उत्तराखंड: पलायन आयोग की रिपोर्ट, टिहरी जिले से 10 साल में 90 हजार लोग छोड़ गए घर, 58 गांव पूरी तरह से गैर आबाद
- 71 गांवों से 50 प्रतिशत आबादी गई, 52 प्रतिशत लोगों ने रोजगार की वजह से छोड़ा गांव
- 40 प्रतिशत राज्य में ही रहे, नौ विकासखंडों में पांच में जनसंख्या बढ़ने की बजाय कम हुई
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पलायन आयोग की रिपोर्ट ने टिहरी जिले के पलायन की भयवाह तस्वीर पेश की है। पिछले 10 सालों में ही जिले में 58 गांव तो पूरी तरह से ही खाली हो गए। 71 ऐसे गांव हैं जहां की 50 प्रतिशत आबादी पलायन कर गई। करीब 90 हजार लोगों ने अस्थायी या स्थायी रूप से पलायन किया। 19 हजार लोग पूरी तरह से गांव छोड़कर चले गए हैं। पलायन की सबसे बड़ी वजह आजीविका या रोजगार की तलाश ही उभर कर सामने आई।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि टिहरी जिले के नौ विकास खंडों में से पांच में जनसंख्या बढ़ने की बजाय कम हुई है। इन जिलों में दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर ऋणात्मक पाई गई है। इसमें चंबा और देवप्रयाग जैसे विकासखंड भी शामिल हैं जो चार धामयात्रा से किसी न किसी रूप से जुड़े हुए हैं। जिले में अस्थायी पलायन अधिक है और यह सरकार को थोड़ी बहुत राहत दे सकता है।
जिले की कुल जनसंख्या 2011 की जनगणना के मुताबिक 6.18 लाख है। इसमें से 3.38 लाख ऐसे लोग हैं जिनके पास कोई काम नहीं है। उच्च बेरोजगारी दर पलायन का एक बड़ा कारण रहा है और रिपोर्ट से इसकी पुष्टि भी हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 52 प्रतिशत पलायन रोजगार की वजह से हुआ है।
रिपोर्ट के मुताबिक जिले में 399 ऐसे गांव हैं जहां लोगों को पानी लाने के लिए एक किलोमीटर से अधिक की दूरी नापनी पड़ती है। 660 ऐसे गांव हैं जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं हैं। इतना होने पर भी अधिकतर लोगों ने राज्य से बाहर जाना स्वीकार नहीं किया। करीब 40 प्रतिशत लोगों ने राज्य के अन्य जिलों में पलायन किया। करीब तीन प्रतिशत लोग देश छोड़कर ही चले गए। करीब 18 प्रतिशत लोग गांव छोड़कर नजदीकी कस्बों की ओर चले गए और करीब 29 प्रतिशत लोग राज्य से बाहर गए हैं।
काम धंधे के हिसाब से भी जिला खास नहीं कर पाया है। मुख्य व्यवसाय खेती है और उद्योग से बहुत कम लोग जुड़े हैं। जिले की विकास दर कुछ समय पहले तक सात प्रतिशत के आसपास थी। सीडी रेशों 38 पाया गया जो राज्य के औसत 52 प्रतिशत से बहुत कम है।
प्रदेश में रहकर ही रोजगार करना चाहते हैं प्रवासी-सीएम त्रिवेंद्र
मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में मंगलवार को सीएम आवास पर ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की तीसरी बैठक आयोजित हुई। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह भी आकलन किया जाए कि उत्तराखंड में जो प्रवासी लौटे हैं, उनमें से कितने लोग प्रदेश में रहकर ही रोजगार करना चाहते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के लिए महिलाओं को बैंक से लोन लेने में कोई परेशानी न हो, इसके लिए भूमि खाताधारक के साथ उनकी पत्नी का नाम भी शामिल किया जाए। लोगों की आमदनी में कैसे वृद्धि की जा सकती है, किन क्षेत्रों में रोजगार की अधिक संभावना है। इसकी पूरी स्टडी की जाए। हमें स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के साथ ही उसकी, पैकेजिंग एवं मार्केटिंग की दिशा में भी विशेष प्रयास करने होंगे।
