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सितारों से सवाल तक: जंतर-मंतर पर नई पीढ़ी ने लिखा बदलाव का इतिहास
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वेधशाला से लोकतंत्र के सबसे बड़े जनमंच तक...तीन सदियों में बदली जंतर-मंतर की पहचान
युवा आंदोलनों, जनभागीदारी और ऐतिहासिक प्रदर्शनों ने बनाया अधिकारों की लड़ाई का सबसे बुलंद प्रतीक
नितिन राजपूत
नई दिल्ली। दिल्ली का जंतर-मंतर कभी आकाश में ग्रह-नक्षत्रों की चाल समझने का केंद्र था, लेकिन आज यह देश के लोकतांत्रिक संघर्षों की सबसे मजबूत आवाज बन चुका है। विज्ञान और खगोलशास्त्र की प्रयोगशाला के रूप में शुरू हुई इसकी यात्रा अब युवाओं, छात्रों, किसानों, कर्मचारियों और सामाजिक संगठनों के अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक बन गई है। यहां उठने वाले सवाल केवल सरकार तक नहीं पहुंचते, बल्कि देशभर में लोकतांत्रिक विमर्श को दिशा भी देते हैं।
18वीं शताब्दी में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने मुगल बादशाह मोहम्मद शाह के शासनकाल में जंतर-मंतर का निर्माण कराया था। यह उनकी पांच प्रमुख वेधशालाओं में से एक है, जहां सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र, राम यंत्र और मिश्र यंत्र जैसे विशाल उपकरणों से समय, ग्रहों की स्थिति और खगोलीय घटनाओं का अध्ययन किया जाता था। उस दौर में यह वैज्ञानिक जिज्ञासा और भारतीय ज्ञान परंपरा का अद्भुत उदाहरण था।
समय के साथ दिल्ली का विस्तार हुआ। संसद भवन, केंद्रीय मंत्रालयों और कनॉट प्लेस के करीब होने के कारण जंतर-मंतर का महत्व केवल ऐतिहासिक स्मारक तक सीमित नहीं रहा। 1990 के दशक में इसे विरोध-प्रदर्शनों के प्रमुख स्थल के रूप में विकसित किया गया और 1993 के बाद यह देश का सबसे बड़ा धरना स्थल बन गया। तब से यहां हजारों छोटे-बड़े आंदोलन हुए हैं।
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जंतर-मंतर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां हर वर्ग की आवाज को मंच मिला। किसान अपनी फसलों और न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग लेकर पहुंचे, पूर्व सैनिक सम्मानजनक पेंशन के लिए डटे, छात्र शिक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की मांग करते रहे, जबकि महिलाएं, कर्मचारी और सामाजिक संगठन भी अपने अधिकारों की लड़ाई लेकर यहां आए। इसने लोकतंत्र को केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि नागरिक भागीदारी का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया।
पिछले डेढ़ दशक में युवाओं की मौजूदगी ने जंतर-मंतर की पहचान को और मजबूत किया है। रोजगार, शिक्षा, परीक्षा प्रणाली, सामाजिक न्याय और समान अवसर जैसे मुद्दों पर नई पीढ़ी ने यहां अपनी आवाज बुलंद की। सोशल मीडिया के दौर में यहां से उठे आंदोलन देशभर में चर्चा का विषय बने और लोकतांत्रिक संवाद को नई ऊर्जा मिली। जंतर-मंतर अब केवल धरना स्थल नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की उम्मीदों का प्रतीक है जो बदलाव को लोकतांत्रिक तरीके से हासिल करना चाहती है।
बोट क्लब से जंतर-मंतर: आंदोलन की बदली राजधानी
आजादी के बाद लंबे समय तक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन इंडिया गेट स्थित बोट क्लब मैदान में होते थे। सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों से वहां प्रदर्शन सीमित होने लगे तो 1990 के दशक में जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शनों का निर्धारित केंद्र बनाया गया। इसके बाद से यह देशभर के आंदोलनों का सबसे प्रमुख लोकतांत्रिक मंच बन गया।
इसलिए भी खास है जंतर-मंतर
संसद और केंद्रीय मंत्रालयों के निकट होने के कारण यहां उठने वाली हर मांग सीधे सत्ता तक पहुंचती है। यही वजह है कि छात्र, किसान, कर्मचारी, महिलाएं, पूर्व सैनिक और सामाजिक संगठन अपनी आवाज बुलंद करने के लिए सबसे पहले जंतर-मंतर का रुख करते हैं।
वे आंदोलन जिन्होंने जंतर-मंतर को इतिहास में दर्ज किया
2011: अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन।
2012: निर्भया कांड के बाद देशव्यापी जनआक्रोश।
2015: वन रैंक, वन पेंशन के लिए पूर्व सैनिकों का आंदोलन।
2019: नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध प्रदर्शन।
2023: महिला पहलवानों का यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर ऐतिहासिक धरना।
2026: कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की सफलता ने जंतर-मंतर के आंदोलनकारी इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा।
