।

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रेलवे के किसी नियम के अंतर्गत ही उर्दू भाषा को हटाकर संस्कृत में नाम लिखा गया होगा। इसकी स्पष्ट जानकारी जुटाई जाएगी। -विनीता श्रीवास्तव, मंडल रेल प्रबंधक, मुरादाबाद।

बोर्ड को लेकर लोगों की आई मिलीजुली प्रतिक्रिया

रेलवे अधिकारी जहां नियमों का हवाला दे रहे हैं वहीं आमजन में इसे लेकर मिलीजुली प्रतिक्रिया है। कारोबारी शराफत का कहना है कि राजनीति विकास के मुद्दे से हटकर गलत ट्रैक पर जा रही है। जनभावनाओं से खिलवाड़ हो रहा है। मोहम्मद उमर का कहना है कि तो क्या अब भाषाएं भी बोझ बनने लगी हैं। ज्यादा जरूरत थी तो बोर्ड पर संस्कृत में भी लिख दिया होता, उर्दू को हटाने की बात बेतुकी है। वहीं, भाजपा के जिलाध्यक्ष राजगौरव नौटियाल कहते हैं कि ये सनातन संस्कृति का प्रादुर्भाव और उसी का प्रभाव है। अब संस्थान भी संस्कृत पहचाने जाएंगे।

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