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Delimitation Delhi: लोकसभा सीटों के विस्तार से दिल्ली में बढ़ सकती हैं सात से नौ सीटें, सियासत में भूचाल तय
विनोद डबास, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 17 Apr 2026 05:54 AM IST
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सार
दिल्ली में वर्तमान में लोकसभा की सात सीटें हैं, लेकिन वर्तमान जनसंख्या आधारित पुनर्सीमांकन प्रक्रिया के बाद यह संख्या दोगुनी यानी 14 या उससे अधिक हो सकती है।
परिसीमन से बदलाव
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
केंद्र सरकार के प्रस्तावित संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 देश की राजनीति का भूगोल बदलने जा रहा है, वहीं सरकार की ओर से संघशासित क्षेत्र कानून (संशोधन) विधेयक 2026 भी लाया जा रहा है। इसका सबसे बड़ा असर दिल्ली में दिखेगा। दरअसल लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने की तैयारी की जा रही है, जिनमें केंद्रशासित प्रदेशों की सीटें 19 से बढ़ाकर 35 तय की गई हैं।
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दिल्ली में वर्तमान में लोकसभा की सात सीटें हैं, लेकिन वर्तमान जनसंख्या आधारित पुनर्सीमांकन प्रक्रिया के बाद यह संख्या दोगुनी यानी 14 या उससे अधिक हो सकती है। करीब 2.25 करोड़ की आबादी के साथ दिल्ली, केंद्रशासित प्रदेशों में सबसे बड़ा जनसंख्या केंद्र है। यही कारण है कि सीटों के पुनर्वितरण में राजधानी को सबसे ज्यादा लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रशासित प्रदेशों में सीटों की वृद्धि का सबसे बड़ा हिस्सा दिल्ली को जाएगा। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर की सीटें पांच से बढ़कर 10 से 12 हो सकती हैं।
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दिल्ली में सीटों की संख्या 14 या उससे अधिक होती है, तो इसका सीधा असर आरक्षण व्यवस्था पर भी पड़ेगा। अनुमान के अनुसार तीन एक अनुसूचित जाति की महिला समेत तीन सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं और तीन सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने की संभावना है, इनमें से एक सीट अनुसूचित जाति महिला के लिए सुरक्षित होगी। दिल्ली में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 17 प्रतिशत है।
दिल्ली की राजनीति में भूचाल तय
दिल्ली में सीटों की संख्या बढ़ने का मतलब सिर्फ सांसदों की संख्या बढ़ना नहीं है, बल्कि यह राजधानी की राजनीतिक दिशा और दलों की रणनीति को पूरी तरह बदल देगा। राष्ट्रीय पार्टियों के लिए दिल्ली अब और बड़ा चुनावी रणक्षेत्र बनेगी। स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा। नए चेहरे और नए सामाजिक समीकरण उभरेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सीटों की संख्या बढ़ने से दिल्ली में क्षेत्रीय संतुलन भी बदलेगा, जिससे बाहरी और आंतरिक दिल्ली के बीच प्रतिनिधित्व का अंतर कम हो सकता है।
