{"_id":"6a68a5c097ea320e48046174","slug":"the-city-streets-will-be-bathed-in-saffron-hues-amidst-the-resounding-chants-of-bam-bam-bhole-noida-news-c-1-noi1095-4550147-2026-07-28","type":"story","status":"publish","title_hn":"Noida News: बम-बम भोले की गूंज से भगवामय होंगी शहर की सड़कें","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Noida News: बम-बम भोले की गूंज से भगवामय होंगी शहर की सड़कें
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आस्था और कठिन तपस्या की शुरू होगी परीक्षा, साधारण कांवड़ की संख्या सबसे ज्यादा
संवाद न्यूज एजेंसी
नोएडा। शहर की सड़कें कुछ ही दिनों में पूरी तरह भगवा रंग में रंगने वाली हैं। बम-बम भोले के जयकारों और उल्लास के साथ शिव भक्त पवित्र गंगाजल लेकर शिवालयों की ओर रुख करने की तैयारी में हैं। आस्था, अटूट विश्वास और कठिन तपस्या के इस महापर्व में श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और संकल्प के अनुसार विभिन्न प्रकार की कांवड़ लेकर यात्रा का हिस्सा बनेंगे। हर कांवड़ की अपनी अलग धार्मिक मान्यता और नियम हैं, जिनका पालन श्रद्धालु पूरे समर्पण के साथ करते हैं।
अब कांवड़ यात्रा में सिर्फ विशेष आयु वर्ग ही नहीं बल्कि बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक शामिल होते हैं। यही कारण है कि सड़क पर सबसे ज्यादा साधारण कांवड़ ही दिखाई देती है। इसी प्रकार की कांवड़ लेकर हरिद्वार या अन्य तीर्थों से गंगाजल भरते हैं और पैदल अपने क्षेत्र के शिवालयों तक पहुंचते हैं। साधारण कांवड़ के साथ यात्रा के दौरान जरूरत पड़ने पर शिव भक्त विश्राम भी कर लेते हैं।
पैदल से लेकर दंडवत यात्रा तक, आस्था के कई रंग
सेक्टर-14ए स्थित शनि मंदिर के पुजारी अशोक ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में साधारण कांवड़ लाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या सबसे अधिक बढ़ी है। वहीं, सेक्टर-53 स्थित प्राचीन शिव मंदिर के पुजारी शिवम ने बताया कि हर कांवड़ का अपना अलग नियम और संकल्प होता है। पहले जहां डाक कांवड़ लाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या अधिक दिखाई देती थी, वहीं अब बड़ी संख्या में परिवार, युवा और पहली बार कांवड़ यात्रा करने वाले श्रद्धालु साधारण कांवड़ लेकर आ रहे हैं। शहर में पैदल से लेकर दंडवत तक हर कांवड़ आस्था के कई रंगों के साथ देखने को मिलेगी।
विज्ञापन
बिना रुके तय करनी होती है डाक कांवड़
डाक कांवड़ को सबसे कठिन यात्राओं में माना जाता है। गंगाजल भरने के बाद शिव भक्त बिना रुके दौड़ते या तेज गति से चलते हुए निर्धारित समय में शिवालय पहुंचते हैं। रास्ते में कांवड़ को रोका नहीं जाता है। इसी वजह से प्रशासन डाक कांवड़ के लिए अलग ट्रैफिक व्यवस्था भी करता है।
जमीन पर नहीं रखी जाती है खड़ी कांवड़
खड़ी कांवड़ विशेष अनुशासन और संकल्प का प्रतीक है। इस यात्रा में कांवड़ को पूरे मार्ग में जमीन पर नहीं रखा जाता है। कहीं रुककर विश्राम भी करना हो तो उसे स्टैंड या दूसरे कांवड़िये के सहारे खड़ा रखा जाता है। इसे कठोर धार्मिक नियमों के पालन वाली यात्रा माना जाता है।
दंडवत करते हुए पूरी होती है दांडी कांवड़ यात्रा
दांडी कांवड़ लाने वालों की संख्या अमूमन अन्य के मुकाबले कम रहती है। इसमें शिव भक्त हर दंडवत प्रणाम के बाद वहीं से अगला दंडवत करते हुए आगे बढ़ते हैं। इस कारण यात्रा पूरी करने में कई दिन, कई बार सप्ताह तक लग जाते हैं। इसे भगवान शिव के प्रति सर्वोच्च समर्पण और तप का प्रतीक कहा जाता है।
कठोर नियमों और संयम की परंपरा है बैकुंठ कांवड़
पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत कुछ क्षेत्रों में बैकुंठ कांवड़ की भी मान्यता है। इसमें कांवड़िये विशेष व्रत, शुद्धता और धार्मिक अनुशासन का पालन करते हुए यात्रा पूरी करते हैं। हालांकि, इसकी परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो जाती है, लेकिन इसे कठिन संकल्प वाली कांवड़ माना जाता है।
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
नोएडा। शहर की सड़कें कुछ ही दिनों में पूरी तरह भगवा रंग में रंगने वाली हैं। बम-बम भोले के जयकारों और उल्लास के साथ शिव भक्त पवित्र गंगाजल लेकर शिवालयों की ओर रुख करने की तैयारी में हैं। आस्था, अटूट विश्वास और कठिन तपस्या के इस महापर्व में श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और संकल्प के अनुसार विभिन्न प्रकार की कांवड़ लेकर यात्रा का हिस्सा बनेंगे। हर कांवड़ की अपनी अलग धार्मिक मान्यता और नियम हैं, जिनका पालन श्रद्धालु पूरे समर्पण के साथ करते हैं।
अब कांवड़ यात्रा में सिर्फ विशेष आयु वर्ग ही नहीं बल्कि बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक शामिल होते हैं। यही कारण है कि सड़क पर सबसे ज्यादा साधारण कांवड़ ही दिखाई देती है। इसी प्रकार की कांवड़ लेकर हरिद्वार या अन्य तीर्थों से गंगाजल भरते हैं और पैदल अपने क्षेत्र के शिवालयों तक पहुंचते हैं। साधारण कांवड़ के साथ यात्रा के दौरान जरूरत पड़ने पर शिव भक्त विश्राम भी कर लेते हैं।
विज्ञापन
पैदल से लेकर दंडवत यात्रा तक, आस्था के कई रंग
सेक्टर-14ए स्थित शनि मंदिर के पुजारी अशोक ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में साधारण कांवड़ लाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या सबसे अधिक बढ़ी है। वहीं, सेक्टर-53 स्थित प्राचीन शिव मंदिर के पुजारी शिवम ने बताया कि हर कांवड़ का अपना अलग नियम और संकल्प होता है। पहले जहां डाक कांवड़ लाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या अधिक दिखाई देती थी, वहीं अब बड़ी संख्या में परिवार, युवा और पहली बार कांवड़ यात्रा करने वाले श्रद्धालु साधारण कांवड़ लेकर आ रहे हैं। शहर में पैदल से लेकर दंडवत तक हर कांवड़ आस्था के कई रंगों के साथ देखने को मिलेगी।
विज्ञापन
बिना रुके तय करनी होती है डाक कांवड़
डाक कांवड़ को सबसे कठिन यात्राओं में माना जाता है। गंगाजल भरने के बाद शिव भक्त बिना रुके दौड़ते या तेज गति से चलते हुए निर्धारित समय में शिवालय पहुंचते हैं। रास्ते में कांवड़ को रोका नहीं जाता है। इसी वजह से प्रशासन डाक कांवड़ के लिए अलग ट्रैफिक व्यवस्था भी करता है।
जमीन पर नहीं रखी जाती है खड़ी कांवड़
खड़ी कांवड़ विशेष अनुशासन और संकल्प का प्रतीक है। इस यात्रा में कांवड़ को पूरे मार्ग में जमीन पर नहीं रखा जाता है। कहीं रुककर विश्राम भी करना हो तो उसे स्टैंड या दूसरे कांवड़िये के सहारे खड़ा रखा जाता है। इसे कठोर धार्मिक नियमों के पालन वाली यात्रा माना जाता है।
दंडवत करते हुए पूरी होती है दांडी कांवड़ यात्रा
दांडी कांवड़ लाने वालों की संख्या अमूमन अन्य के मुकाबले कम रहती है। इसमें शिव भक्त हर दंडवत प्रणाम के बाद वहीं से अगला दंडवत करते हुए आगे बढ़ते हैं। इस कारण यात्रा पूरी करने में कई दिन, कई बार सप्ताह तक लग जाते हैं। इसे भगवान शिव के प्रति सर्वोच्च समर्पण और तप का प्रतीक कहा जाता है।
कठोर नियमों और संयम की परंपरा है बैकुंठ कांवड़
पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत कुछ क्षेत्रों में बैकुंठ कांवड़ की भी मान्यता है। इसमें कांवड़िये विशेष व्रत, शुद्धता और धार्मिक अनुशासन का पालन करते हुए यात्रा पूरी करते हैं। हालांकि, इसकी परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो जाती है, लेकिन इसे कठिन संकल्प वाली कांवड़ माना जाता है।