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युवा आंदोलनों, जनभागीदारी और ऐतिहासिक प्रदर्शनों ने बनाया अधिकारों की लड़ाई का सबसे बुलंद प्रतीक
नितिन राजपूत
नई दिल्ली। दिल्ली का जंतर-मंतर कभी आकाश में ग्रह-नक्षत्रों की चाल समझने का केंद्र था, लेकिन आज यह देश के लोकतांत्रिक संघर्षों की सबसे मजबूत आवाज बन चुका है। विज्ञान और खगोलशास्त्र की प्रयोगशाला के रूप में शुरू हुई इसकी यात्रा अब युवाओं, छात्रों, किसानों, कर्मचारियों और सामाजिक संगठनों के अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक बन गई है। यहां उठने वाले सवाल केवल सरकार तक नहीं पहुंचते, बल्कि देशभर में लोकतांत्रिक विमर्श को दिशा भी देते हैं।
18वीं शताब्दी में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने मुगल बादशाह मोहम्मद शाह के शासनकाल में जंतर-मंतर का निर्माण कराया था। यह उनकी पांच प्रमुख वेधशालाओं में से एक है, जहां सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र, राम यंत्र और मिश्र यंत्र जैसे विशाल उपकरणों से समय, ग्रहों की स्थिति और खगोलीय घटनाओं का अध्ययन किया जाता था। उस दौर में यह वैज्ञानिक जिज्ञासा और भारतीय ज्ञान परंपरा का अद्भुत उदाहरण था।
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समय के साथ दिल्ली का विस्तार हुआ। संसद भवन, केंद्रीय मंत्रालयों और कनॉट प्लेस के करीब होने के कारण जंतर-मंतर का महत्व केवल ऐतिहासिक स्मारक तक सीमित नहीं रहा। 1990 के दशक में इसे विरोध-प्रदर्शनों के प्रमुख स्थल के रूप में विकसित किया गया और 1993 के बाद यह देश का सबसे बड़ा धरना स्थल बन गया। तब से यहां हजारों छोटे-बड़े आंदोलन हुए हैं।
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जंतर-मंतर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां हर वर्ग की आवाज को मंच मिला। किसान अपनी फसलों और न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग लेकर पहुंचे, पूर्व सैनिक सम्मानजनक पेंशन के लिए डटे, छात्र शिक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की मांग करते रहे, जबकि महिलाएं, कर्मचारी और सामाजिक संगठन भी अपने अधिकारों की लड़ाई लेकर यहां आए। इसने लोकतंत्र को केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि नागरिक भागीदारी का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया।
पिछले डेढ़ दशक में युवाओं की मौजूदगी ने जंतर-मंतर की पहचान को और मजबूत किया है। रोजगार, शिक्षा, परीक्षा प्रणाली, सामाजिक न्याय और समान अवसर जैसे मुद्दों पर नई पीढ़ी ने यहां अपनी आवाज बुलंद की। सोशल मीडिया के दौर में यहां से उठे आंदोलन देशभर में चर्चा का विषय बने और लोकतांत्रिक संवाद को नई ऊर्जा मिली। जंतर-मंतर अब केवल धरना स्थल नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की उम्मीदों का प्रतीक है जो बदलाव को लोकतांत्रिक तरीके से हासिल करना चाहती है।
बोट क्लब से जंतर-मंतर: आंदोलन की बदली राजधानी
आजादी के बाद लंबे समय तक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन इंडिया गेट स्थित बोट क्लब मैदान में होते थे। सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों से वहां प्रदर्शन सीमित होने लगे तो 1990 के दशक में जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शनों का निर्धारित केंद्र बनाया गया। इसके बाद से यह देशभर के आंदोलनों का सबसे प्रमुख लोकतांत्रिक मंच बन गया।
इसलिए भी खास है जंतर-मंतर
संसद और केंद्रीय मंत्रालयों के निकट होने के कारण यहां उठने वाली हर मांग सीधे सत्ता तक पहुंचती है। यही वजह है कि छात्र, किसान, कर्मचारी, महिलाएं, पूर्व सैनिक और सामाजिक संगठन अपनी आवाज बुलंद करने के लिए सबसे पहले जंतर-मंतर का रुख करते हैं।
वे आंदोलन जिन्होंने जंतर-मंतर को इतिहास में दर्ज किया
2011: अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन।
2012: निर्भया कांड के बाद देशव्यापी जनआक्रोश।
2015: वन रैंक, वन पेंशन के लिए पूर्व सैनिकों का आंदोलन।
2019: नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध प्रदर्शन।
2023: महिला पहलवानों का यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर ऐतिहासिक धरना।
2026: कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की सफलता ने जंतर-मंतर के आंदोलनकारी इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा।