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Dehradun News: बैंक ऋण विवाद में 27 साल बाद फैसला
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देहरादून। सिविल अदालत ने 27 साल पुराने बैंक ऋण वसूली मामले में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने मेसर्स जैन सेल्स और उसके जिम्मेदार पक्षों को बैंक का बकाया 2.45 लाख रुपये से अधिक राशि ब्याज सहित चुकाने का आदेश दिया है। हालांकि, बैंक के पक्ष में बताए गए एक बंधक को अदालत ने अवैध माना। यह वाद वर्ष 1999 में दायर हुआ था, जबकि अंतिम सुनवाई 14 जुलाई 2026 को हुई और फैसला 31 जुलाई 2026 को सुनाया गया।
देहरादून के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) सैय्यद गुफरान की अदालत ने शुक्रवार को वर्ष 1999 में दायर यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की वसूली वाद पर निर्णय सुनाया। मामला मेसर्स जैन सेल्स, उसकी प्रोपराइटर रेनू जैन और अन्य से जुड़ा था। अदालत ने माना कि बैंक ने वर्ष 1984 में 50 हजार रुपये की कैश क्रेडिट सुविधा उपलब्ध कराई थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 1.50 लाख रुपये तक किया गया। ऋण नहीं चुकाने पर बैंक ने वर्ष 1999 में वसूली वाद दायर किया था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि बैंक ने ऋण, गारंटी और बकाया से जुड़े दस्तावेज पेश किए। साथ ही, रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ कि उधारकर्ताओं ने समय-समय पर डेबिट बैलेंस कन्फर्मेशन पर हस्ताक्षर किए थे, जिससे बैंक का दावा पुष्ट हुआ। अदालत ने माना कि वाद समय सीमा के भीतर दायर किया गया था और बैंक की वसूली का दावा वैध है।
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हालांकि, अदालत ने इंदर रोड स्थित संपत्ति को बैंक के पक्ष में बंधक मानने के दावे को अवैध ठहराया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उधारकर्ता बैंक के देनदार हैं और गारंटर की जिम्मेदारी भी बनी रहती है। अदालत ने बैंक को बकाया 2.45 रुपये पर 22 फरवरी 1999 से भुगतान होने तक वार्षिक 17 प्रतिशत ब्याज पाने का अधिकार भी दिया।
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देहरादून के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) सैय्यद गुफरान की अदालत ने शुक्रवार को वर्ष 1999 में दायर यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की वसूली वाद पर निर्णय सुनाया। मामला मेसर्स जैन सेल्स, उसकी प्रोपराइटर रेनू जैन और अन्य से जुड़ा था। अदालत ने माना कि बैंक ने वर्ष 1984 में 50 हजार रुपये की कैश क्रेडिट सुविधा उपलब्ध कराई थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 1.50 लाख रुपये तक किया गया। ऋण नहीं चुकाने पर बैंक ने वर्ष 1999 में वसूली वाद दायर किया था।
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सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि बैंक ने ऋण, गारंटी और बकाया से जुड़े दस्तावेज पेश किए। साथ ही, रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ कि उधारकर्ताओं ने समय-समय पर डेबिट बैलेंस कन्फर्मेशन पर हस्ताक्षर किए थे, जिससे बैंक का दावा पुष्ट हुआ। अदालत ने माना कि वाद समय सीमा के भीतर दायर किया गया था और बैंक की वसूली का दावा वैध है।
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हालांकि, अदालत ने इंदर रोड स्थित संपत्ति को बैंक के पक्ष में बंधक मानने के दावे को अवैध ठहराया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उधारकर्ता बैंक के देनदार हैं और गारंटर की जिम्मेदारी भी बनी रहती है। अदालत ने बैंक को बकाया 2.45 रुपये पर 22 फरवरी 1999 से भुगतान होने तक वार्षिक 17 प्रतिशत ब्याज पाने का अधिकार भी दिया।