फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   Migration in uttarakhand Special Report on Empty Villages real Condition

पहाड़ की पीड़ा: भूतिया और वीरान बन गए पहाड़ के वो आशियाने, बचे हैं तो बस बूढ़े घर

Sat, 26 Oct 2019 01:19 PM IST
अलका त्यागी रैना पालीवाल, अमर उजाला पौड़ी/रुद्रप्रयाग
रैना पालीवाल, अमर उजाला पौड़ी/रुद्रप्रयाग Published by: अलका त्यागी Updated Sat, 26 Oct 2019 01:19 PM IST
विज्ञापन
Migration in uttarakhand Special Report on Empty Villages real Condition
- फोटो : अमर उजाला

तुम्हें बुला रहा मैं तुम्हारा बूढ़ा घर, कंक्रीट-अरण्यों से चले आओ निकलकर। माना तुम्हारे पास होंगे आकाशचुंबीय भवन,परंतु क्या ये घरौंदा नहीं अब तुम्हें स्मरण। खेले-कूदे जिसकी गोदी में, धूल-मिट्टी से सन, जहां तुमने बिताया अपना प्यारा नन्हा सा बचपन।...डॉ. कविता भट्ट ने यह मर्मस्पर्शी रचना बलोनी और बर्सू जैसे गांवों के लिए ही लिखी है। गांव जो अब भूतिया कहे जाते हैं। गांव जो वीरान हो गए।


loader

तुम्हें बुला रहा मैं तुम्हारा बूढ़ा घर, कंक्रीट-अरण्यों से चले आओ निकलकर। माना तुम्हारे पास होंगे आकाशचुंबीय भवन,परंतु क्या ये घरौंदा नहीं अब तुम्हें स्मरण। खेले-कूदे जिसकी गोदी में, धूल-मिट्टी से सन, जहां तुमने बिताया अपना प्यारा नन्हा सा बचपन।...डॉ. कविता भट्ट ने यह मर्मस्पर्शी रचना बलोनी और बर्सू जैसे गांवों के लिए ही लिखी है। गांव जो अब भूतिया कहे जाते हैं। गांव जो वीरान हो गए।

बचे हैं तो बस बूढ़े घर। ये अपनों को पुकारते हैं लेकिन इनकी आवाज दीवारों से टकराकर वापस लौट आती है। कुछ इंतजार में खड़े हैं तो कुछ थक-हारकर ढह गए। इन मिट्टी के आंगनों में कभी कोई घुटमन चला था। जन्म, ब्याह और सभी उत्सवों में ये आंगन-भीत हुलसती थीं। 

चूल्हों पर स्वाद महकता था, बच्चों से घर-घर चहकता था। न जाने कितनी पीढ़ियों को अपनी गोद में खिलाने वाले ये घरौंदे जर्जर हाल में उदास खड़े हैं। लकड़ी के कलात्मक द्वार सिसक रहे हैं, पत्थर आंसुओं से पिघल रहे हैं।

पौड़ी के निर्जन बलोनी गांव में जाने का रास्ता झाड़ियों से ढका है। गांव में अधिकांश घरौंदे खंडहर हो गए हैं। जो बचे हैं, उनको भी झाड़ियों ने ढांप दिया है। बलोनी उम्मीद छोड़ चुका है। रुद्रप्रयाग के बर्सू गांव में युवा विजय ने एक आस जगाई है।

पसरे सन्नाटे को बयां करता गांव का रास्ता

पहले बात करते हैं बलोनी गांव की। पौड़ी से करीब 25 किमी दूर इस गांव का रास्ता यहां पसरे सन्नाटे को बयां कर देता है। अब यहां से गुजरने वाला कोई नहीं बचा। जैसे-तैसे झाड़ियों को चीरती हुई गाड़ी बढ़ती है पर कुछ दूर चलकर ड्राइवर हाथ जोड़ देता है।

वहां से पैदल निकलते हैं। सड़क का नामोंनिशां नहीं बचा। डेढ़ किमी चलने के बाद रास्ता खत्म हो जाता है। फोटोग्राफर मातंग मलासी झाड़ी में से ही कुछ फोटो खींच लेते हैं। दो-चार घर नजर आते हैं, जिन पर ताले लटके हैं। गडियाल गांव के जगमोहन डांगी बताते हैं, बलोनी में करीब 30 परिवार थे। 

दस साल पहले सब चले गए। पांच साल पहले तक एक रिटायर्ड  सैनिक श्याम प्रसाद वहां रहते थे। वह अपने गांव को जीवित रखना चाहते थे पर दुश्वारियां बहुत थी। गांव में पानी की बहुत दिक्कत थी। उन्होंने राष्ट्रपति को इच्छामृत्यु तक के लिए लिख दिया।

विजय ने बचाया बर्सू का वजूद

तब जाकर एक जनप्रतिनिधि ने टंकी की मरम्मत कराई लेकिन पानी का स्रोत न होने की वजह से उन्हें भी आखिरकार गांव छोड़कर बाहर जाना पड़ा। गांव में सिद्ध बाबा का मंदिर है। जून में वहां पूजा होती है, तब सभी गांव वाले आते हैं। सामूहिक भोज बनता है। अब गांव में कोई नहीं रहता।

रुद्रप्रयाग से करीब चार किमी दूर बर्सू गांव में पठाल के कलात्मक घरों पर ताले लटके हैं। युवा विजय के अपनत्व ने इस गांव का वजूद बचा रखा है। ये घर भी झाड़ियों से ढके होते, अगर विजय ने उन्हें न हटाया होता।

40 वर्षीय विजय सेमवाल का बचपन इसी गांव में बीता। बाद में वह रुद्रप्रयाग के पुनाड़ गांव में रहने चले गए। उन्हें पेड़ पौधों से बहुत लगाव था। वहां जमीन कम पड़ी तो सोचा क्यों न इस बंजर गांव में कुछ रौनक लाई जाए।

गोबर से खेती भी बनी सहारा

छह साल पहले यहां आए और अब तक करीब 750 पौधे लगा चुके हैं। गांव में 2000 नाली खेत हैं जो बंजर पड़े हैं। विजय ने 30 नाली में ऑर्गेनिक खेती शुरू की जिसमें वह मटर, लहसुन, प्याज आदि लगाते हैं। इस बरसात में ही उन्होंने दस क्विंटल सब्जी का उत्पादन किया है। साल भर में एक लाख का मुनाफा कमा लेते हैं।

कहते हैं, जो गाय लोगों ने छोड़ दी थीं, मैंने उनका पालन शुरू किया। उसी गोबर से खेती की। ब्राह्मण बाहुल्य गांव था। 1994 में खाली हो गया। 35 परिवारों में से पांच बचे थे, तब यहां बिजली आई थी। रुद्रप्रयाग से रोड भी बाद में आई। अभी करीब 20 घरों पर ताला लटका है, बाकी टूट गए। मैं बस यही चाहता हूं कि गांव फिर से आबाद हो जाए। कुछ लोग अपने मकानों को देखने आते हैं।

चार मकान नए भी बने हैं। लोग आ रहे हैं। गांव की जमीन बहुत उपजाऊ है। अगर शासन से मदद मिले तो मैं 2000 नाली में खेती करना चाहूंगा। वहां फलों के पेड़ लगाऊंगा। इसके लिए पानी की जरूरत है और जंगली जानवरों से बचाव की।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed