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पहाड़ और पीड़ा: चूल्हे की लकड़ी सी जलती है, वह अकेले ढोती है जिंदगी का 'पहाड़'

Mon, 04 Nov 2019 08:41 AM IST
अलका त्यागी रैना पालीवाल, अमर उजाला, पल्ली (पौड़ी)
रैना पालीवाल, अमर उजाला, पल्ली (पौड़ी) Published by: अलका त्यागी Updated Mon, 04 Nov 2019 08:41 AM IST
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Migration in uttarakhand: Women Suffering Difficulties Alone in mountain areas
पहाड़ में महिलाएं - फोटो : अमर उजाला

जिंदगी के पहाड़ को अकेले ढोती है, संघर्षों की आंच में कंचन काया कोयला होती है। झुककर, गिरकर भी चलती है, चूल्हे की लकड़ी सी जलती है। कभी कराहती, छटपटाती, धुएं में घुटती, कुम्हलाती है, कभी कटार लिए बच्चों की रक्षा में उतर आती है।

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यह पहाड़ की महिला है, प्रकृति है, प्रकृति से दूर कहां जा पाती है। रुकी इसलिए भी है ताकि आने वाली पीढ़ी को यहां न रुकना पड़े। पति का साथ सबसे प्यारा है पर पैसे के बिना कहां गुजारा है। मजदूरी में दूरी है, यही मजबूरी है।
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खुद बेसहारा होकर बच्चों का सहारा है, महिला के जज्बे से पहाड़ भी हारा है। खुद भी कहती है, जिंदगी घिस रही है। यूं तो चल रही है पर उम्र ढल रही है। पथराये चेहरे, निराश आंखों में एक कसक सी है। काम में खटते-खपते कब यंत्रवत हो जाती हैं, पता ही नहीं चलता।

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पति दिहाड़ी करते थे, रात में उन पैसों की शराब पी लेते

घर से जंगल और जंगल से खेतों तक की दूरी बिना हांफे नापती हैं। कभी गिर भी जाती हैं, तो साथ की महिला अपने कंधे पर उठाकर गांव ले आती है। कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला रोजी रोटी कमाने बाहर चला गया। रह गईं वो अकेली। यह महिला सिर्फ बच्चों की नहीं बल्कि पहाड़ की भी पालनहार हैं। अफसोस इसी बात का है कि इनकी हाड़-तोड़ मेहनत का कोई मोल नहीं है।

पौड़ी के पल्ली (तल्ली) गांव में कई ऐसी महिलाएं हैं जिनके पति बाहर काम करते हैं। जो अकेले घर और बाहर की जिम्मेदारी निभा रही हैं। 31 वर्षीय सोना ने खुद अपने पति को काम करने के लिए बाहर भेजा।

गांव में पति दिहाड़ी करते थे, रात में उन पैसों की शराब पी लेते। जिनके साथ शराब पीते, सोना उनके घर जाकर भी लड़ आईं। कहती हैं, आखिर में वह काम करने के लिए चंडीगढ़ चले गए।

घर के बाहर बाघ तक आ जाते हैं

घर, बच्चे, खेत, रिश्तेदारी सारे दायित्व मुझे ही निभाने पड़ते हैं। 6-7 खेत हैं। अकेले काम करती हूं। फसल अच्छी हो गई तो पांच-छह महीने के लिए दाल हो जाती है। सुबह पांच बजे से काम शुरू होता है।

बच्चों को तैयार करना, गाय को जंगल भगाना, घास लाना, खाना बनाना, खेतों में जाना और फिर सात बजे के करीब वापस आना। रक्षा के लिए बड़ी कटार रखी है। पति तीन-चार महीने बाद आते हैं। अब उनकी कमाई खराब नहीं होती। वह जो पैसे भेजते हैं, उनसे घर चल जाता है। परेशानी तो बहुत है। घर के बाहर बाघ तक आ जाते हैं, दरवाजा बंद करके शोर मचाते हैं। खेती को जंगली सुअर खा जाता है। महिलाओं को ऐसा काम मिले जिसके साथ वे अपने बच्चों को भी देख सकें।

32 वर्षीय पूजा का मुरझाया चेहरा है। उनके तीन बच्चे हैं। सबसे छोटा बेटा डेढ़ साल का है। घर में सास-ससुर और देवर हैं। पति दिल्ली में प्राइवेट जॉब करते हैं। पूजा बीए पास हैं। उन्हें मलाल है कि वह काम की वजह से अपने बच्चों की देखभाल भी नहीं कर पातीं। कहती हैं, कभी सोचती हूं तो बहुत दुख होता है। अपने लिए भी कुछ नहीं कर पाई। बोझा ढोने से कमर में दर्द होता है। पहले मनरेगा में काम करती थी पर बच्चे के कारण छोड़ दिया।

कभी काम मिलता है कभी नहीं

36 वर्षीय रजनी देवी के पति दिल्ली में हैं। कभी काम मिलता है कभी नहीं। हर महीने खर्च नहीं भेज पाते। रजनी अपने दो बच्चों की परवरिश के लिए मनरेगा में काम करती हैं। कहती हैं, सब महिलाएं चूल्हे पर रोटी बनाती हैं।

सिलेंडर के लिए पैसे कहां से लाएं। एक बार जंगल में गिर गई, पैर में फ्रेक्चर हो गया। क्या डरें, जब रोज वहीं जाना है। पहाड़ पर हवा-पानी सही है, बस पैसा नहीं है। काश! पति साथ होते।

...दुआ करते हैं, कि बीमार न पड़ें
गांव में मेडिकल की कोई सुविधा नहीं है। डिलीवरी के लिए महिलाओं को बहुत तकलीफ उठानी पड़ती है। अनीता और नंदीश्वरी कहती हैं, हम लोग खुद अपना ध्यान रखते हैं। दुआ करते हैं, बीमार न पड़ें। डिलीवरी के लिए पौड़ी से एंबुलेंस बुलानी पड़ती है। रास्ता खराब होने की वजह से घंटों लग जाते हैं। कभी-कभी घरों में भी प्रसव हो जाता है। यहां एक आयुर्वेदिक दवाखाना है पर वहां दवा नहीं है। गांव की कोई महिला सेनेटरी पैड भी इस्तेमाल नहीं
करती। उसके लिए पैसे कहां से लाएं।

गांव के पुरुषों को लग गई नशे की लत
सोना चुपके से आकर पूछती हैं, मैडम नशे और जुए के लिए कुछ करें। गांव में नशाखोरी बहुत बढ़ गई है। बच्चों के लिए माहौल खराब हो गया है। हम लोग भी असहज रहते हैं। पुरुषों से कुछ कहते हैं तो वे अभद्र व्यवहार करते हैं। नशे पर रोक लगनी चाहिए।

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