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Delhi NCR News: प्रदूषण पर नजर रखने वाली डीपीसीसी खुद संसाधनों की कमी से बेहाल
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-एनजीटी में दाखिल अपनी रिपोर्ट में दी जानकारी, इंजीनियरिंग विभाग के 152 स्वीकृत पदों में से 34 पद खाली पड़े
नितिन राजपूत
नई दिल्ली। दिल्ली में हवा, पानी और पर्यावरण की निगरानी की जिम्मेदारी संभालने वाली दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) कर्मचारियों और आधुनिक उपकरणों की कमी से जूझ रही है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में दाखिल डीपीसीसी की रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ है कि प्रदूषण नियंत्रण की सबसे अहम एजेंसी के पास पर्याप्त वैज्ञानिक, इंजीनियर और अत्याधुनिक जांच सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इंजीनियरिंग विभाग के 152 स्वीकृत पदों में से 34 खाली हैं। इनमें वरिष्ठ पर्यावरण अभियंता और सहायक अभियंता जैसे महत्वपूर्ण पद शामिल हैं। वैज्ञानिक विभाग की स्थिति भी चिंताजनक है। यहां 31 स्वीकृत पदों में से 10 रिक्त हैं, जिनमें वरिष्ठ वैज्ञानिकों से लेकर प्रयोगशाला सहायकों तक के पद शामिल हैं। विशेषज्ञों की कमी का असर पर्यावरणीय निगरानी और जांच की क्षमता पर पड़ रहा है।
सबसे गंभीर स्थिति डीपीसीसी की जल परीक्षण प्रयोगशाला की है। कई महत्वपूर्ण परीक्षण फिलहाल नहीं हो पा रहे हैं, जिससे पानी की गुणवत्ता का व्यापक आकलन प्रभावित हो रहा है। इसके अलावा मिट्टी और खतरनाक औद्योगिक कचरे की जांच के लिए आवश्यक आधुनिक उपकरण भी उपलब्ध नहीं हैं।
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हालांकि डीपीसीसी ने एनजीटी को बताया है कि हालात सुधारने के लिए कदम उठाए जा चुके हैं। रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (डीएसएसएसबी) और अन्य माध्यमों से जारी है। समिति का दावा है कि अगले तीन से नौ महीनों में अधिकांश पद भर दिए जाएंगे। साथ ही नई मशीनें और प्रयोगशाला उपकरण खरीदने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है, जिन्हें चार से 12 महीनों के भीतर स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मौजूदा कमियों के बावजूद वायु और ध्वनि प्रदूषण की निगरानी प्रभावित नहीं हुई है। राजधानी में वायु गुणवत्ता की निगरानी के लिए 30 स्वचालित एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन और ध्वनि स्तर पर नजर रखने के लिए 31 मॉनिटरिंग स्टेशन नियमित रूप से काम कर रहे हैं।
भारी धातुओं और कीटनाशकों की जांच पर असर
डीपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार पानी में आर्सेनिक, सीसा, पारा, कैडमियम, क्रोमियम और तांबा जैसी खतरनाक भारी धातुओं की जांच करने वाली मुख्य मशीन लंबे समय से खराब है। इसके अलावा पानी में कीटनाशकों की जांच की सुविधा भी फिलहाल उपलब्ध नहीं है। आधुनिक उपकरणों की कमी के कारण कई महत्वपूर्ण पर्यावरणीय परीक्षण समय पर नहीं हो पा रहे हैं।
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नितिन राजपूत
नई दिल्ली। दिल्ली में हवा, पानी और पर्यावरण की निगरानी की जिम्मेदारी संभालने वाली दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) कर्मचारियों और आधुनिक उपकरणों की कमी से जूझ रही है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में दाखिल डीपीसीसी की रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ है कि प्रदूषण नियंत्रण की सबसे अहम एजेंसी के पास पर्याप्त वैज्ञानिक, इंजीनियर और अत्याधुनिक जांच सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इंजीनियरिंग विभाग के 152 स्वीकृत पदों में से 34 खाली हैं। इनमें वरिष्ठ पर्यावरण अभियंता और सहायक अभियंता जैसे महत्वपूर्ण पद शामिल हैं। वैज्ञानिक विभाग की स्थिति भी चिंताजनक है। यहां 31 स्वीकृत पदों में से 10 रिक्त हैं, जिनमें वरिष्ठ वैज्ञानिकों से लेकर प्रयोगशाला सहायकों तक के पद शामिल हैं। विशेषज्ञों की कमी का असर पर्यावरणीय निगरानी और जांच की क्षमता पर पड़ रहा है।
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सबसे गंभीर स्थिति डीपीसीसी की जल परीक्षण प्रयोगशाला की है। कई महत्वपूर्ण परीक्षण फिलहाल नहीं हो पा रहे हैं, जिससे पानी की गुणवत्ता का व्यापक आकलन प्रभावित हो रहा है। इसके अलावा मिट्टी और खतरनाक औद्योगिक कचरे की जांच के लिए आवश्यक आधुनिक उपकरण भी उपलब्ध नहीं हैं।
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हालांकि डीपीसीसी ने एनजीटी को बताया है कि हालात सुधारने के लिए कदम उठाए जा चुके हैं। रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (डीएसएसएसबी) और अन्य माध्यमों से जारी है। समिति का दावा है कि अगले तीन से नौ महीनों में अधिकांश पद भर दिए जाएंगे। साथ ही नई मशीनें और प्रयोगशाला उपकरण खरीदने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है, जिन्हें चार से 12 महीनों के भीतर स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मौजूदा कमियों के बावजूद वायु और ध्वनि प्रदूषण की निगरानी प्रभावित नहीं हुई है। राजधानी में वायु गुणवत्ता की निगरानी के लिए 30 स्वचालित एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन और ध्वनि स्तर पर नजर रखने के लिए 31 मॉनिटरिंग स्टेशन नियमित रूप से काम कर रहे हैं।
भारी धातुओं और कीटनाशकों की जांच पर असर
डीपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार पानी में आर्सेनिक, सीसा, पारा, कैडमियम, क्रोमियम और तांबा जैसी खतरनाक भारी धातुओं की जांच करने वाली मुख्य मशीन लंबे समय से खराब है। इसके अलावा पानी में कीटनाशकों की जांच की सुविधा भी फिलहाल उपलब्ध नहीं है। आधुनिक उपकरणों की कमी के कारण कई महत्वपूर्ण पर्यावरणीय परीक्षण समय पर नहीं हो पा रहे हैं।