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आप को नहीं भरोसा: केजरीवाल-सिसोदिया ने आबकारी नीति केस में जज बदलने की मांग की, HC के मुख्य न्यायाधीश को पत्र

पीटीआई, नई दिल्ली Published by: विकास कुमार Updated Wed, 11 Mar 2026 05:09 PM IST
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सार

पूर्व दिल्ली सरकार की आबकारी नीति में कथित अनियमितताओं को लेकर केंद्रीय जांच एजेंसियां जांच कर रही हैं। मनीष सिसोदिया को इस मामले में गिरफ्तार किया गया था। अरविंद केजरीवाल को भी इस मामले में पूछताछ के लिए बुलाया गया था। यह मामला दिल्ली की राजनीति में काफी समय से चर्चा का विषय बना हुआ है।

Kejriwal Sisodia write to Delhi HC Chief Justice to transfer excise policy case from judge currently hearing i
आप संयोजक अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया - फोटो : पीटीआई
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विस्तार

आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को एक महत्वपूर्ण पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने आबकारी नीति से संबंधित मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश को बदलने का अनुरोध किया है। पार्टी ने स्वयं इस घटनाक्रम की जानकारी सार्वजनिक रूप से साझा की है।

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न्याय प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाने की जरूरत
यह मामला दिल्ली की आबकारी नीति से जुड़ा हुआ है, जिस पर कई गंभीर आरोप लगे हैं। केजरीवाल और सिसोदिया दोनों इस मामले में आरोपी हैं। उन्होंने अपने पत्र में मामले की निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने की बात कही है। पत्र में वर्तमान न्यायाधीश द्वारा सुनवाई जारी रखने पर कुछ आपत्तियां उठाई गई हैं। हालांकि, उन आपत्तियों का विस्तृत विवरण अभी सामने नहीं आया है। दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास ऐसे अनुरोधों पर विचार करने का अधिकार होता है। यह कदम मामले की न्यायिक प्रक्रिया में एक नया मोड़ लेकर आया है। पार्टी का कहना है कि यह न्याय की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए आवश्यक है।

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दोनों की हुई थी गिरफ्तारी
दिल्ली सरकार की आबकारी नीति 2021-22 को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था। इस नीति में कथित अनियमितताओं को लेकर केंद्रीय जांच एजेंसियों ने जांच शुरू की थी। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को इस मामले में गिरफ्तार किया गया था। अरविंद केजरीवाल को भी इस मामले में पूछताछ के लिए बुलाया गया था। यह मामला दिल्ली की राजनीति में काफी समय से चर्चा का विषय बना हुआ है।

आइए जानते हैं दिल्ली की नई शराब नीति क्या थी? 
17 नवंबर 2021 को दिल्ली सरकार ने राज्य में नई शराब नीति लागू की। इसके तहत राजधानी में 32 जोन बनाए गए और हर जोन में ज्यादा से ज्यादा 27 दुकानें खुलनी थीं। इस तरह से कुल मिलाकर 849 दुकानें खुलनी थीं। नई शराब नीति में दिल्ली की सभी शराब की दुकानों को प्राइवेट कर दिया गया। इसके पहले दिल्ली में शराब की 60 प्रतिशत दुकानें सरकारी और 40 प्रतिशत प्राइवेट थीं। नई नीति लागू होने के बाद 100 प्रतिशत प्राइवेट हो गईं। सरकार ने तर्क दिया था कि इससे 3,500 करोड़ रुपये का फायदा होगा। 

 

सरकार ने लाइसेंस की फीस भी कई गुना बढ़ा दी। जिस एल-1 लाइसेंस के लिए पहले ठेकेदारों को 25 लाख देना पड़ता था, नई शराब नीति लागू होने के बाद उसके लिए ठेकेदारों को पांच करोड़ रुपये चुकाने पड़े। इसी तरह अन्य कैटेगिरी में भी लाइसेंस की फीस में काफी बढ़ोतरी हुई। 

घोटाले के आरोप क्यों लगे?
नई शराब नीति से जनता और सरकार दोनों को नुकसान होने का आरोप लगे। वहीं, बड़े शराब कारोबारियों को फायदा होने की बात कही थी। भारतीय जनता पार्टी का यही आरोप था। तीन तरह से घोटाले की बात कही गई। इसे समझने के लिए हम थोड़ा आंकड़ों पर नजर डाल लेते हैं।

लाइसेंस फीस में भारी इजाफा करके बड़े कारोबारियों को लाभ पहुंचाने का आरोप  
शराब ब्रिकी के लिए ठेकेदारों को लाइसेंस लेना पड़ता है। इसके लिए सरकार ने लाइसेंस शुल्क तय किया है। सरकार ने कई तरह की कैटेगिरी बनाई है। इसके तहत शराब, बीयर, विदेशी शराब आदि को बेचने के लिए लाइसेंस दिया जाता है। अब उदाहरण के लिए पहले जिस लाइसेंस के लिए ठेकेदार को 25 लाख रुपये का भुगतान करना पड़ता था, नई शराब नीति लागू होने के बाद उसी के लिए पांच करोड़ रुपये देने पड़े। आरोप है कि दिल्ली सरकार ने जानबूझकर बड़े शराब कारोबारियों को फायदा पहुंचाने के लिए लाइसेंस शुल्क बढ़ाया था। इससे छोटे ठेकेदारों की दुकानें बंद हो गईं और बाजार में केवल बड़े शराब माफिया को लाइसेंस मिला। विपक्ष का आरोप ये भी है कि इसके एवज में आप के नेताओं और अफसरों को शराब माफियाओं ने मोटी रकम घूस के तौर पर दी गई। 

सरकार ने बताया फायदे का सौदा
सरकार का तर्क था कि लाइसेंस फीस बढ़ाने से सरकार को एकमुश्त राजस्व की कमाई हुई। इससे सरकार ने जो उत्पाद शुल्क और वैट घटाया उसकी भरपाई हो गई। 

खुदरा बिक्री में सरकारी राजस्व में भारी कमी होने का आरोप
दूसरा आरोप शराब की बिक्री को लेकर है। उदाहरण के लिए मान लीजिए पहले अगर 750 एमएल की एक शराब की बोतल 530 रुपये में मिलती थी। तब इस एक बोतल पर रिटेल कारोबारी को 33.35 रुपये का मुनाफा होता था, जबकि 223.89 रुपये उत्पाद कर और 106 रुपये वैट के रूप में सरकार को मिलता था। मतलब एक बोतल पर सरकार को 329.89 रुपये का फायदा मिलता था। नई शराब नीति से सरकार के इसी मुनाफे में खेल होने दावा किया गया।

दावा था कि नई शराब नीति में वही 750 एमएल वाली शराब की बोतल का दाम 530 रुपये से बढ़कर 560 रुपये हो गई। इसके अलावा रिटेल कारोबारी का मुनाफा भी 33.35 रुपये से बढ़कर सीधे 363.27 रुपये पहुंच गया। मतलब रिटेल कारोबारियों का फायदा 10 गुना से भी ज्यादा बढ़ गया। वहीं, सरकार को मिलने वाला 329.89 रुपये का फायदा घटकर तीन रुपये 78 पैसे रह गया। इसमें 1.88 रुपये उत्पाद शुल्क और 1.90 रुपये वैट शामिल है। 

घोटाले की जांच कैसे शुरू हुई?
इस शराब नीति के कार्यान्वयन में कथित अनियमितता की शिकायतें आईं जिसके बाद उपराज्यपाल ने सीबीआई जांच की सिफारिश की थी। इसके साथ ही दिल्ली आबकारी नीति 2021-22 सवालों के घेरे में आ गई। हालांकि, नई शराब नीति को बाद में इसे बनाने और इसके कार्यान्वयन में अनियमितताओं के आरोपों के बीच रद्द कर दिया गया था।

अगस्त 2022 में सीबीआई ने दर्ज की थी एफआईआर
सीबीआई ने अगस्त 2022 में इस मामले में 15 आरोपियों के खिलाफ नियमों के कथित उल्लंघन और नई शराब नीति में प्रक्रियागत गड़बड़ी के आरोप में एफआईआर दर्ज की थी। बाद में सीबीआई द्वारा दर्ज मामले के संबंध में ईडी ने पीएमएलए के तहत मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले की जांच शुरू कर दी। 

ईडी और सीबीआई दिल्ली सरकार की नई शराब नीति में कथित घोटाले की अलग-अलग जांच की। ईडी नीति को बनाने और लागू करने में धन शोधन के आरोपों की जांच में शामिल हुई. वहीं, सीबीआई की जांच नीति बनाते समय हुई कथित अनियमितताओं पर केंद्रित थी।

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