बैठक में जानकारी दी गई कि आगामी वर्ष में जनपद चमोली, रुद्रप्रयाग एवं बागेश्वर के ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन को कम करने पर रिपोर्ट तैयार की जाएगी। कोविड-19 के प्रकोप के बाद उत्तराखंड राज्य में पर्वतीय जनपदों में घर लौटे प्रवासियों के आर्थिक पुनर्वास के लिए सिफारिशें प्रस्तुत करना आयोग की प्राथमिकता है। बैठक में अपर मुख्य सचिव मनीषा पंवार, मुख्यमंत्री के तकनीकि सलाहकार नरेंद्र सिंह, आर्थिक सलाहकार आलोक भट्ट, अपर आयुक्त ग्राम्य विकास रोशन लाल, उपायुक्त ग्राम्य विकास एकबे जराजपूत आदि उपस्थित थे।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
-71509 लोगों ने पिछले दस सालों में 934 ग्राम पंचायतों से अस्थायी रूप से जिले से पलायन किया। इन लोगों का अपने घरों से संपर्क बना हुआ है। जिले की आर्थिकी में इन लोगों का सीधा योगदान भी है। कारण की यह घर पैसे भेजते रहते हैं।
-18830 लोग 530 ग्राम पंचायतों से स्थायी रूप से पलायन कर चुके हैं। जिले में इन्हें प्रवासी कहा जा सकता है।
-पांच विकासखंडों में 2001 से 2011 के बीच जनसंख्या बढ़ने की बजाय कम हो गई। भिलंगना (-5.39 प्रतिशत), जाखणीधार (-5.16), देवप्रयाग (-2.36), थौलधार (-15.34), चंबा (-9.81)। कुल विकासखंड नौ हैं।
कहां कितने घोस्ट विलेज
भिलंगना-4, चंबा-14, देव्रप्रयाग-10, जाखणीधार-3, जौनपुर-12, किर्तीनगर-2, नरेंद्रनगर -3, थौलधार-12, सड़क से संपर्क न रखने वाले घोस्ट विलेज-44।
-जहां एक किलोमीटर दूर से पानी लाना होता है- 33
-पूरे प्रदेश में घोस्ट विलेज की संख्या- 734
आयोग के सुझाव
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार बहुत जरूरी। अधिकतर लोग खेती बाड़ी पर निर्भर, लेकिन जिले की जीडिपी में लगातार घट रहा है खेती किसानी का योगदान।
-3931 की जनगणना में टिहरी में सबसे अधिक आबाद गांव थे, जिनकी संख्या 4918 थी। 2011 की जनगणना में घटकर इनकी संख्या 1174 रह गए।
-जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम किया जाए।
-महिला साक्षरता बढ़ाई जाए।
-मुख्य व्यवसाय कृषि, लेकिन एक बार से अधिक बोया गया क्षेत्रफल बहुत कम। इस क्षेत्रफल को बढ़ाया जाए। क्रय मंडियों की बेहद कमी, सिंचाई सुविधाओं का अभाव। इस समस्या का समाधान किया जाए।
-14 मध्यम उद्योग, 529 को रोजगार, इनकी संख्या बढ़ाई जाए। 5446 लघु एवं सूक्ष्म उद्योग
-टिहरी, चंबा जैसे शहरों में तेजी से बढ़ता सेवा क्षेत्र। ग्रोथ सेंटर के लिए काम करेे सरकार।
प्रवासियों के रिवर्स माइग्रेशन के लिए विशेष योजनाएं चलाए सरकार
पलायन आयोग ने प्रदेश सरकार को सुझाव दिया है कि वह रिवर्स माइग्रेशन के लिए प्रवासियों की आजीविका के लिए अलग से विशेष योजनाएं लागू करे। पलायन आयोग की ओर से मंगलवार को सरकार को सौंपी गई टिहरी जिले के पलायन से संबंधित रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रवासियों के लिए तुरंत ही विशेष इकाई की स्थापना की जाए। यह इकाई ग्राम्य विकास विभाग और पलायन आयोग के साथ मिलकर प्रवासियों के लिए किए जा रहे कामों में समन्वय स्थापित करेगी।
आयोग ने इस बात पर भी जोर दिया है कि हर प्रवासी का अपना नजरिया है। ऐसे में कोविड-19 के कारण लौटे लोगों से व्यक्तिगत स्तर पर संपर्क स्थापित किया जाए। आयोग ने यह भी कहा है कि लोगों को अपने आसपास के क्षेत्र और जिलों में ही रोजगार मिल जाए तो इससे पलायन कम होगा। इसके साथ ही स्किल मैपिंग करने पर भी जोर दिया गया है। इको टूरिज्म, आतिथ्य क्षेत्र, माइक्रो एंटरप्राइज आदि के लिए ब्याज मुक्त कर्ज देने, अनुदान आदि का सुझाव भी दिया गया है।
आयोग का कहना है कि विभिन्न सरकारी योजनाओं के बारे में लोग नहीं जानते। लोगों को विभाग अपनी योजनाओं की भी जानकारी दें। इसके साथ ही एमएसएमई, रोजगार सृजन, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली आदि योजनाओं से लोगों को फायदा हो रहा है। इन योजनाओं का बजट बढ़ाने का भी सुझाव दिया गया है।