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Faridabad News: ऐसा दवा बैंक, जहां जरूरतमंदों को मिलती हैं मुफ्त दवाइयां
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टीम के सदस्य घरों से बची हुई दवाइयां एकत्र करके दवा बैंक में रखते हैं
हेमलता
बल्लभगढ़। स्मार्ट सिटी की रहने वाली मीनू ने समाज सेवा का ऐसा उदाहरण पेश किया है, जिसने जरूरतमंदों के लिए उम्मीद की नई किरण जगा दी है। बढ़ती दवाइयों की कीमतों के बीच उन्होंने छह वर्ष पहले एक अनोखे दवा बैंक की शुरुआत की, जहां पैसे नहीं बल्कि लोगों के घरों में बची हुई उपयोगी दवाइयां जमा होती हैं और डॉक्टर की पर्ची पर जरूरतमंद मरीजों को बिल्कुल मुफ्त उपलब्ध कराई जाती हैं। उनकी इस पहल से अब तक हजारों गरीब, मजदूर और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को राहत मिल चुकी है।
इस काम में मीनू अकेली नहीं हैं। उनके साथ 12 दोस्तों की एक टीम जुड़ी हुई है, जिसमें वकील, ब्यूटीशियन, एचआर प्रोफेशनल और निजी कंपनियों में कार्यरत युवा शामिल हैं। सभी अपने-अपने काम के बाद प्रतिदिन लगभग दो घंटे निकालकर शहर के अलग-अलग इलाकों में लोगों के घरों से बची हुई दवाइयां एकत्र करते हैं। टीम यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी एक्सपायर दवा मरीज तक न पहुंचे। उपयोग योग्य दवाइयों को व्यवस्थित तरीके से दवा बैंक में रखा जाता है।
डॉक्टरों का भी मिल रहा सहयोग
दवा बैंक से कई डॉक्टर भी जुड़े हुए हैं, जो नियमित रूप से मरीजों की पर्चियां जांचते हैं और जरूरत के अनुसार निशुल्क दवाइयां उपलब्ध कराते हैं। इसके लिए मरीजों से किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता। यदि किसी मरीज को तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होती है तो मीनू और उनकी टीम 24 घंटे मदद के लिए तैयार रहती है। बुजुर्गों और चलने-फिरने में असमर्थ लोगों को जरूरत पड़ने पर व्हीलचेयर भी मुफ्त उपलब्ध कराई जाती है। मीनू के अनुसार, इस काम टीम के सभी सदस्य अपने-अपने स्तर पर आर्थिक सहयोग करते हैं और दवा बैंक के संचालन का खर्च स्वयं उठाते हैं।
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हेमलता
बल्लभगढ़। स्मार्ट सिटी की रहने वाली मीनू ने समाज सेवा का ऐसा उदाहरण पेश किया है, जिसने जरूरतमंदों के लिए उम्मीद की नई किरण जगा दी है। बढ़ती दवाइयों की कीमतों के बीच उन्होंने छह वर्ष पहले एक अनोखे दवा बैंक की शुरुआत की, जहां पैसे नहीं बल्कि लोगों के घरों में बची हुई उपयोगी दवाइयां जमा होती हैं और डॉक्टर की पर्ची पर जरूरतमंद मरीजों को बिल्कुल मुफ्त उपलब्ध कराई जाती हैं। उनकी इस पहल से अब तक हजारों गरीब, मजदूर और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को राहत मिल चुकी है।
इस काम में मीनू अकेली नहीं हैं। उनके साथ 12 दोस्तों की एक टीम जुड़ी हुई है, जिसमें वकील, ब्यूटीशियन, एचआर प्रोफेशनल और निजी कंपनियों में कार्यरत युवा शामिल हैं। सभी अपने-अपने काम के बाद प्रतिदिन लगभग दो घंटे निकालकर शहर के अलग-अलग इलाकों में लोगों के घरों से बची हुई दवाइयां एकत्र करते हैं। टीम यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी एक्सपायर दवा मरीज तक न पहुंचे। उपयोग योग्य दवाइयों को व्यवस्थित तरीके से दवा बैंक में रखा जाता है।
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डॉक्टरों का भी मिल रहा सहयोग
दवा बैंक से कई डॉक्टर भी जुड़े हुए हैं, जो नियमित रूप से मरीजों की पर्चियां जांचते हैं और जरूरत के अनुसार निशुल्क दवाइयां उपलब्ध कराते हैं। इसके लिए मरीजों से किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता। यदि किसी मरीज को तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होती है तो मीनू और उनकी टीम 24 घंटे मदद के लिए तैयार रहती है। बुजुर्गों और चलने-फिरने में असमर्थ लोगों को जरूरत पड़ने पर व्हीलचेयर भी मुफ्त उपलब्ध कराई जाती है। मीनू के अनुसार, इस काम टीम के सभी सदस्य अपने-अपने स्तर पर आर्थिक सहयोग करते हैं और दवा बैंक के संचालन का खर्च स्वयं उठाते हैं।
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