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पहाड़ और पीड़ा: हाड़ मांस की गठरी हैं 'पहाड़ की रानी', वो तो पानी में ही देख लेती हैं शीशा

Thu, 21 Nov 2019 08:21 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पीपलखंडा (उत्तरकाशी)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पीपलखंडा (उत्तरकाशी) Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 21 Nov 2019 08:21 AM IST
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Pahad Aur Peeda: Women Struggle in Mountain Area uttarakhand after Migration
पहाड़ और महिलाएं - फोटो : अमर उजाला

गाय-भैंस की तरह किसी भी खूंटे से बांध दी जाती हैं। पैरों में है मर्यादा की बेड़ी जो इन्हें खुलने ही नहीं देती। वैसे भी ये जकड़न जड़ों तक ऐसे धंसी है कि इससे मुक्त होना आसान नहीं। सहती बहुत है पर कहती कुछ भी नहीं। प्रताड़ित होकर भी जो पीड़ित नहीं होती। वह है पहाड़ की नारी।


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गाय-भैंस की तरह किसी भी खूंटे से बांध दी जाती हैं। पैरों में है मर्यादा की बेड़ी जो इन्हें खुलने ही नहीं देती। वैसे भी ये जकड़न जड़ों तक ऐसे धंसी है कि इससे मुक्त होना आसान नहीं। सहती बहुत है पर कहती कुछ भी नहीं। प्रताड़ित होकर भी जो पीड़ित नहीं होती। वह है पहाड़ की नारी।

दिन-रात सिर पर काम लादे बोझिल सी रहती है। इस बोझ को ढोते-ढोते जवान काया जर्जर हो जाती है। जिंदगी की भट्टी में हाड़-मांस गलाकर वह अपने बच्चों का भरण-पोषण कर पाती है। कमर पर घास और लकड़ी के गट्ठर लादे वह खुद एक गठरी ही तो बन जाती है। जिसके हिस्से मानवाधिकार नहीं आए, महिला अधिकार तो बहुत दूर की कौड़ी है। कोई कानून भी उसका भला नहीं कर पाता। मैं खुद भी उनकी मर्मांतक पीड़ा को शब्द शिल्प से सजा रही हूं। उनके सीने में छिपे जख्मों को मैं कहां भर पाऊंगी। अंदर-अंदर दर्द में घुलती हैं। दर्द न कहने की पुरानी प्रथा को औरत आज भी निभा रही है।

सुषमा न जाने किस मिट्टी की बनी हैं। उनके चेहरे पर झाइयों की लकीर नहीं, वो झंझावात हैं जो जिंदगी में झेले हैं। लगता ही नहीं, 39 साल की है। तकलीफों ने उम्र बढ़ा दी। सुषमा बस उदाहरण हैं। पहाड़ में ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं जो अपनों के सितम चुपचाप सह रही हैं। पांचवीं तक पढ़ी सुषमा की शादी 17 बरस में हो गई। पति चंडीगढ़ में काम करते हैं। दो-तीन साल बाद सुषमा को पता चला कि उन्होंने वहां भी शादी कर ली है। 

तीन-चार साल से पति घर भी नहीं आए

वह कुछ नहीं कर पाईं। उसने पुलिस में शिकायत तक नहीं की। उनकी तीन बेटियां हैं जिनमें से एक की शादी हो गई। सुषमा ने खेतीबाड़ी, मनरेगा में काम करके अपनी बेटियों की परवरिश की। एक दसवीं कक्षा में है और दूसरी सातवीं में। पति ने कभी खर्चा नहीं भेजा। आठ साल पहले जूनियर हाईस्कूल में मिड डे मील बनाना शुरू किया। इस काममें उन्हें दो हजार रुपये मिलते हैं। कहती हैं, बहुत दिक्कत है दीदी।

अकेली रहती हूं। तीन-चार साल से पति घर भी नहीं आए। थोड़ी खेती करती हूं। गाय भी रखी है पर खर्च नहीं चल पाता। मायके वाले थोड़ी-बहुत मदद कर पाते हैं। मेरे फेफड़ों का ऑपरेशन हो चुका है। बीमार रहती हूं। कोई रोजगार मिल जाए तो बच्चे पल जाएंगे। सुषमा से बात कर नीचे उतरी तो जंगल से घास लाती उमा पर नजर पड़ी। पसीने से तर थीं। 36 वर्षीय उमा के चार बच्चे हैं। बेटी की शादी हो गई।

एक बेटी 11वीं में है, बेटा आठवीं और दूसरा बेटा छठवीं में पढ़ रहा है। पति हरिद्वार में रहते हैं। खर्च के नाम पर हंस पड़ती हैं। बोलीं, मस्त आदमी है, कुछ नहीं भेजता। अकेले ही बच्चे पाल रही हूं। भैंस रखी है, दूध बेच लेती हूं। कुछ खेती कर लेती हूं। उमा के कच्चे घर में पंखा तक नहीं है। मैंने पूछा, तुम पति से शिकायत नहीं करतीं। जवाब था, उनसे क्या कहना। बच्चे पल जाएं, बस बहुत है। उमा मनरेगा में भी काम करती हैं पर 100 दिन पूरे नहीं मिलते। बताती हैं, वहां भी काम ज्यादा होता है और पैसे कम देते हैं।

पानी में ही देखा शीशा

टिहरी से करीब 70 किमी दूर सौड़ गांव पलायन से त्रस्त है। 300 में से सिर्फ  80 परिवार यहां रह गए हैं। गांव में कई महिलाएं ऐसी हैं जिनके पति बाहर काम करते हैं। महिलाएं अकेले सभी जिम्मेदारियों का भार उठाती हैं। 40 वर्षीय रिज्जू के तीन बच्चे हैं। पति मुजफ्फरनगर में पंडिताई करते हैं। कहती हैं, हमारे खेत घरों से बहुत दूर है। एक किमी चलना पड़ता है। जंगली जानवरों की दहशत है। धान बचाने के लिए रात में धुआं लगाते हैं।

सभी औरतें मिलकर जाते हैं, कनस्तर बजाते हैं। डर लगता है पर क्या करें। पति की कमाई ज्यादा नहीं है। मनरेगा में भी काम करते हैं। 55 वर्षीय दीपा देवी की सारी जिंदगी काम में घिस गई। ऐसा वही कहती हैं। इस मोड़ पर भी कोई सहारा देने वाला नहीं। पति जोशीमठ में मजदूरी करते हैं। बेटे बाहर रहते हैं। दीपा के चेहरे पर शिकन भरी है। कहती हैं, जीवन भर खूब काम किया।

गाय-भैंस पाली, दूसरों के खेत भी किए। बड़ी मुश्किलों से बच्चे पाले। बोझा लादते-लादते पीठ और हाथ सूज जाते थे। काम में कभी शीशा देखने की भी फुर्सत नहीं मिली। चलते-चलते पानी में ही शीशा देखा। अब भी खेती करते हैं। हम तो घर में ही छूट गए। विक्रमा के पति भी बाहर काम करते हैं। कहती हैं, जो कमाते हैं, उसे भी पति ले जाते हैं।
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