पहाड़ और पीड़ा: परंपराएं सिसकती और चौपालें तरसती हैं, कुछ यूं धुंधलाई सी हो गई है जिंदगी
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
उत्तराखंड के पौड़ी में कोट ब्लॉक के पलोटा गांव में हूं। घुमावदार रास्तों से होते हुए लंबी दूरी तय कर यहां पहुंचे हैं। सड़क से नीचे पगडंडियों से उतरते हुए गांव में कदम रखते हैं। दूर-दूर तक नीरवता छाई है। परंपराएं सिसकती हैं, चौपालें तरसती हैं। न दीवाली के दीये टिमटिमाते हैं, न होली के रंग मुस्कुराते हैं। अधिकतर घरौंदों पर ताले लटके हैं। कुछ अपनों की राह देखते-देखते खंडहर भी हो गए।
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
उत्तराखंड के पौड़ी में कोट ब्लॉक के पलोटा गांव में हूं। घुमावदार रास्तों से होते हुए लंबी दूरी तय कर यहां पहुंचे हैं। सड़क से नीचे पगडंडियों से उतरते हुए गांव में कदम रखते हैं। दूर-दूर तक नीरवता छाई है। परंपराएं सिसकती हैं, चौपालें तरसती हैं। न दीवाली के दीये टिमटिमाते हैं, न होली के रंग मुस्कुराते हैं। अधिकतर घरौंदों पर ताले लटके हैं। कुछ अपनों की राह देखते-देखते खंडहर भी हो गए।
लकड़ी और मिट्टी के पुराने घरों में से कुछ बूढ़े दरख्त झांकते हैं। बेबस और अकेले। प्राण होकर भी प्राणहीन हो जैसे। न कदम साथ देते हैं और न नजरें। धुंधलाई सी जिंदगी है। ये ढलते सूरज के अंधेरों में कैद होकर रह गए हैं। अपनी मिट्टी छोड़ी नहीं जाती, इसलिए तीज-त्योहारों की रौनक से दूर अपनी देहरी से बंधे खड़े हैं। इस मोड़ पर जाएं भी तो कहां। जहां उम्र गुजार दी, वहीं गुजरेंगे। चंद्र सिंह बड़ी मार्मिक बात कहते हैं। यह राजधानी है हमारी। कहां जाएं। हम अपनी मिट्टी में ही मिट्टी होना चाहते हैं।
पलायन ने पलोटा को सूना कर दिया है। नई पीढ़ी रोजगार और सुविधाओं की कमी के चलते यहां से चली गई। रह गए बुजुर्ग। 76 घरों में से करीब 25 में बुजुर्ग रहते हैं। बाकी घर बंद पड़े हैं। यहां की लोक संस्कृति, खुशहाली, मेलजोल सब लोगों के साथ चले गए। खेत भी बंजर पड़े हैं।
लाचार बुजुर्ग मूलभूत सुविधाओं के लिए भी मोहताज हैं। न पानी है और न चिकित्सा। बीमार हो जाते हैं तो इलाज के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। 79 वर्षीय चंद्र सिंह और उनकी पत्नी पारू देवी अपने पठाल के घर में दिन काट रहे हैं। कुछ महीने पहले ही सरकारी योजना की मदद से घर में बिजली आई है।
पहले गांव में बड़ी चहल-पहल रहती थी
खून-पसीने से इसे सींचा। इसे कैसे छोड़ दे। गांव की रौनक तो चली गई पर हम कहीं नहीं जाएंगे। यहीं मन लगा लेते हैं। मुझे एक हजार रुपये पेंशन मिलती है। उसी से खर्च चलाते हैं। पारू देवी बोल पड़ती हैं, एक टाइम बनाते हैं, तीन टाइम खाते हैं।
बीमार हो जाते हैं तो भीतर ही भीतर मरते रहते हैं। पहले सब लोग साथ बैठते थे। अब जमाना बदल गया। अब बूढे़ लोगों से कोई बात नहीं करता। चंद्र सिंह कहते हैं, पानी की तंगी और जंगली जानवरों की वजह से लोगों ने खेती करना छोड़ दिया।
66 वर्षीय रामेश्वरी देवी कहती हैं, पहले गांव में बड़ी चहल-पहल रहती थी। वसंत पंचमी से एक महीने तक सभी महिलाएं इकट्ठा होकर लोकगीत गाती थी। नई बहुएं भी इसमें शामिल होती थीं। ड्यौढ़ी पर फूल चढ़ाते थे। वैशाख महीने में स्नान करने देवप्रयाग जाते थे।
हफ्ते भर तक नहीं आता पानी
शादी-ब्याह जैसे उत्सव यहां धूमधाम से मनाए जाते थे। 69 वर्षीय जगत सिंह ज्यादातर श्रीनगर रहते हैं। कभी घर की देखरेख करने आ जाते हैं। बताते हैं, राशन, सब्जी-पानी की बहुत परेशानी है। पहले गांव खूब हरा-भरा था। खेती भी आबाद थी।
रामेश्वरी देवी के बेटे मनोज दिल्ली में जॉब करते हैं। छुट्टी पर घर आए थे। पलायन की समस्या पर बोले, पूरा जनरेशन गैप हो गया। अब सब अपने बच्चों को बाहर पढ़ा रहे हैं। यहां नई पीढ़ी का कोई बचा ही नहीं। प्राइमरी स्कूल में पढ़ने के लिए बच्चे नहीं हैं।
हमारी मातृभूमि है इसलिए छोड़ी नहीं जाती। 2000 से यहां पलायन शुरू हुआ। न यहां चिकित्सा की सुविधा है और न रोड कनेक्टिविटी। हफ्ते भर तक पानी नहीं आता। समाज कल्याण की योजनाओं की किसी को जानकारी नहीं है। न ही उस स्तर पर कोई जागरूकता कार्यक्रम है। अब जितने लोग बचे हैं, उनके बारे में सरकार को सोचना चाहिए।