उत्तराखंडः खाली गांव में भरी है लाचारी, बचे हैं बस सुविधाओं को मोहताज बुजुर्ग
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अंदर-अंदर खोखला हो रहा है पहाड़। उसकी खूबसूरती तो सबको दिखाई देती है लेकिन दर्द नहीं। जिसके जवां परिंदे दाना पानी की तलाश में दूर दिशा में उड़ गए। बिन लाठी के लड़खड़ाता बुढ़ापा रह गया। खाली गांवों में लाचारी भरी है। हारी-बीमारी में हांफते, जाड़े में थर- थर कांपते, बेबस, निढाल अपने नीड़ में बिखरे तिनकों से पड़े हैं। न नाती-पोतों का शोर है और न कहानी-किस्से।
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अंदर-अंदर खोखला हो रहा है पहाड़। उसकी खूबसूरती तो सबको दिखाई देती है लेकिन दर्द नहीं। जिसके जवां परिंदे दाना पानी की तलाश में दूर दिशा में उड़ गए। बिन लाठी के लड़खड़ाता बुढ़ापा रह गया। खाली गांवों में लाचारी भरी है। हारी-बीमारी में हांफते, जाड़े में थर- थर कांपते, बेबस, निढाल अपने नीड़ में बिखरे तिनकों से पड़े हैं। न नाती-पोतों का शोर है और न कहानी-किस्से।
उम्र के आखिरी पड़ाव पर अपनी जड़ों से उखड़ने की न तो उनमें कुव्वत है और न ही चाहत। ये बुजुर्ग अपने खेत-खलिहानों को बंजर होने से नहीं बचा पाए लेकिन घरों में पसरे सन्नाटे से लड़ रहे हैं। इनके पैरों में मजबूरी की बेड़ी है तो गांव-घर का अटूट बंधन भी। यहां का हवा-पानी इन्हें बहुत प्यारा है, इसलिए तमाम दुश्वारियों के बावजूद यहां बसे हैं।
पुराने दौर का हाथ थामे पुराने लोग अपने गांव में दिन काट रहे हैं। चिंता बस आज की है। आज का दिन निकल जाए, कल का कल देखेंगे। यहां आज भी रामायण और महाभारत का युग जीवित है। बोडा-बोडी (बुजुर्ग) रात को यही देखते हैं। यह कहानी कोटी गांव की है।
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एक लड़की थी जिसकी शादी हो गई। गांव से बाहर जा नहीं सकते। मजबूरी से रह रहे हैं। न गाड़ी का साधन है और न हॉस्पिटल की सुविधा। पहले गांव में रौनक थी। 10 साल पहले खाली होता चला गया। सड़क बाद में आई। बीमारी में भी ऐसे ही पड़े रहते हैं।